JANTA
Medical
30/06/2020
बांदा। डीजल-पेट्रोल के दामों में लगातार हो रही वृद्धि पर कांग्रेस ने मोदी सरकार पर जबरन वसूली का आरोप लगाया है। कहा कि भाजपा के शासनकाल में डीजल पर आठ और पेट्रोल पर ढाई गुना उत्पाद शुल्क बढ़ा है। सरकार ने 6 साल में 18 लाख करोड़ रुपये कमाए हैं। प्रदर्शन के बाद डीएम के माध्यम से राष्ट्रपति को 5 सूत्री ज्ञापन भेजा। इसमें 5 मार्च के बाद बढ़ाई दरें वापस लेने की मांग की है।
सोमवार को कांग्रेसियों ने कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया। इसके पूर्व स्वतंत्रता स्मारक अशोक लाट पर धरना दिया। कलक्ट्रेट में सिटी मजिस्ट्रेट सुरेंद्र सिंह को ज्ञापन सौंपा। इसमें कहा है कि तीन माह में पेट्रोल-डीजल पर बार-बार उत्पाद शुल्क आदि बढ़ाया गया है। सरकार की यह मुनाफाखोरी है।
जबरन वसूली की जा रही है। कहा कि मई 2014 में जब भाजपा सत्ता में आई तो पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 9.20 रुपये और डीजल पर 3.40 रुपये प्रति लीटर था। छह साल में उत्पाद शुल्क पेट्रोल पर 23.78 रुपये और डीजल पर 28.37 रुपये हो गया है। यानी डीजल पर 820 प्रतिशत और पेट्रोल पर 258 प्रतिशत उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि छह साल में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल से 18 लाख करोड़ कमा लिए। लॉकडाउन में मुनाफाखोरी की हदें पार कर दीं। कच्चे तेल का अंतरराष्ट्रीय भाव 20.68 रुपये लीटर है, जबकि डीजल-पेट्रोल 80 रुपये लीटर बिक रहा है।
ज्ञापन देने वालों में जिलाध्यक्ष राजेश दीक्षित, शहर अध्यक्ष पुष्पेंद्र श्रीवास्तव, पीसीसी सदस्य मुमताज अली, महिला अध्यक्ष सीमा खान, शिवबली सिंह, राजेश कुमार दुबे, युवा कांग्रेस नेता केशव पाल, बी. लाल, राजबहादुर गुप्ता, आकाश दीक्षित, राममिलन सिंह पटेल, सैय्यद अलतमश, राजेश द्विवेदी, राजेश गुप्ता, सुनील चौरसिया, पवन देवी, नासिर मंसूरी, सुखदेव गांधी, शमीम मंसूरी, बाबूराम निषाद, सलीम, तौहीद, लाला मंसूरी भी शामिल रहे।
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भारत और चीन के बीच सीमा पर जारी तनाव के बीच रविवार को जापान में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के खिलाफ कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया. टोक्यो में शिबुया स्टेशन के पास हाचिको की प्रतिमा के सामने खड़े होने वालों में जापानी, भारतीय, ताइवानी, तिब्बतीयन और कई अन्य देशों के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं शामिल थे. ये सभी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की विस्तारवादी सोच के खिलाफ सड़क पर उतरे थे.
जाहिर है पिछले कुछ सालों में महत्वाकांक्षी शी जिनपिंग ने काफी उग्रता के साथ सभी पड़ोसी देशों के क्षेत्रों पर अतिक्रमण करने की कोशिश की है. फिर चाहे वो जापान हो, फिलीपिंस, वियतनाम, भारत, या भूटान. चीन ने साउथ चाइना सी, ईस्ट चाइना सी पर भी अपना दावा किया है. जिसको लेकर आशियान देशों में भी नाराजगी है.
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यह बात गौर करने लायक है कि राष्ट्रपति शी ने चीन के अंदर भी लोकतंत्र को तो खत्म कर दिया है. पिछले एक साल से हॉन्गकांग में चल रहे विरोध प्रदर्शन और चीनी राष्ट्रपति द्वारा उसे दबाने की कोशिश भी इसी सोच का नतीजा है. हालात यह है कि जिनपिंग के खिलाफ उठने वाले सभी आवाजों को दबा दिया गया है.
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1950 तक खूबसूरत और शांति प्रिय कहलाने वाला बौद्ध देश तिब्बत आज चीन के विस्तारवाद का शिकार बन गया है. वहीं ताइवान जैसा प्रोग्रेसिव और एडवांस सोच वाला देश भी चीन की कार्यनीतियों की वजह से काफी दबाव झेल रहा है. अभी हाल ही में ताइवान ने चीन की शर्त को ठुकराते हुए वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की मीटिंग में भाग लेने से मना कर दिया था. जाहिर है ताइवान डब्ल्यूएचओ का सदस्य नहीं है और वह वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में पर्यवेक्षक के तौर पर भाग लेने के लिए कोशिश कर रहा था. चीन ने ताइवान को अपना हिस्सा बताते हुए उसे ऐसा करने से मना कर दिया.
जबकि ताइवान साउथ ईस्ट एशिया में उन दो देशों में शामिल है जिसने कोविड 19 के खिलाफ बेहतरीन काम किया है. दूसरा देश है वियतनाम. क्या डब्ल्यूएचओ ने कोविड-19 को लेकर ताइवान द्वारा उठाए गई चिंता पर ध्यान नहीं दिया और इसी वजह से आज वैश्विक तबाही फैली, जिसे कम किया जा सकता था? वहीं इस संदर्भ में अगर चीन की बात करें तो शी जिनपिंग ने पूरे मामले में सच्चाई को छिपाया. यही वजह है कि आज पूरी दुनिया में उनके खिलाफ आवाज उठाई जा रही है.
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जिनपिंग ने अपनी बादशाहत को बरकरार रखने के लिए चीनी कम्यूनिस्ट सिस्टम को भी बरगलाया है. यही वजह है कि आज वहां के नागरिक भी अब इससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं. हॉन्गकांग में पिछले एक साल से चल रहा विरोध प्रदर्शन इस बात की गवाही है.
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