thought by osho
osho discourse
09/10/2025
मैं स्त्री पुरुष को निकट लाना चाहता हूँ . . इतने निकट के उनको ये
प्रतीति नहीं रह जानी चाहिए के कौन
स्त्री है, कौन पुरुष . . स्त्री-पुरुष
होना चौबीस घंटे का बोध नहीं होना चाहिए . . वह
बीमारी है, अगर इतना बोध बना रहता है तो . .
स्त्री-पुरुष होना चौबीस घंटे का बोध
नहीं होना चाहिए . . वह मिटेगा तभी हम
बीच के फांसले मिटायेंगे .. और इसके गहरे परिणाम हों के समाज
की अश्लीलता, अश्लील साहित्य,
अश्लील फ़िल्में, बेहूदी वृत्तियाँ, वे अपने आप गिर जाएँ . .
और एक ज्यादा स्वस्थ मनुष्य का जनम हो . . और यह जो स्वस्थ मनुष्य है,
इसकी मैं आशा कर सकता हूँ के वो धार्मिक हो सके . .
क्यूंकि जो स्वस्थ ही नहीं हो पाया अभी,
उसके धार्मिक होने की कोई आशा मैं नहीं मानता . .
स्त्री-पुरुष जितने निकट होंगे, उतना हे यह जो उपद्रव है शांत
हो जाए . . और यह उपद्रव शांत हो तो असली खोज शुरू हो . .
क्योंकि आदमी बिना आकर्षण के
नहीं जी सकता . . और अगर स्त्री-पुरुष
का आकर्षण शांत हो जाता है तो वह और गहरे आकर्षण की खोज
में लग जाता है . . बिना आकर्षण के जीना मुश्किल है . .
वही प्रयोजन है . . और जो स्त्री-पुरुष में
ही लड़ता रहता है, उसका आकर्षण तो कायम रहता है, दूसरे
आकर्षण का कोई उपाय नहीं है . . .
🙏🙏ओशो 🙏🙏
यौन: जीवन का ऊर्जा-आयाम
Bhagwan❤️
09/10/2025
प्रकृति न तो तुम्हारा अनुसरण करती है, न तुम्हारी माँगों का।
प्रकृति तो अपना ही मार्ग चलती है।
यही अर्थ है इस वाक्य का —
“हर चीज़ अपने उचित समय पर ही घटित होती है।”
प्रतीक्षा करो।
प्रयास करो — और फिर धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करो।
और यह मत माँगो कि परिणाम तुरंत आ जाए।
क्योंकि जैसे ही तुम माँगते हो,
तुम्हारी वही माँग उस घटना को और अधिक विलंबित कर देती है।
यदि तुम प्रतीक्षा कर सको —
शांतिपूर्वक, धैर्यपूर्वक, किंतु सजग रहते हुए, देखते हुए —
जैसे कोई किसान प्रतीक्षा करता है,
तो तुम उसे प्राप्त कर लोगे।
यदि तुम जल्दी में हो, तो चूक जाओगे।
यदि तुम बहुत “समय-चेतन” हो —
तो तुम ध्यान में नहीं उतर सकते,
क्योंकि ध्यान तो “असमय” (timelessness) है।
और सदा याद रखना —
जब तुम तैयार हो जाओगे, तभी यह घटित होगा।
और तैयारी भी अपने उचित समय पर ही आती है।
🌹❤️ओशो🙇🙇
Bhagwan❤️
09/10/2025
🌹ध्यान प्रयोग 🌹
