Social activist Deepak Raghav

Social activist Deepak Raghav

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Career Coach , Parenting Coach, School Consultant
Founder & Director - Struggle For Change

04/10/2023

पॉज़िटिव पेरैंटिंग करें, हमेशा!
बच्चों को दो पड़ाव पर विशेष रूप से संभालना चाहिए- पहला, जब वो नया-नया चलना सीखते हैं। दूसरा, जब वो बचपन से जवानी में कदम रखते हैं।
बच्चे अपने असामान्य व्यवहार से हमें कुछ बताना चाहते हैं। हो सकता है वे हमारा ध्यान किसी ऐसे मुद्दे की तरफ आकर्षित करना चाहते हों जिसे संभालने में वे खुद को असक्षम पा रहे हों। उनके असामान्य व्यवहार से परेशान होने की बजाय, उसका कारण समझें।
पेरैंटिंग निरंतर चलने वाली प्रिक्रिया है। पहले माता-पिता बच्चों की पेरैंटिंग करते है, और एक उम्र के बाद बच्चे माता-पिता की पेरैंटिंग करते हैं।
यह ज़रूरी है कि बच्चों के साथ पेरैंट्स के संबंध स्वस्थ, सम्मानजनक और सकारात्मक हों ताकि बड़े होकर वे अवांछित, नकारात्मक संबंधों को नकार सकें।
पढने और सीखने में फर्क है। हो सकता है बच्चे पढाई से नफरत करते हों लेकिन सीखने के लिए उत्साहित हों। बच्चों को सीखने के लिए प्रेरित करें।
करियर आपके बच्चों के जीवन एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन हिस्सा ही है, सम्पूर्ण जीवन नहीं। बच्चों को जीवन के बाकी हिस्सों को भी जीने के लिए प्रेरित करें।
दीपक एस राघव -9953635550
सर्टिफाइड करियर कोच, पेरैंटिंग कोच

04/10/2023

विद्यांतरिक्ष पेरैंटिंग सीरीज (रिमाइंडर)
पार्ट 1
1. हर दिन कम से कम तीन लोगों की तारीफ करें।
2. एक पालतू कुत्ता रखें।
3. निरंतर अंतराल पर सूर्योदय देखें।
4. लोगों के जन्मदिन याद रखें।
5. हाथ ऊर्जा और दृढ़ता से मिलाएं।
6. हर बार, धन्यवाद ज़रूर करें।
7. 'कृपया' का खूब प्रयोग करें।
8. कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखें।
9. नहाते समय गाना गुनगुनाएं।
10. अच्छी किताबें खरीदें, भले ही उन्हें पढ़ न पाएं।
11. बरसात में पेड़ लगाएं।
12. आगे बढ़कर पहले अभिवादन करें।
13. चादर से बाहर पैर न पसारें।
14. कार सस्ती चलाएं, लेकिन घर बेहतरीन बनाएं।
15. दूसरों को क्षमा करते रहें, और खुद को भी।
भावानुवाद: दीपक एस राघव
लेखक: जैक्सन ब्राउन जूनियर

