Evolution Through Spiritual Wisdom
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22/11/2025
ऊँ श्री गणेशाय नमः ! ऊँ श्री परमात्मने नमः ! ऊँ नमः शिवाय ! ऊँ श्री शारदाय नमः ! ऊँ श्रीमद भगवद्गीताय नमः ! ऊँ श्री अर्जुनाय नमः ! ऊँ श्री राधा कृष्णाय नमः ! ऊँ श्री वेद व्यासाय नमः !
खटीमा, उत्तराखंड देव भूमि, 22-11-2025, शनिवार
विषय : भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक संख्या 5-6 को समझने का विनम्र प्रयास
मनुष्य को अपना उद्भव एवं विकास स्वयं के कठोर परिश्रम एवं आत्म अनुशासन एवं संयम से स्वयं ही करना चाहिए, किसी की प्रतीक्षा नही करनी चाहिए कि कोई हमारे लिए कुछ करेगा फिर लक्ष्य चाहे भौतिक प्रगति हो अथवा अध्यात्मिक प्रगति हो .
कोई भी किसी के लिए कुछ विशेष कार्य नही कर सकता है, यहाँ तक कि पिता भी अपने पुत्र या पुत्री के लिए केवल कुछ सीमा तक ही सहायता कर सकता है, उसके बाद हर किसी को अपना काँटों भरा हुआ मार्ग स्वयं ही तय करना पड़ता है .
यह जीवन comedy show नही है, यह एक सतत संग्राम ही है .
आत्म विकास के मार्ग में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यद्यपि मैं परम ब्रह्म परमात्मा हूँ फिर भी तुम्हारे लिए कुछ विशेष नही कर सकता हूँ, अपने जीवन का युद्ध तुमको स्वयं ही लड़ना होगा , आत्म विकास तुमको अपना स्वयं ही करना होगा .
" उद्धरेत आत्मना आत्मानम् न आत्मानम् अवसादयेत्,
आत्मा हि आत्मन: बंधु: आत्मा एव रिपु आत्मनः . 5
बंधु: आत्मा आत्मनः तस्य येन आत्मा एव आत्मना जितः,
अनात्मन: तु शत्रुत्वे वर्तेत आत्मा एव शत्रुवत . " 6
अर्थ : मनुष्य का परम एवं प्रथम कर्तव्य है कि वह अपने ही पुरुषार्थ एवं कठोर परिश्रम और आत्म संयम से अपना विकास करे, और आत्म विकास की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त हो जाने पर उसको उस सर्वोच्च स्थिति में बनाये रखे और किसी भी स्थिति में स्वयं को निम्न स्तर पर न गिराए, और न ही जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों के आने पर स्वयं को अवसाद ग्रस्त करे . इसका मतलब है कि व्यक्ति को कभी भी अवसाद, भय, डिप्रेशन एवं हताशा का शिकार नही होना चाहिए बल्कि हताशाओं को ही हताश करे, भय को ही भयभीत कर दे, परेशानी को ही परेशान कर दे और असफलताओं को असफल कर दे, चुनौतियों को ही चुनौती दे डाले . जो ऐसा करने मे सफल हो जाता है, वह व्यक्ति स्वयं ही स्वयं का हितैषी बंधु है और जो ऐसा करने मे सफल नहीं हो पाता है वह व्यक्ति स्वयं ही स्वयं का शत्रु होता है और अपनी ही हत्त्या स्वयं ही कर लेता है .
निर्मल मन एवं सरल हृदय कृष्ण की सरल बातों को केवल वोही व्यक्ति समझ सकता है जिसका मन निर्मल है और हृदय सरल . व्यक्ति को अपने ही जीवन में अपना विकास स्वयं के कठोर परिश्रम एवं अनुशासित जीवन से स्वयं ही करना पड़ता है और जो ऐसा करने मे विफल रहते हैं वो जमाने की भीड़ में खो जाते हैं . राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक महान विभूतियों ने जन्म लेकर अपना नाम प्रकाशित किया है, लोग केवल उनका नाम ही जानते हैं उनकी संतान का नही.
प्रायः महान पुरुषों की संताने महान नही बन पाती हैं क्योंकि महान बनने के लिए जिस आत्म संयम, अनुशासित जीवन, त्याग और पुरुषार्थ की जरूरत होती है, जिस जुनून की जरूरत होती है वह भावना उनकी संतान मे नही होती है . उदाहरण के लिए सुभाष चन्द्र बोस का नाम सभी जानते हैं किंतु उनकी पत्नी एवं संतान का नाम शायद कोई भी नही जानता होगा या बहुत ही कम लोग जानते होंगे .