अपनी आँखें बंद करो और ऐसे लेट जाओ जैसे तुम एक शव हो। अनुभव करो मानो जीवन शरीर से बाहर चला गया है। कोई हलचल मत करो, बिल्कुल वैसे ही स्थिर रहो जैसे मृत्यु ने तुम्हें पहले ही अपने कब्ज़े में ले लिया हो। साँस चलती रहेगी, पर तुम केवल उसे देखते रहो जैसे वह तुम्हारी नहीं है। धीरे–धीरे तुम देखोगे कि शरीर दूर होता जा रहा है, जैसे कोई वस्त्र बिस्तर पर रखा हो। जितना गहराई से तुम शरीर को मृत अनुभव कर सकोगे, उतना ही आसानी से उसके बंधन से बाहर फिसल जाओगे। यही अतिक्रमण का द्वार है: यह जानना कि शरीर अलग है, यह अनुभव करना कि यह केवल एक साधन है, और तुम इसके भीतर नहीं बल्कि इसके पार हो। तब शरीर पारदर्शी हो जाता है, और उसी पारदर्शिता में तुम अपने वास्तविक स्वरूप की झलक पाओगे। मृत्यु के बिना मरने के उस क्षण में तुम जानोगे कि तुम अमर हो।"
❤️🌹ओशो 🌹❤️
Bhagwan❤️
04/10/2025
बहुत पुरानी कथा है, तीन ऋषि थे, उनकी बहुत ख्याति थी। लोक लोकांतर में उनका यश था। इंद्र पीड़ित हो गया उनका यश देखकर और इंद्र ने, उर्वशी को, अपने नगर की श्रेष्ठतम अप्सरा से कहा कि इन तीन ऋषियों को मैं निमंत्रित कर रहा हूँ अपने जन्मदिन पर, तू ऐसी कोशिश करना कि उन तीनों का चित्त विचलित हो जाए।
उन तीन ऋषियों को आमंत्रित किया गया। वे तीन ऋषि इंद्र की अलकानगरी में उपस्थित हुए। सारे देवता, सारा नगर देखने आया जन्मदिन के उत्सव को। उर्वशी ऐसी सजी थी कि खुद इंद्र भी हैरान हो गए। वह आज इतनी सुंदर मालूम हो रही थी जिसका कोई हिसाब नहीं। फिर नृत्य शुरू हुआ। उर्वशी ने आधी रात बीतते तक अपने नृत्य से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। फिर जब रात गहरी होने लगी और लोगों पर नृत्य का नशा छाने लगा, तब उसने अपने आभूषण फेंकने शुरू कर दिए फिर धीरे धीरे वस्त्र भी। एक ऋषि घबराया और चिल्लाया, "उर्वशी बंद करो, यह तो सीमा के बाहर है, यह नहीं देखा जा सकता।" दूसरे दो ऋषियों ने कहा, "मित्र, नृत्य तो चलेगा, अगर तुम्हें न देखना हो तो अपनी आंखें बंद कर ले सकते हो। नृत्य नहीं बंद होगा। इतने लोग देखने को उत्सुक हैं, तुम्हारे अकेले के भयभीत होने से नृत्य बंद नहीं होगा। अपनी आंखें बंद कर लो अगर तुम्हें नहीं देखना।" ऋषि ने आंखें बंद कर लीं। सोचा था उस ऋषि ने कि आंखें बंद कर लेने से उर्वशी दिखाई पड़नी बंद हो जाएगी। लेकिन पाया कि यह गलती थी, भूल थी।
क्या आंख बंद करने से कुछ दिखाई पड़ना बंद होता है ? आंख बंद करने से तो जिससे डरकर हम आंख बंद करते हैं वह और प्रगाढ़ होकर भीतर उपस्थित हो जाता है। रोज हम जानते हैं, सपनों में हम उनसे मिल लेते हैं, जिनको देख कर हमने आंख बंद कर ली थी। रोज हम जानते हैं जिस चीज से हम भयभीत होकर भागे थे वह सपनों में उपस्थित हो जाती है। दिन भर उपवास किया था तो रात सपने में किसी भोज पर आमंत्रित हो जाते हैं। यह हम सब जानते हैं। उस ऋषि की भी वही तकलीफ। आंख बंद की और मुश्किल में पड़ा। नृत्य चलता रहा, फिर उर्वशी ने और भी वस्त्र फेंक