Mufti Azam Qasmi
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If you're young and your deen is your priority, then you are blessed immensely. Don't ever look at others and feel you're missing out. It's they who are missing out on something far more valuable.
If Allah is giving you an easy life then He doesn't care about your hereafter. For every prophet and great man was tested with difficulty while they remained on the straight path.
“When Allah wants good for a servant, He afflicts him with trials. When He wants evil for him, He lets him live in ease.”
- Ibn al-Qayyim
`राय से तफ़्सीर करने वाले की मजलिस में शामिल होना जायज़ नहीं!`
*जो शख़्स क़ुरआन करीम के दर्स या तफ़्सीर में* *सलफ़-ए-सालिहीन की तफ़्सीर का पाबंद नहीं है, बल्कि उनके ख़िलाफ़ मतलब बयान करता है — उसका तफ़्सीर करना क़ुरआन की रौशनी में नाजायज़ है, और उसमें शामिल होना सवाब के बजाय गुनाह है।*
– मुफ़्ती-ए-आज़म मुफ़्ती मोहम्मद शफ़ी उस्मानी रहमतुल्लाह अलैह
(मआरिफ़ुल कुरआन, जिल्द 2, सफ़ा 584)
*السلام علیکم ورحمۃ اللہ وبرکاتہ*
On this joyous and blessed occasion of *Eid-ul-Fitr* 1446H, I extend my heartfelt greetings and warmest prayers to you, your family, and your loved ones, filled with gratitude and happiness.
*Eid Mubarak!*
May Allah, the Almighty, accept all your Ramadan Ibaadaat and shower upon you His endless mercy, tranquility, and blessings. May your life be filled with prosperity, inner peace, and boundless joy that illuminates every moment.
Once again, *Eid Mubarak!*
Today and always, with all the beauty and grandeur that this occasion deserves!
*With warm regards,*
*M***i Azam Qasmi*
> *"कजा नमाज अदा करने का मौका"*
_*एक झूठे वायरल मैसेज की हक़ीक़त*_
❌ नबी करीम सल्लल्लाहु अलैयही वसल्लम की निस्बत यह बात बयान की गई है कि जिस शख्स की नमाज़ें कज़ा हुईं हों और तादाद मालूम न हों तो वह रमजान के आख़िरी जुमा के दिन 4 रकात नफिल 1 सलाम के साथ इस तरह पढे। हर रकत में सूरह फातिहा के बाद "आयतुल कुर्सी 7 बार सूरह कौसर 15 बार पढ़े। अगर 700 साल की नमाज़ें कज़ा हुईं हों तो इसके कफ्फारे के लिए यह नमाज़ काफी है।❌
* *_यह बात हदीस की किसी किताब में नहीं है। इसका बयान करना और शेयर करना ह़राम है, और अपना ठिकाना जहन्नम में बनाना है।_*
*_रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:_*
- _*मेरी ह़दीस को बयान करने में एह़तियात करो और वही बयान करो जिसका तुम्हें यक़ीनी इ़ल्म हो। जो शख़्स जान बूझकर मेरी तरफ से कोई ग़लत बात बयान करे, वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।*_
> 📚 _सुनन तिर्मिज़ी : 2951_
~*__________________________*~
*توبہ کا خیال "خوش بختی " کی علامت ہے کیونکہ جو اپنے گناہ کو گناہ نہ سمجھے وہ "بد قسمت " ہے*
*" اَسۡتَغۡفِرُاللہَ رَبِّیۡ مِنۡ کُلِّ ذَنۡبٍ وَّ اَتُوۡبُ اِلَیۡہَ "*
*"اللَّهُمَّ اجْعَلْنِي أُحِبُّكَ بِقَلْبِي كُلِّهِ وَأُرْضِيكَ بِجُهْدِي كُلِّهِ"*
*ऐ अल्लाह! 🤲🏻🕋*
*मुझे ऐसा बना दे कि मैं पूरे दिल से तुझसे मुह़ब्बत करूं, और अपनी सारी कोशिशें तुझे राज़ी करने में लगा दूं।*
*आमीन या रब्बल आ़लमीन...!!*
*"Trust Allah's plan! He knows what's best for you, "But perhaps you hate a thing and it is good for you."*
_(Al-Quran 2:216)_
Jazaak comes from the root word jazaa’ (جزاء) which according to the popular Arabic-English dictionary, Al-Mawrid, has two meanings that are completely opposite to eachother!