आत्म विकास का मार्ग आत्म अनुशासन और आत्म संयम के द्वार ( Gate) से ही प्रशस्त होता है . जिसको आत्म अनुशासन एवं संयम पसंद नहीं है वह कभी भी महान व्यक्ति नही बन सकता है .
इसी बात को विचार कर कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि जो आत्म संयमी है वोही अपना ही मित्र स्वयं ही है और जो आत्म संयमी नही है वह अपना ही शत्रु स्वयं ही है .
सौभाग्य की बात है कि गीता अध्याय 6 का नाम ही आत्म संयम योग है .
विद्यार्थी जीवन में वर्ष 1985 में नैपोलियन बोनापार्ट के जीवन से संबंधित लेख में पढ़ा था कि -
" संयम ही सफलता का श्रोत है . कोई भी व्यक्ति कितना भी धनी क्यों न हो, यदि संयमी नही है तो वह वस्तुतः दरिद्र ही है . संयमहीन व्यक्ति पतन एवं आत्म हत्त्या की गलियों में भटकता फिरता है और एक दिन नष्ट हो जाता है."
उसी समय से मैं संयम की पूजा करने लगा था क्योंकि संयम शिव जी का एक नाम है, शिव सहस्त्रनाम मे शिव जी का एक नाम संयमी भी है .
इसलिए " संयम शरणं गच्छामि, संयम शरणं गच्छामि, संयम शरणं गच्छामि " मैं संयम की शरण में जा रहा हूँ, आप अपने बारे में निर्णय ले कि आपको कहाँ जाना है ?
समाज हित एवं आधुनिक काल के युवाओं एवं युवतियों या आधुनिक पीढी़ के हित की भावना से प्रेरित होकर नैपोलियन बोनापार्ट के जीवन की आत्म संयम से संबंधित एक सत्य घटना को साझा करता हूँ, इसको मैंने विद्यार्थी जीवन में वर्ष 1985 मे अपने BA क्लास की syllabus book " विश्व की विभूतियाँ " में पढ़ा था, आशा करता हूँ कि घटना को लेखक ने किसी प्रमाणिक श्रोत से उद्धरित किया होगा .
जब नैपोलियन बोनापार्ट एक सुंदर स्मार्ट युवक विद्यार्थी थे उस समय वह एक मकान में किराये पर रहते थे, उनके पास मे एक सुंदर युवती रहती थी, वह नैपोलियन बोनापार्ट को अपने ही सुंदरता के जाल में फंसाना चाहती थी किंतु नैपोलियन बोनापार्ट उसमें रुचि नहीं लेता था और अपनी ही पुस्तकों में डूबा हुआ रहता था . फिर एक दिन नैपोलियन बोनापार्ट अपने ही देश की सेना का General बन गया अर्थात सर्वोच्च अधिकारी बन गया था. फिर नैपोलियन बोनापार्ट सिविल ड्रेस में उस युवती से मिलने गया और पूछा था कि क्या यहाँ नैपोलियन बोनापार्ट नाम का युवक रहता था, वह युवती नैपोलियन बोनापार्ट को पहचान न सकी थी, उसने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा था कि, " श्रीमान जी ! इतने नीरस व्यक्ति की बात मत करो, वह तो इतना नीरस था कि कभी भी मुस्करा कर बात तक नही करता था, वह केवल किताबों में ही खोया हुआ रहता था . "
उसकी बात सुनकर नैपोलियन बोनापार्ट ने कहा कि -
" महोदया ! संयम ही अपार सफलता का श्रोत है, संयम के वित्त से ही व्यक्ति महान बनता है, जो संयमी नही है वह वस्तुतः बहुत ही दरिद्र व्यक्ति है . यदि नैपोलियन बोनापार्ट तुम्हारी सुंदरता की रसिकता मे खो गया होता तो आज देश का प्रधान सेनापति होकर तुम्हारे सामने नही खड़ा होता . "
संयम की इन बातों ने मुझको संयमी होने की प्रेरणा प्रदान की थी और इसी बात की प्रेरणा उपनिषद, पुराण, महाभारत, भगवद्गीता एवं रामायण भी देते हैं .
24/08/2025
ओम गणेशाय नमः ! ओम नमः शिवाय ! ओम शारदाय नमः !
श्री सीता रामाय नमः !
सायं काल 24-8-2023
आज का विशेष विषय : श्री रामचरितमानस महान दिव्य ग्रंथ की श्रेष्ठता ,
पारिवारिक सद्भाव मे श्री रामचरितमानस का अभूतपूर्व योगदान,
व्यक्तित्व विकास मे अद्भुत योगदान
इस अनुपम ग्रंथ को यदि कर्तव्य शास्त्र कहा जाय तो शायद अनुचित नहीं होगा
श्री रामचरितमानस की महिमा लिखने के योग्य नहीं हूँ, यह सच बात है किंतु खाली समय व्यतीत करने के लिए कुछ विनम्र प्रयास कर रहा हूँ . इसकी सही महिमा तो गोस्वामी तुलसीदास जी ही जानते हैं .