दिए, केवल एक ही अधोवस्त्र उसके शरीर पर रह गया। अब दूसरा ऋषि घबराया और चिल्लाया कि बंद करो उर्वशी, अब तो अश्लीलता की हद हो गई, बंद करो, यह नृत्य नहीं देखा जा सकता। यह क्या पागलपन है ? तीसरे ऋषि ने कहा, "मित्र, तुम भी पहले जैसे ही हो। आंख बंद कर लो, नृत्य तो चलेगा। इतने लोग देखने को उत्सुक हैं। फिर मैं भी देखना चाहता हूं। तुम आंख बंद कर लो। नृत्य बंद नहीं होगा।" दूसरे ऋषि ने भी आंख बंद कर ली।
आंख जब तक खुली थी तब तक उर्वशी एक वस्त्र पहने हुई थी। आंख बंद करते ही ऋषि ने पाया वह वस्त्र भी गिर गया। स्वाभाविक है, चित्त जिस चीज से भयभीत होता है उसी में ग्रसित हो जाता है। चित्त जिस चीज को निषेध करता है, उसी में आकर्षित हो जाता है। फिर उर्वशी का नृत्य और आगे चला, उसने सारे वस्त्र फेंक दिए, वह नग्न हो गई। फिर उसके पास फेंकने को कुछ भी न बचा। वह तीसरा ऋषि बोला, "उर्वशी, और भी कुछ फेंकने को हो तो फेंक दो, मैं आज पूरा ही देखने को तैयार हूँ। अब तो अपनी इस चमड़ी को भी फेंक दे, ताकि मैं और भी देख लूं कि और आगे क्या है ?" उर्वशी ने कहा, "मैं हार गई आपसे।" वह पैरों पर गिर पड़ी उस ऋषि के, उसने कहा, "अब मेरे पास फेंकने को कुछ भी नहीं है। मैं हार गई क्योंकि आप अंत तक देखने को तैयार हो गए। दो ऋषि हार गए, क्योंकि बीच में ही उन्होंने आंख बंद कर ली। मैं हार गई, अब मेरे पास फेंकने को कुछ भी नहीं, और जिसने मुझे नग्न जान लिया, अब उसके चित्त में जानने को भी कुछ शेष न रहा। उसका चित्त मुक्त ही हो गया।"
चित्त का निरीक्षण करना है पूरा। मन के भीतर जो भी उर्वशियां हैं, मन के भीतर जो भी वृत्तियों की अप्सराएं हैं, चाहे काम की, चाहे क्रोध की, चाहे लोभ की, चाहे मोह की, उन सबको पूरी नग्नता में देख लेना है। उनका एक एक वस्त्र उतार कर देख लेना है। आंख बंद करके भागना नहीं है। एस्केप नहीं है, पलायन नहीं है जीवन की साधना, जीवन की साधना है पूरी खुली आंखों से चित्त का दर्शन। और जिस दिन कोई व्यक्ति अपने चित्त के सब वस्त्रों को उतार कर चित्त की पूरी नग्नता में, पूरी नेकेडनेस में, पूरी अग्लीनेस में, चित्त की पूरी कुरूपता में पूरी आंख खोल कर देखने को राजी हो जाता है, उसी दिन चित्त की उर्वशी पैरों पर गिर पड़ती है और कहती है मुझे क्षमा करें, मैं हार गई हूँ। अब आगे जानने को कुछ भी नहीं है।
चित्त की पूरी जानकारी, चित्त का पूरा ज्ञान चित्त से मुक्ति बन जाता है।
🌹🌹👁🙏👁🌹🌹
अंतर की खोज-9~
ओशो.....♡🌹❤️🙏
04/10/2025
प्रिय ओशो,
क्या आप हमें यह बता सकते हैं कि हम अपनी यौन ऊर्जा का उपयोग विकास के लिए कैसे करें, क्योंकि पश्चिम में यह हमारी मुख्य चिंताओं में से एक प्रतीत होती है?
