Lallesh Kumar
I am i independent archaeologist
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13/01/2026
छद्दन्तिय जातकं
ब्राह्मी लिपि (Brahmi Text)
𑀯𑁂𑀤𑀺𑀲𑀸 𑀅𑀦𑀼𑀭𑀸𑀥𑀸𑀬 𑀤𑀸𑀦𑀁
लिप्यंतरण (IAST)
Vedisa Anurādhāya dānaṁ
विदिशा (वेदिसा) की अनुराधा का दान।
ब्राह्मी पाठ (Brahmi Text)
𑀙𑀤𑀦𑁆𑀢𑀺𑀬 𑀚𑀸𑀢𑀓𑀁
लिप्यंतरण (IAST)
chaddantiya jātakaṁ
छद्दन्त (छह-दाँत वाले हाथी) जातक
बहुत प्राचीन काल की बात है। हिमालय के निकट सुवर्णप्रसन्न पर्वत के पास एक घना वन था। उसी वन में एक विशाल बरगद वृक्ष के नीचे एक दिव्य श्वेत हाथी रहता था। उसके छः दाँत थे—इसी कारण वह छद्दन्त कहलाता था। यह हाथी कोई साधारण प्राणी नहीं था; वह पूर्वजन्म में पुण्यवान था और इसी जन्म में बोधिसत्त्व के रूप में जन्मा था। वह हाथियों के एक बड़े समूह का स्वामी था—दयालु, संयमी और करुणामय।
छद्दन्त की दो रानियाँ थीं। उनमें से एक अत्यंत प्रिय और सौम्य स्वभाव की थी—सुभद्रा (सब्बभद्दा)। दूसरी रानी ईर्ष्यालु प्रवृत्ति की थी—चुल्लसुभद्रा (या सुबद्धा)। बोधिसत्त्व का स्नेह अधिकतर सुभद्रा की ओर था। यह बात दूसरी रानी के मन में गहरे असंतोष और जलन का कारण बन गई।
एक दिन वन में विचरण करते समय छद्दन्त ने सुभद्रा को एक दिव्य कमल-पुष्प प्रदान किया। इस घटना को देखकर ईर्ष्यालु रानी का हृदय क्रोध से भर उठा। उसने इसे अपना अपमान समझा। उसी क्षण उसके मन में प्रतिशोध की आग जल उठी।
ईर्ष्या और द्वेष से व्याकुल होकर उसने अन्न-जल त्याग दिया और कठोर तप करने लगी। शीघ्र ही वह उसी तप के कारण मृत्यु को प्राप्त हुई। मरने से पहले उसने यह प्रण लिया—
“मैं अगले जन्म में उस हाथी से प्रतिशोध लूँगी।”
अपने पापमय भाव के कारण वह अगले जन्म में काशी (वाराणसी) के राजा की पत्नी—रानी सुभद्रा के रूप में उत्पन्न हुई। इस जन्म में भी उसका मन बदले की भावना से भरा हुआ था। उसे अपने पूर्वजन्म का स्मरण था, और उसके हृदय में छद्दन्त के प्रति गहरा वैर था।
एक दिन रानी ने राजा से कहा कि उसे छः दाँत वाले श्वेत हाथी के दाँत चाहिए। उसने कहा कि यदि उसके दाँत न लाए गए, तो उसका जीवन ही व्यर्थ है। राजा रानी के आग्रह से व्याकुल हो उठा। उसने राज्य के एक कुशल शिकारी को बुलाया और उसे भारी इनाम का लालच देकर उस दिव्य हाथी के दाँत लाने का आदेश दिया।
शिकारी वन में पहुँचा। उसने काषाय (भिक्षु-सदृश) वस्त्र धारण किए, ताकि कोई उसे हानि न पहुँचाए। छिपकर उसने बोधिसत्त्व छद्दन्त पर बाण चलाया। बाण लगते ही छद्दन्त पीड़ा से कराह उठा, किंतु जैसे ही उसने शिकारी को काषाय-वस्त्रधारी देखा, उसने उसे मारने से स्वयं को रोक लिया। उसने सोचा—
“यह संन्यासी-सा प्रतीत होता है; ऐसे को मारना अधर्म होगा।”
छद्दन्त ने स्वयं शिकारी को पास बुलाया और पूछा—
“तुम क्यों आए हो?”
शिकारी ने सत्य बता दिया कि वह रानी के आदेश से उसके दाँत लेने आया है। यह सुनकर छद्दन्त को पूर्वजन्म की स्मृति हो आई। उसने समझ लिया कि यह उसी ईर्ष्यालु रानी का प्रतिफल है।
करुणा से भरकर बोधिसत्त्व ने स्वयं अपने दाँत कटवाने की अनुमति दे दी। शिकारी ने आरी (खुर / कच्छक) से उसके छहों दाँत काट लिए। अत्यधिक पीड़ा सहते हुए भी छद्दन्त के मुख पर क्रोध नहीं, केवल शांति थी। दाँत कट जाने के बाद उसने वहीं प्राण त्याग दिए।
शिकारी दाँत लेकर काशी पहुँचा। जब रानी ने वे दाँत देखे, तो उसे अपने पूर्वजन्म का सब कुछ स्मरण हो आया। जिस हाथी से वह बदला लेना चाहती थी, वह तो करुणा और त्याग का प्रतीक निकला। यह बोध उसके हृदय को चीर गया। पश्चाताप और शोक से व्याकुल होकर रानी का हृदय फट गया और वहीं उसकी मृत्यु हो गई।
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