अनेक पुराणों, वालमीकि रामायण, मूल महाभारत एवं अनेक उपनिषदों, भगवद्गीता आदि का गहन अध्ययन करने के बाद अपना निश्चित विचार या निष्कर्ष यही निकला कि इतनी मेहनत करने की कोई जरूरत ही नहीं थी, संपूर्ण ज्ञान श्री रामचरितमानस मे उपलब्ध है, भगवद्गीता का ज्ञान भी श्री रामचरितमानस मे हिंदी अवधी भाषा में उपलब्ध है .
सन 1960 के दशक की भारतीय फिल्मों में प्रायः ऐसा दिखाया जाता था कि घर के लोग श्री रामचरितमानस का नित्य पाठ करते थे . गांवों एवं शहरों में भी एक परंपरा थी श्री रामचरितमानस का पाठ करने की . विद्यालयों में भी श्री रामचरितमानस पर गोष्ठी का आयोजन किया जाता था और अंताक्षरी खेली जाती थी .
इस पावन कर्म के द्वारा सभी को अपने अपने कर्तव्य की शिक्षा मिल जाती थी और समाज एवं परिवार में सुख शांति एवं सद्भाव बना रहता था . अविकसित होने पर भी हम अधिक सुखी थे .
कुछ विद्यालयों में नियमित श्री रामचरितमानस की चौपाई का पाठ किया जाता था . उनमें से कुछ अभी भी याद हैं . उनको साझा करता हूँ .
" धन्य जन्म जग तीतल तासू,
पितहि प्रमोद चरित सुनि जासू .
चारि पदारथ करतल ताके
प्रिय पितु मातु प्राण सम जाके .
प्रात काल उठ के रघु नाथा,
मातु पितहि गुरु नावहि माथा . "
इस प्रकार के पारिवारिक मूल्यों के संस्कारों को दिया जाता था .
इसमें सनातन धर्म के कर्तव्य पालन करने का शोर्ट कट मार्ग बताया गया है कि व्यक्ति कुछ भी न करे केवल अपने ही माता पिता एवं गुरु की सेवा कर ले . यह अकेला कार्य अन्य सभी कर्तव्यों की समानता करता है .
बैसे तो संपूर्ण श्री रामचरितमानस दिव्य ज्ञान का भंडार है किंतु यदि किसी के पास पर्याप्त समय न हो तो केवल अयोध्या कांड का पाठ कर ले तो यह भी पर्याप्त हो सकता है . इसका कारण यह है कि इस विशेष कांड में सभी को अपने अपने कर्तव्य का ज्ञान हो जाता है . एक श्रेष्ठ व्यक्ति का कर्तव्य, एक राजा का कर्तव्य, प्रजा का कर्तव्य, एक पिता का कर्तव्य, एक पुत्र का कर्तव्य, एक भाई का कर्तव्य, एक पत्नी का कर्तव्य, पति का कर्तव्य, मित्र का कर्तव्य, सेवक का कर्तव्य, माता का कर्तव्य आदि सभी का ज्ञान हो जाता है .
आज के समय में लोगों को अपने अधिकार का तो ज्ञान है किंतु अपने कर्तव्य का ज्ञान नहीं है जिसके कारण पारिवारिक संबंध कमजोर हो रहे हैं और दुख की वृद्धि हो रही है .
श्री रामचरितमानस एक अनुपम दिव्य ग्रंथ है . इसका नित्य अध्ययन करने से विशेष सुख शांति एवं आपसी सद्भाव की वृद्धि होती है .
साहित्यकार को समाज हित के लिए चिंतित होना चाहिए ।
साहित्यकार का उत्तरदायित्व है कि शिव जी की भाँति समाज के विष को पीकर अपने ही गले में धारण करे और उस विष की ज्वाला को अकेले ही सहन करते हुए उस विष का शोधन कर उस विष से अमृत का निर्माण कर समाज के हित के लिए समाज को प्रदान करे ।
साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन नही है बल्कि समाज के लिए हितकारी दिशा निर्देश जारी करना है ।
जिस समाज में साहित्य सशक्त होता है वह समाज सशक्त होता है ।
आधुनिकता मे दुष्टता का अंश 90% है, फिर चाहे वो स्त्रियाँ हों या पुरुष, सभी इसकी चपेट में आ गये हैं ।
आधुनिकता कोई गौरव की बात नही है, मुझको तो लज्जा की बात लगती है ।
अपनी प्राचीन सनातनी संस्कृति, संस्कार एवं सभ्यता खोकर लोग स्वयं को सभ्य और आधुनिक कहते हैं ?