सेक्स ही ऊर्जा है। इसलिए मैं "यौन ऊर्जा" नहीं कहूँगा — क्योंकि कोई दूसरी ऊर्जा है ही नहीं। आपके पास केवल यही ऊर्जा है। यह ऊर्जा रूपांतरित हो सकती है — यह एक ऊँचे स्तर की ऊर्जा बन सकती है। जितनी ऊँचाई पर यह पहुँचती है, उतनी ही उसमें से कामुकता (sexuality) कम होती जाती है। और एक सर्वोच्च शिखर है, जहाँ यह केवल प्रेम और करुणा बन जाती है। उस परम पुष्पन (ultimate flowering) को हम दिव्य ऊर्जा कह सकते हैं, लेकिन आधार, जड़, सीट — वही सेक्स है। तो सेक्स ऊर्जा की पहली, सबसे निचली परत है — और परमात्मा सबसे ऊँची परत है। लेकिन चलती हुई ऊर्जा वही है।
सबसे पहली बात यह समझनी है कि मैं ऊर्जा को विभाजित नहीं करता। जैसे ही आप विभाजन करते हैं, द्वैत पैदा हो जाता है। विभाजन होते ही संघर्ष और टकराव शुरू हो जाता है। और जैसे ही आप ऊर्जा को बाँटते हैं, आप खुद बँट जाते हैं — तब आप सेक्स के पक्ष में या विपक्ष में हो जाते हैं।
मैं न तो पक्ष में हूँ, न विपक्ष में — क्योंकि मैं विभाजन नहीं करता। मैं कहता हूँ, सेक्स ही ऊर्जा है। इसे ऊर्जा का नाम मान लो; इस ऊर्जा को ‘एक्स’ कह दो। जब यह ऊर्जा केवल जैविक प्रजनन (biological reproduction) के रूप में काम करती है, तब इसे सेक्स कहते हैं। और जब यही ऊर्जा जैविक बंधन से मुक्त हो जाती है, भौतिकता से परे हो जाती है, तब यह यीशु का प्रेम और बुद्ध की करुणा बन जाती है।
आज पश्चिम सेक्स के प्रति बहुत आसक्त है, और इसका कारण है ईसाइयत। दो हजार वर्षों की ईसाई दमन-नीति ने पश्चिमी मन को सेक्स से अत्यधिक ग्रस्त बना दिया है।
पहले दो हजार साल तक आसक्ति थी — इसे मारने की। लेकिन आप इसे मार नहीं सकते। कोई ऊर्जा नष्ट नहीं की जा सकती — ऊर्जा केवल रूपांतरित हो सकती है। न तो आप कोई नई ऊर्जा बना सकते हैं, न पुरानी को मिटा सकते हैं। यह आपके हाथ में नहीं है। अब वैज्ञानिक भी मानते हैं कि ब्रह्मांड में एक भी परमाणु नष्ट नहीं किया जा सकता।
ईसाई धर्म ने सेक्स ऊर्जा को नष्ट करने की कोशिश की। धर्म का अर्थ था पूर्ण ब्रह्मचर्य, सेक्स का अभाव। इससे एक तरह का पागलपन पैदा हुआ। जितना दबाते हैं, उतना ही यह भीतर गहराई में धँस जाता है। और तब यह पूरे अस्तित्व को विषाक्त कर देता है।
अगर आप ईसाई संतों का जीवन पढ़ें तो पाएँगे कि वे सेक्स को लेकर बेहद ग्रस्त थे। वे प्रार्थना नहीं कर सकते, ध्यान नहीं कर सकते — जो भी करते, सेक्स बीच में आ जाता। और वे सोचते कि शैतान उन्हें भरमा रहा है। लेकिन कोई शैतान नहीं है — अगर आप दबाते हैं, तो आप स्वयं शैतान बन जाते हैं।
दो हजार वर्षों की दमन से ऊबकर पश्चिम ने पूरा चक्र पलट दिया। अब repression (दमन) की जगह indulgence (अत्यधिक भोग) नया जुनून बन गया। पहले एक ध्रुव था — repression; अब दूसरा ध्रुव है — indulgence। लेकिन बीमारी वही रही।
सेक्स को न दबाना है, न पागल होकर भोगना है। सेक्स को रूपांतरित करना है। और रूपांतरण का केवल एक ही तरीका है: सेक्स में पूरी सजगता (meditative awareness) के साथ प्रवेश करना।
