Braj Raj Darshan
वृन्दावन सो वन नहीं, नंदगांव सो गांव वंशीवट सो वट नहीं, कृष्ण नाम सो नाम
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श्री बांके बिहारी लाल की जय हो
आप सभी का हिन्दू नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाए !
(हिंदू नव वर्ष, जिसे नव संवत्सर भी कहते हैं, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है, जो आमतौर पर मार्च-अप्रैल में पड़ता है। इस वर्ष 2026 में यह 19 मार्च से शुरू होकर विक्रम संवत 2083 का प्रारंभ करेगा। यह नया साल प्रकृति में बदलाव, चैत्र नवरात्रि की शुरुआत और फसलों के कटने (गुड़ी पड़वा) का प्रतीक है।)
चेत्र नवरात्रि Coming Soon |
19-27 March 2026
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करमानन्द जी अपने गायन से प्रभु की सेवा किया करते थे। इनका गायन इतना भावपूर्ण होता था कि पत्थर-हृदय भी पिघल जाता था। ज्यादा दिनों तक इनको गृहस्थी रास नहीं आयी और ये सब कुछ छोड़कर निकल पड़े। इनके पास केवल दो चीजें ही थीं एक छड़ी और दूसरा ठाकुरबटुआ जिसे ये गले में टाँगे कर चलते थे।
ये जहाँ विश्राम करने के लिये ठहरते वहाँ छड़ी को गाड़ देते और उस पर ठाकुर बटुआ लटका देते थे। इससे ठाकुरजी को झूला झूलने का आनन्द मिलता था।
एक दिन ये सुबह-सुबह ठाकुरजी की पूजा करके श्री ठाकुरजी को गले में लटका कर चल दिए। उस समय ये भगवन्नाम में इतने डूबे हुए थे कि छड़ी को लेना भूल गए। अब जब दूसरी जगह ये विश्राम करने के लिये रुके तो इन्हें छड़ी की याद आयी। अब समस्या थी कि ठाकुरजी को कैसे और कहाँ पधरावें। श्री ठाकुरजी में प्रेम की अधिकता के कारण इन्हें उनपर प्रणय-रोष हो आया।
ये गुस्सा करते हुए बोले कि ‘ठाकुर हम तो जीव हैं, हम कितना याद रखें। हम छड़ी भूल गए थे तो आपको याद दिलाना चाहिए था। अब दूसरी छड़ी कहाँ से लाएँ ? पिछली जगह भी बहुत दूर है और ये भी पक्का नहीं है कि वहाँ छड़ी मिल ही जाए।’
ये ठाकुरजी से खूब लड़े और बोले–‘अब हमें छड़ी लाकर दो।’ श्री ठाकुरजी इनकी डाँट-फटकार पर खूब रीझे। प्रभु की योगमाया से तभी एक बालक छड़ी लेकर आ गया तथा बोला–‘बाबा ! कब से आपको पुकारता आ रहा हूँ आप हैं कि सुनते ही नहीं। ये छड़ी छोड़ कर चले आये थे, लीजिये अपनी छड़ी।’ इतना कह वह बालक वहाँ से गायब हो गया। अब तो करमानन्द जी रोने लगे कि ‘उन्होंने प्रभु को क्यों डाटा ?’
जब इन्होंने क्षमा मांगी तो प्रभु ने कहा–‘यह मेरी ही लीला थी, मुझे डाँट सुननी थी।’ भगवान आगे बोले–‘जब यहाँ हम और तुम दो ही हैं तो अगर कुछ कहने-सुनने, लड़ने-झगड़ने की इच्छा होगी तो कहाँ जायेंगे।’ प्रभु की यह बात सुनकर श्री करमानन्द जी प्रेम सागर में डूब गए।
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