ऐसा कहते हुए उनको लज्जा नही आती है ?
Celebrating my 8th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉
सौभाग्य की बात है कि यह पेज आज आठ साल का हो गया है ।
07/05/2025
ओम गणेशाय नमः ! ओम नमो भगवते वासुदेवाय ! ओम नमः शिवाय ! ओम शारादाय नमः ! ओम आचार्य शंकराय नमः !
खटीमा, उत्तराखंड, 07-5-2025
आज का विषय कर्म तत्व पर यानी कर्तव्य पालन करने पर या Ex*****on of duties and responsibilities पर ,
संदर्भ ईशा वास्य उपनिषद, मंत्र या श्लोक संख्या दो, प्रथम भाग
तो कल गणेश जी से मुलाकात हो गई, उन्होंने आग्रह किया कि उपनिषदों पर एक आलेख नित्य लिखा करो और मैंने भी उनको वचन दे दिया कि कम से कम एक आलेख उपनिषदों पर अवश्य ही साझा किया जायेगा । उपनिषदों में प्रथम उपनिषद है ईशा वास्य उपनिषद, इसके प्रथम श्लोक की व्याख्या कुछ दिन पूर्व साझा की जा चुकी है जिसमें कहा गया था कि यह संपूर्ण चर अचर यानी वो प्राणी जो गतिमान रहते हैं वो चर हैं और जो स्थिर रहते हैं जैसे वृक्ष वनस्पति आदि वो अचर कह जाते हैं, तो यह संपूर्ण विश्व या श्रष्टि ब्रमांड Universe ईश्वर की शक्ति से व्याप्त होने के कारण ईश्वर की ही है, ईश्वर ही इसका असली स्वामी या मालिक है । ईश्वर के बनाये गये नियमों के अधीन रहते हुए उसके दिये गए उपहारों को एंजॉय कर सकते हो, भोग सकते हो, किंतु ईश्वर के उपहारों को अपना मत समझो । यहाँ अपना कुछ भी नही है , ऐसा विचार कर दूसरों के धन संपत्ति की इच्छा मत करना । जरा गहराई से सोचो, आखिर यह धन संपत्ति है किसकी ?
सरल शब्दों में, यह धन संपत्ति किसी की नही है, यह तो ईश्वर की ही है , किसी भी मनुष्य की नही है ।
उपरोक्त बात को आगे बढ़ाते हुए श्लोक संख्या दो मे काम करने की बात कही गई है और कहा गया है कि मनुष्य की आयु सौ साल के लगभग होती है तो व्यक्ति जब तक जीवित रहे, कुछ न कुछ काम करता रहे, काम करने से सेवा निवृति न ले अर्थात retirement की योजना न बनाये । मृत्यु समय तक व्यक्ति काम करता रहे, दूसरों पर बोझ न बने । यह बहुत ही कठिन आदेश और निर्देश है कि व्यक्ति सौ साल तक जीवित रहने की भी इच्छा करे और सौ साल तक काम भी करे ।
इसको कहते हैं -
" वकतुम् सुकरम् कर्तुम दुष्करम् . "
यानी जो बातें कहने मे जितनी सरल होती हैं, वो करने मे उतनी ही कठिन होती हैं ।
अरे भाई ! इस दुनिया में इतने दुःख हैं कि जिंदगी जीने की इच्छा ही नहीं रही है, किंतु ईशा वास्य उपनिषद कहता है कि सौ साल तक जियो और सौ साल तक काम भी करो ।
भाई ! मैं तो ऐसा नही कर सकता । सौ साल तक जीना किसी सजा से कम नही है वो भी आधुनिक दुनिया में जहाँ संपूर्ण स्वार्थ भाव एवं आसुरी भाव के अतिरिक्त कुछ भी नही बचा है । स्वार्थ मे लोग संबंधों का ही खून कर देते हैं और अपने ही शत्रु समान पराये बन जाते हैं तो ऐसी स्वार्थी दुनिया में सौ साल जीने की कौन इच्छा करेगा ?
यह बात हजम नहीं हो रही है ।
जैसे ही मैंने उपरोक्त बात का विरोध किया, मेरी डाँट पड़ गई । ईश्वर ने कहा कि इसके अलावा अन्य कोई भी विकल्प उपलब्ध नहीं है, तुमको काम करने के लिए ही भेजा गया है ।
कर्म करने का कोई भी विकल्प उपलब्ध नहीं है ।
ईश्वर ने कहा कि उनकी योजना में retirement प्लान नही है, जब तक जिओगे काम करना ही पड़ेगा अन्यथा बीमारियां हो जायेंगी ।
ईश्वर तो बहुत ही कठोर है यह बात आज पता चली है।
ओम शांति! शांतिः, शांतिः !
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