Manoj Manav

Manoj Manav

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राष्ट्रीय संयोजक,
संविधान रक्षक सेना।

15/07/2026

"कोई बता रहा हो"
✍️ Manoj Manav

15/07/2026

सोनम वांगचुक से दूरी और राम मंदिर में चोरी, इसके पीछे का खेल समझिये- ✍️ Manoj Manav

देश व प्रदेश में सुनियोजित 'डिस्ट्रैक्शन मॉडल' की राजनीति के तहत प्रत्येक दलित, पिछड़े व आदिवासी वर्ग के व्यक्ति को सरकार पूरी तरह से उलझाने में कामयाब हो चुकी हैं, जिसके परिणाम स्वरूप दलित-पिछड़े वर्गों के नेता तथा हक-अधिकार की लड़ाई लड़ने वाले लोग असहाय होकर सरकार के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो चुके है।

जिस प्रकार से 2027 से पहले एक सोची समझी रणनीति के तहत हिंदू बनाम हिंदू यानि राम मंदिर निर्माण बनाम राम मंदिर में चोरी की राजनीति की शुरुआत हुईं है, उसका मकसद सिर्फ़ इतना है कि हिंदू बनाम हिंदू की एक नई प्रकार की राजनीति की नींव रखकर बहुजन बनाम सर्वजन अर्थात दलित-पिछड़े वर्गों की राजनीति को हमेशा के लिए दफना दिया जाय।

आप जरा सोचिये, जबसे इस राजनीति की शुरुआत हुईं है लगातार संवैधानिक आवाज दब रही है, दलित-पिछड़े वर्गों के महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे जातीय जनगड़ना, आरक्षण इत्यादि को पूरी तरह से हाशिये पर धकेल दिया गया। और यही नहीं बल्कि सोनम वांगचूक जैसे व्यक्ति को इस्तीफा लेने के नाम पर सिर्फ़ इसलिए बैठाया गया है कि दिल्ली और देश की राजनीति इस्तीफा के इर्द गिर्द घूमती रहे और जो जरुरी मुद्दे हैं उन्हें लम्बे समय तक हाशिये पर रखकर उसका इतिश्री कर दिया जाय।

इसलिए उत्तर प्रदेश मे राम मंदिर मुद्दा और दिल्ली मे सोनम वांगचूक का इस्तीफा मुद्दा दोनों को उछालने के पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ किसका हाथ है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। और इन मुद्दों से देश के वे जरुरी मुद्दे जो हासिये पर चले गये वे कौन से मुद्दे थे और कितने जरुरी थे, उसका भी अंदाजा लगाया जा सकता है।

साथियों, इन सभी राजनीति के पीछे एक सोची समझी रणनीति है इसे समझिये और अपने हक अधिकार के लिए लड़िये और उनका साथ दीजिये जो वास्तव मे नाटक, भाषणबाजी और रिलबाजी नहीं बल्कि जो इन विपरीत परिस्थिति में लड़ाई लड़ रहे है।

✍️ Manoj Manav की कलम से...

11/07/2026

जिसे तुम घर की दीवारों में बाँधते हो,
वह विचार सदियों से छत बन चुका है।

✍️ Manoj Manav

10/07/2026

हर एक क़त्ल में ख़ंजर दिखाई दे, ज़रूरी है क्या,
हर इक ज़ुर्म का मंज़र दिखाई दे, ज़रूरी है क्या।

ये क़ातिल इज़्ज़तों के लिबास ओढ़े हुए बैठे हैं,
हर इक चेहरे का चेहरा दिखाई दे, ज़रूरी है क्या।

तुम्हारे टूटने-बिखरने से जिन्हें कोई फ़र्क़ पड़ता नहीं,
तुम्हारा दर्द भी उनको दिखाई दे, ज़रूरी है क्या।

जो अपनी बेड़ियों को ही मुक़द्दर मानकर जीते रहें,
उन्हें अपनी ग़ुलामी दिखाई दे, ज़रूरी है क्या।

जो ज़ुल्म सह के भी ज़ालिम की जय-जयकार करें,
उन्हें अपना ही कत्ल दिखाई दे, ज़रूरी है क्या।

✍️ Manoj Manav की कलम से...

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