04/10/2023

आप बच्चों को जंगल में भेजेंगे या ओलिंपिक?
प्रतिष्ठित आईआईटी-जेईई परीक्षा पास करने के बाद जब बच्चे आईआईटी में एडमिशन लेकर अपना कोर्स शुरू करते हैं तो उनमें से काफी बच्चे वहां के माहौल और स्टडी रूटीन में एडजस्ट नहीं हो पाते. इस विषय पर आईआईटी हैदराबाद में एसोसिएट प्रोफेसर मोहन राघवन ने हाल में अपने लेख के माध्यम से बहुत सुंदर बात कही. राघवन के अनुसार बच्चों के एडजस्ट न कर पाने के पीछे एक मुख्य वजह होती है उनका कोचिंग लेना.
IIT-JEE के लिए कोचिंग लेने वाले बच्चों की तुलना वो ओलिंपिक के लिए तैयारी कर रहे किसी एथलीट से करते हैं. ये एथलीट पूरी तरह से अपने कोच के मार्गदर्शन में काम करता है. कोच द्वारा बनाये गए एक कठिन, तय रूटीन को सख्ती से फॉलो करता है. कब जागना है, कब सोना है, क्या डाइट होगी, क्या नहीं खाना है, कितनी एक्सरसाइज करनी है, किससे मिलना है, मोबाइल का प्रयोग कितना करना है, दौड़ कितने समय में पूरी करनी है, आदि सब कुछ ये कोच तय करता है. यानि एथलीट की लाइफ पूरी तरह से कोच के कंट्रोल में होती है. एथलीट पूरी तरह से गाइडेड होता है.
इसी तरह, कोचिंग लेने वाले बच्चों की लाइफ भी पूरी तरह से कोचिंग सेंटर के कंट्रोल में होती है. बच्चों को सिर्फ कोचिंग सेंटर के निर्देशों की पालना करना होता है. ऐसे में जिन बच्चों को कामयाबी मिल जाती है, आईआईटी में एडमिशन हो जाता है, तब ये बच्चे वहां भी उस एथलीट वाले गाइडेड माइंडसेट से ही जाते हैं. लेकिन राघवन के अनुसार आईआईटी में लाइफ पहाड़ों या किसी घने जंगल से में गुम हुए किसी खोजकर्ता की तरह होती हैं. जंगल या पहाड़ों में खोजकर्ता को अपनी मंज़िल और रास्ता खुद ही तय करना होता है. यदि चोटी पर पहुंचना उसकी मंज़िल है तो वहां पहुँचने के कई रास्ते होते हैं. सबसे उचित रास्ता कौन सा रहेगा, यह भी उन्हें खुद ही चुनना होता है. वहां गाइड करने वाला कोई नहीं होता. एक कंट्रोल्ड और गाइडेड वातावरण और माइंडसेट से जब बच्चे अनगाइडेड और स्वतंत्र माहौल में आते हैं तो उन्हें लगता है जैसे वो कहीं गुम हो गए हैं. आदत अनुसार उन्हें गाइडेंस चाहिए होती है और वहां रास्ता बताने वाला कोई नहीं. ऐसे में बच्चों को बहुत परेशानी होती है.
अब इसी उदाहरण को आप अपने बच्चों पर लागू कीजिए. आप उन्हें क्या आदत डाल रहे हैं? अधिकतर पेरेंट्स गाइडेड और कंट्रोल्ड माहौल की. पेरेंट्स या स्कूल टीचर्स बच्चों को बचपन से ही कोचिंग देना शुरू कर देते हैं. क्या करना है, क्या नहीं करना है, कैसे करना है, क्या पहनना है, कितना खेलना है, कितना पढ़ना है, क्या खाना है आदि न जाने कितने बनिर्देश हर रोज़ हम अपने बच्चों को देते देते बड़ा करते हैं. हम उनकी भलाई के नाम पर, उनके बचपने के नाम पर, उनकी नासमझी के नाम पर, उन्हें गाइडेंस की, निर्देशों की ड्रग्स देते रहते हैं. हम उनकी लाइफ को कंट्रोल करना चाहते हैं और करते हैं.
पेरेंट्स को लगता है कि ज़िन्दगी एक ओलिंपिक है और उनके बच्चों को मेडल जीतना ही है. फिर पेरेंट्स बच्चों को स्पेशलाइज़्ड कोचिंग के लिए इंस्टीटूट्स में भेज देते हैं. वहां कुछ बच्चों का सेलक्शन हो जाता है उनमें से भी काफी एडजस्ट नहीं कर पाते. लेकिन उनकी सोचिए जिनका सेलक्शन नहीं होता. उनका माइंडसेट कैसा होता होगा. वो अपनी असफलता को कैसे हैंडल करते होंगे? असफल होने पर पेरेंट्स भी उन बच्चों को खुद के भरोसे छोड़ देते हैं. कोई गाइडेंस नहीं. एक तो असफलता और उस पर जीवन के जंगल में अकेले गुम.
समाधान क्या है? बच्चों को ओलिंपिक में मैडल लाने के लिए तैयार करने से बेहतर है उन्हें बचपन से ही जंगल में छोड़ दें. उनकी अपनी मंज़िल, अपना रास्ता. देर सवेर ढूंढ कर पा ही लेंगे. जीवन कोई ओलिंपिक नहीं जिसे सब कुछ छोड़कर हर वक़्त जीतने की तैयारी में लगे रहें. जीवन तो जंगल है जिसका आनंद लेते हुए अपनी मज़िल की तरफ बढ़ना है. अब आप तय कीजिए कि आप अपने बच्चों को ओलिंपिक की रेस (कंट्रोल्ड और गाइडेड) दौड़ाएंगे या उन्हें जंगल (अनगाइडेड और स्वतंत्र) में छोड़ेंगे? और ये हमें बचपन से ही करना होगा.
दीपक एस राघव -9953635550
करियर और पेरैंटिंग कोच

