Arya Vichar
ॐ इंद्रम् वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् अपघ्नन्तो अराव्णः अर्थात् क्रियाशील ऐश्वर्यवान बनो
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०९
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*अ॒मुत्र भूया॒दध॒ यद्य॒मस्य॒ बृह॑स्पतेऽअ॒भिश॑स्तेरमुञ्चः । प्रत्यौहताम॒श्विनना॑ मृत्युम॑स्माद्देवाना॑मग्ने भिषजा॒ शचीभिः ।।*
*भावार्थ :-*
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही श्रेष्ठ अध्यापक और उपदेशक हैं, जो इस लोक और परलोक में सुख होने के लिए सबको अच्छी शिक्षा करें। जिससे ब्रह्मचर्यादि कर्मों का सेवन कर मनुष्य अल्पावस्था में मृत्यु और आनन्द की हानि को न प्राप्त होवें ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०८
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*बृह॑स्पते सवितर्बोधयैनसँशितं चित्सन्त॒रासँशिंशाधि । व॒र्धयैनं महते सौभ॑गाय॒ विश्व॑ऽएन॒मनु॑ मदन्तु दे॒वाः ।।*
*भावार्थ :-*
जो राजसभा का उपदेशक है, वह इन राजादि को दुर्व्यसनों से पृथक् कर और सुशीलता को प्राप्त कराके बड़े ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए प्रवृत्त करे ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०२
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*स॑ चेध्यस्वा॑ग्ने॒ प्र च॑ बोधयैन॒मुच्च॑ तिष्ठ महते सौभगाय । मा च॑ रिषदुपसत्ता ते॑ अग्ने ब्रह्माण॑स्ते य॒शसः सन्तु माऽन्ये ।।*
*भावार्थ :-*
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वानों से भिन्न इतर जनों को उत्तम अधिकार में नहीं युक्त करते, सदा उन्नति के लिए प्रयत्न करते और अन्याय से किसी को नहीं मारते हैं, वे कीर्त्ति और ऐश्वर्य से युक्त हो जाते हैं ।
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