जैसे मैंने क्रोध के बारे में कहा था, वैसे ही: सेक्स में प्रवेश करो, लेकिन पूरी चेतना के साथ, सजग रहकर। इसे अचेतन शक्ति मत बनने दो। धकेले और खींचे मत जाओ। इसे जान-बूझकर, समझदारी से, प्रेमपूर्वक जियो। लेकिन इसे ध्यान का अनुभव बना दो। यही है तंत्र (Tantra)।
जब आप सेक्स को ध्यानपूर्वक जीते हैं, उसकी गुणवत्ता बदलनी शुरू हो जाती है। वही ऊर्जा, जो केवल जैविक अनुभव की ओर बह रही थी, अब चेतना की ओर बहने लगती है।
यौन चरमोत्कर्ष (sexual or**sm) में आप जितने सजग हो सकते हैं, उतने किसी और अनुभव में नहीं हो सकते — क्योंकि कोई और अनुभव इतना गहरा, इतना absorbing, इतना सम्पूर्ण नहीं होता। उस क्षण आप पूरे अस्तित्व से सम्मिलित होते हैं — शरीर, मन दोनों पूरी तरह उसमें होते हैं। और एक क्षण के लिए विचार पूरी तरह रुक जाता है। उस क्षण, आप केवल होते हैं — बिना किसी विचार के।
यदि उस क्षण आप सजग हो सकें, तो सेक्स आपके लिए दिव्यता का द्वार बन सकता है। और उस क्षण की चेतना को आप अन्य अनुभवों में भी ले जा सकते हैं। धीरे-धीरे यह आपके जीवन का हिस्सा बन सकती है। तब खाते हुए, चलते हुए, काम करते हुए — वह सजगता साथ बनी रहती है।
और जब आप ध्यानमग्न होते हैं, तो एक नई सच्चाई सामने आती है:
आनंद आपको सेक्स से नहीं मिलता। आनंद आपको उस विचारहीन अवस्था से मिलता है, उस पूर्णता से मिलता है।
एक बार आप यह समझ लें, तब सेक्स की ज़रूरत कम होती जाएगी। क्योंकि वही thoughtless state (विचारहीन अवस्था) ध्यान के द्वारा भी पाई जा सकती है। वही सम्पूर्णता सेक्स के बिना भी आ सकती है। और एक दिन आएगा जब सेक्स की आवश्यकता नहीं रहेगी।
सेक्स हमेशा दूसरे पर निर्भर करता है, इसलिए उसमें दासता बनी रहती है। लेकिन जब आप बिना किसी पर निर्भर हुए, भीतर से ही वही परमानंद पैदा कर सकते हैं, तब आप स्वतंत्र हो जाते हैं। यही है ब्रह्मचर्य का अर्थ — पूर्ण स्वतंत्रता।
ध्यान से सेक्स ऊर्जा का रूप बदलता है, उसका नाश नहीं होता। जब उसका रूप यौन नहीं रहता, तब वह प्रेम बन जाती है।
यौन व्यक्ति वास्तव में प्रेम नहीं कर सकता। उसका प्रेम केवल बहाना है — सेक्स तक पहुँचने का साधन। लेकिन जब ऊर्जा भीतर बहने लगती है और व्यक्ति अपने भीतर से परमानंदित (auto-ecstatic) हो जाता है, तब उसका प्रेम पहली बार सच्चा होता है। उसका प्रेम तब निरंतर बरसता है, निरंतर बाँटता है, निरंतर देता है।
लेकिन यह पाने के लिए आपको सेक्स के विरोध में जाने की ज़रूरत नहीं है। इसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानें। इसे जीएँ — बस अधिक सजगता के साथ।
चेतना ही वह स्वर्णिम पुल है — इस संसार से परलोक तक, नर्क से स्वर्ग तक, अहंकार से दिव्यता तक।
आज के लिए इतना ही।
— ओशो
माय वे: द वे ऑफ द व्हाइट क्लाउड्स
अध्याय ५ — Dropping the Ego Now
१४ मई १९७४, बुद्ध हॉल
23/09/2025
🥰 thought by osho 🥰
by osho # 🥰🥰
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