04/10/2023

ज़रूर पढ़ें
पेरैंटिंग के सबक और बुजुर्गों को सीख
विंग कमांडर डीपीएस बाजवा (सेवानिवृत्त)
जब मेरे बेटे को कनाडा में पहली नौकरी मिली, तो मैंने उससे उसके वेतन के बारे में पूछा. मुझे लगा था कि एक पिता के रूप में यह जानना मेरा अधिकार सा ही है कि उसे कितनी सैलरी मिलती है. मुझे आश्चर्य हुआ जब उसने मुझे बताया कि कनाडा में कोई किसी से उनकी आमदनी नहीं पूछता. यह जानना मेरे लिए एक सांस्कृतिक शॉक जैसा था. धीरे धीरे इस सूची में और भी प्रश्न जुड़ते गए जैसे 'किसी अजनबी से उसकी उम्र कभी न पूछें', 'वे कहाँ के हैं', आदि.
मेरे पोते-पोतियां किशोरावस्था में हैं. उनके संदर्भ में मेरे और मेरी पत्नी के लिए कुछ और भी 'दिशानिर्देश' हैं. जब हम कनाडा पहुंचे और हवाई अड्डे से बाहर निकल रहे थे तो हमारे बेटे ने हमें सावधान किया कि हमारी पोती का वजन बढ़ गया है, लेकिन हमें उससे इस बारे में कोई बात नहीं करनी थी. हमारे दिनों में, परिवार में ऐसी बातों पर चर्चा करना वर्जित होना तो दूर, बड़ी आम बात थी. बच्चों को वज़न घटाने की सलाह देना सामान्य सी बात थी. लेकिन अब, माता-पिता या दादा-दादी के रूप में, हम इस विषय पर चर्चा नहीं कर सकते क्योंकि इसे बॉडी शेमिंग माना जाता है.
इसी तरह, जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो माता-पिता उनसे यह सवाल करने का अधिकार भी खो देते हैं कि वे कहाँ और क्यों जा रहे हैं. दादा-दादी के रूप में भी, हम उनसे पूछ नहीं सकते न ही उन्हें सलाह दे सकते. जब हम बच्चे थे तो हमें अपने माता-पिता से सवाल किए बिना उनकी सलाह सुननी और माननी होती थी. लेकिन अब जब हम माता-पिता बनें हैं तो हमें ही बच्चों की बात सुननी होगी.
हाल ही में, हमारा बेटा और बहू हमें अपने दो पोते-पोतियों की जिम्मेदारी सौंपकर दो सप्ताह की छुट्टी पर चले गए. हमें बहुत दिक्कत हुई. यह तय करना कठिन था कि उनके लिए क्या पकाया जाए क्योंकि जैसे ही उन्हें पता चला कि भोजन भारतीय है उनकी भूख गायब हो जाती थी. वे बाहर से खाना ऑर्डर करने का कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेते. चूँकि मेरी पत्नी कॉन्टिनेंटल व्यंजन नहीं बना सकती, इसलिए वे बस इतना कहते थे: हम कुछ समय के लिए दोस्तों के साथ घूमने जा रहे हैं. बाद में, वे रात का खाना खाकर लौट आते. और जब तक वो घर वापस नहीं लौट आते थे हम चिंता और तनाव में जागकर उनका इंतज़ार करते रहते.
इसी दौरान हमारे पोते का जन्मदिन था तो उसने अपने दोस्तों को घर पर आमंत्रित कर लिया. मैंने ड्रिंक्स और नाश्ता लाने में और अन्य तैयारियों में उसकी मदद की. लेकिन उसके दोस्तों के आने से पहले, उसने धीरे से हम दोनों को अपने बेडरूम में जाने और पार्टी के दौरान बाहर न आने की हिदायत दी. हमें अजीब और बुरा लगा जैसे कि हम उसके दोस्तों के सामने प्रस्तुत करने योग्य नहीं थे. हालाँकि हमारा भी उनकी पार्टी में दखलअंदाज़ी करने का कोई इरादा नहीं था लेकिन मजबूरन हमें अदृश्य कर देना मेरी समझ से बाहर था. जब भारत आकर मैंने यह सब अपनी बहन के साथ साझा किया तो उसने भी कहा कि जब वह विदेश में अपने पोते से मिलने गई थी तो उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.
यह प्रतिबंधात्मक व्यवहार मुझे बड़ा अजीब लगता है लेकिन सोशल मीडिया पर बुजुर्गों के लिए "क्या करें, क्या न करें" सूची पढ़कर सांत्वना मिलती है. ये लिस्ट कहती है कि 65 वर्ष की आयु के बाद: (i) कठोर तरीके से जीना सीखें; (ii) कम बोलें और अधिक सुनें. हर किसी को सलाह मत देते रहें; (iii) हर किसी को यह न बताएं कि आपको क्या तकलीफ हो रही है; (iv) जो कुछ दिया जाए उसे चुपचाप खा लें क्योंकि बहुत लोग ऐसे भी हैं जो भूखे सो जाते हैं; (v) अकेले रहना सीखें क्योंकि आपके जीवनसाथी का कभी भी निधन हो सकता है; (vi) दूसरे क्या कहेंगे इसकी परवाह किए बिना अपनी सभी इच्छाएं पूरी करें, या वह सब करें जिससे आपको खुशी मिलती है; (vii) कभी भी यह महसूस न करें कि जीवन में अब क्या बचा है, क्योंकि सूखे फल हमेशा ताजे से अधिक महंगे होते हैं!
भावानुवाद: दीपक एस राघव -9953635550
सर्टिफाइड करियर कोच, पेरैंटिंग कोच

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