Sethi Rasayan Shala
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12/05/2026
धर्म साधना, आयुर्वेद और आत्मबल से कैंसर पर जीत : एम्स कर रहा स्टडी
किशनगढ़ । एडवांस स्टेज ओवरी कैंसर, आंतों में संक्रमण, लगातार गिरता वजन और डॉक्टरों द्वारा सीमित जीवन की आशंका जताने जैसी गंभीर परिस्थितियों के बीच राजस्थान के अजमेर जिले के किशनगढ़ की 51 वर्षीय अलका जैन ने अद्भुत साहस, जैन धर्म के संयम और आयुर्वेदिक जीवनशैली के सहारे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी पर विजय प्राप्त की ।
अब उनके स्वास्थ्य सुधार को लेकर चिकित्सा जगत में भी चर्चा हो रही है तथा एम्स जोधपुर के चिकित्सक इस पूरे मामले का अध्ययन कर रहे हैं ।
अलका जैन ने बताया कि बीमारी के दौरान उनकी तीन बड़ी सर्जरी हुईं । लंबे समय तक अस्पताल में उपचार चला, लेकिन उन्होंने मानसिक रूप से हार नहीं मानी ।
उन्होंने जैन धर्म की तप, संयम और अनुशासन की परंपरा को जीवन में उतारते हुए सूर्यास्त के बाद भोजन करना पूरी तरह बंद कर दिया । इसके साथ ही उन्होंने रात्रि में पानी पीना भी त्याग दिया। उनका कहना है कि इससे शरीर को आराम मिला और मानसिक दृढ़ता बढ़ी ।
उन्होंने बताया कि उपचार के दौरान परिवार ने भी पूरा सहयोग दिया। घर में प्रेशर कुकर का उपयोग बंद कर दिया गया तथा भोजन को अधिक प्राकृतिक और सात्विक तरीके से तैयार किया जाने लगा ।
गेहूं, मैदा, चीनी और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन लगभग बंद कर दिया गया। इसके स्थान पर हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक भोजन अपनाया गया ।
अलका जैन ने आयुर्वेदिक जीवनशैली को भी अपने उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया । उन्होंने तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा, शतावरी और पपीते के पत्तों जैसे पारंपरिक हर्बल उपायों का सीमित एवं चिकित्सकीय सलाह के अनुसार सेवन किया ।
आयुर्वेद के अनुसार ये औषधियां रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, शरीर को बल देने और मानसिक तनाव कम करने में सहायक मानी जाती हैं ।
उन्होंने बताया कि केवल दवा ही नहीं बल्कि मानसिक शक्ति ने भी उन्हें इस कठिन दौर से बाहर निकाला । बीमारी के दौरान उन्होंने प्रतिदिन णमोकार मंत्र का जाप किया ।
अलका जैन के अनुसार इस मंत्र के नियमित जाप से उन्हें मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आत्म विश्वास प्राप्त हुआ । जैन धर्म में णमोकार मंत्र को अत्यंत प्रभावशाली और आत्मशुद्धि का मंत्र माना गया है ।
इसके साथ ही उन्होंने जैन धार्मिक ग्रन्थ तत्वार्थ सूत्र, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, समयसार और भक्तामर स्तोत्र का नियमित पाठ भी किया । तत्वार्थ सूत्र जीवन और कर्म सिद्धांत का ज्ञान देता है ।
समयसार आत्मा की शक्ति और आत्मचिंतन का संदेश देता है। रत्नकरण्ड श्रावकाचार संयमित और अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा देता है ।
भक्तामर स्तोत्र को मानसिक शक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ाने वाला माना जाता है ।
इलाज के दौरान चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में बताए गए स्वास्थ्य सिद्धांतों का भी पालन किया गया ।
आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार रोग के समय केवल औषधि ही नहीं बल्कि मन की स्थिति, सकारात्मक विचार, सात्विक भोजन और संयमित दिनचर्या भी रोगमुक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।
विशेषज्ञों का कहना है कि तनाव, भय और निराशा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करते हैं, जबकि ध्यान, प्रार्थना, मंत्र जाप और अनुशासित जीवनशैली मानसिक एवं शारीरिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं ।
आज अलका जैन की कहानी कई लोगों के लिए प्रेरणा बन रही है । यह उदाहरण बताता है कि आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेदिक अनुशासन और जैन धर्म की आध्यात्मिक साधना का समन्वय व्यक्ति को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी संघर्ष करने की शक्ति दे सकता है ।
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09/05/2026
अपराजिता के नीले फूल और ब्लू टी सायटिका एवं नसों के दर्द में लाभकारी
ब्लू टी अर्थात अपराजिता के नीले फूलों से बनी चाय । इसके ताजे या सूखे फूलों को पानी में उबालकर छान लें और सुबह खाली पेट सेवन करें । ब्लू टी को लेकर आजकल बाज़ार में अनेक दावे किए जाते हैं ।
आयुर्वेदिक और पारंपरिक उपयोगों के अनुसार अपराजिता के फूल और ब्लू टी तनाव और मानसिक थकान कम करने में उपयोगी, पाचन क्रिया को संतुलित करने में मददगार, सायटिका एवं नसों के दर्द में राहत देने में सहायक, एंटी ऑक्सीडेंट गुणों के कारण त्वचा और बालों के लिए लाभकारी, स्मरण शक्ति और एकाग्रता में सहायक है ।
अपराजिता का पौधा घर में आसानी से लगाया जा सकता है। घर पर उगाकर ताजे फूलों का उपयोग करना अधिक शुद्ध और किफायती विकल्प है। अनावश्यक महंगे उत्पादों पर धन खर्च करने के बजाय प्राकृतिक रूप में इसका लाभ लें । हर व्यक्ति की प्रकृति अलग होती है ।
उचित मात्रा और सीमित मात्रा में अधिकतम 1-2 माह तक ही उपयोग करना है । सेवन से पहले आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें ।
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