Poetry

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05/03/2025

यही  काशी, यही गंगा, यही धारा , किनारा  था
यहीं पर तेरी आँखों से, बहा आँसू हमारा था
समय की इस रवानी में बहुत बरसा बहुत सूखा
यहीं पर अब नहीं हूं कुछ, यहीं पर तब सितारा था

- दिव्यांश पाठक

#हिंदी #कविता #शायरी

04/01/2025

सुबह ऑफिस के लिए एक और बैग लेकर निकला, क्योंकि ऑफिस से सीधा घर की ट्रेन पकड़नी थी। तो काम के समान के साथ आराम का समान भी था।  सामन के साथ कैब का वेट कर रहा था, सामने ठेले पर चाय खौलते हुए दिख गई। मैने सोचा कि सीच लिया जाए, अपने को। चाय वाली चाची से चाय लेकर सड़क किनारे खड़ा होकर पी रहा था। 

चाची, कुछ गौर से मेरे बैग को देख रही थीं। जो कि सामान्य सा था, किंतु ट्रॉली के हैंडल के साथ। कुछ देर, बैग के ट्रॉली हैंडल को, हर तरफ से निहार के, हारने के बाद बोलीं, संदेह वाचक वाक्य में :- पंप है... नू? 

मैने उनको देखा, और फिर, वो क्या देख रही हैं, उसको देखा...। मैं - हां.... पंप है।

वो (मुझको, अविश्वास के साथ जांचते हुए)- साइकिल से हो... 

मै - नहीं.... नीचे चक्का लगा है, बैग के। उसमें हवा भरा जाता है। 

वो - अच्छा .... बहुत औज़ार  लगा है

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