Thus jazaa’ (جزاء) can either mean reward OR punishment.
So :”JazakAllah” can may either mean “may Allah reward you” or “may Allah punish you”, while
“JazakAllah Khair” means … “may Allah reward you with the Best / Good”,
So the correct way is to say Jazakallah khair & not just JazakAllah. Though someone might say that the intention by saying JazakAllah is the same like JazakAllahu khayran, if it’s so, then why not use the complete wordings as used by Prophet(sallallahu alaihi wa sallam) and the Sahabas (radiAllahu Anhum), which is “JazakAllahu khayran” !
Jazak Allahu Khair depending on situation:
*Masculine*: Jazak Allahu Khair/Khairan
*Feminine*: Jazaki Allahu Khair/Khairan
*Plural*: Jazakum Allahu Khair/Khairan
You may also use “JazakAllahu khairan kaseeran” which means May Allah reward you with good in abundance” as “Kaseeran” means “abundance/abundantly”.
Instead of Jazakallahu khair you may also use:
Feminine: Barakallahu Feeki
Masculine: Barakallahu Feek
Plural: Barakallahu Feekum
Which means “May Allah bless you”, which is an appropriate way of thanking someone and replying to someone who’s said JazakAllahu Khair to you.
It can be used both as a thanking and a reply.
As a reply you may also say:
(Below are the replies to someone who has thanked you with JazakAllahu Khair or Barakallahu Feek)
Feminine- Wa Iyyaki
Masculine- Wa Iayka
Plural- Wa Iaykum
06/12/2024
*बाबरी मस्जिद एक ऐतिहासिक जायज़ा*
#6 दिसंबर काला दिवस
इमाम हज़रात इस जुमे को बाबरी मस्जिद की तारीख़ अवाम को बतलाएं
*इस्लाम में मस्जिदों का वही मक़ाम है जो इंसानी जिस्म में दिल का है* _दिल की हरकत से जिंदगी शुरू होती है , इसी तरह मस्जिद से ईमानी जिंदगी का आगाज़ होता है _ दिल की हरकत के बंद हो जाने के बाद जिंदगी का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता इसी तरह मुश्किल से ही किसी ऐसी मुस्लिम आबादी का तसव्वुर किया जा सकता है जहां मस्जिद ना हो इसी तरह तमाम मस्जिदें चाहे वो बड़ी हों या ज़मीनी लिहाज़ से छोटी सब मोहतरम हैं बा अज़मत हैं
किसी एक को भी मुंहदिम करना गिराना तमाम मस्जिदों को मुंहदिम करने के जैसा है और उसको बचाना तमाम मस्जिदों को बचाने जैसा है
*आह बाबरी मस्जिद*
1. बाबरी मस्जिद की तामीर 1528ई.में मुग़ल बादशाह जहीरूद्दीन बाबर के सिपा सालार मीर बाकी ने इस मस्जिद की तामीर कराई
2. यह मस्जिद मौजूदा भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के अयोध्या में तामीर की गई
3. यह मस्जिद मुगलिया तर्जे तामीर की एक शानदार मिसाल थी, और 3 गुंबदों पर मुश्तमिल थी
4. तक़रीबन 400 साल तक यहां मुसलमान इबादत करते रहे
5. 1850 की दहाई में पहली बार हिंदू फ़िरकों ने मस्जिद के मकाम को राम जन्म भूमी क़रार देते हुए दावा किया कि यह राम की पैदाइश की जगह पे तामीर की गई
6. 1949 में मस्जिद के अंदर आधी रात में चोरी से मूर्ती रख दी गई, जिसके बाद मामला अदालत में पहुंचा अदालत ने मस्जिद में ताला लगवा दिया
7. 1986 में हिन्दुओं को राम की पूजा के लिए जगह खोलने की इजाज़त दे दी गई जबकि मुसलमानों को इबादत के लिए इजाज़त नहीं दी गई
8. 1992 में नफ़रती हिंदू शर पसंदों कट्टरपंथियों (उग्रवादियों)ने हुकूमत की मिली भगत से मस्जिद को शहीद कर दिया जिससे पूरे मुल्क में फ़सादात फूट पड़े लाखों बे कुसूर मुसलमान शहीद कर दिए गए उनकी दुकानें और जायदाद लूट ली गई
9. नवंबर 2019 में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने इंसाफ़ से अलग हटके आस्था को बुनियाद बना कर मस्जिद की ज़मीन हिन्दुओं को दे दी, और मुसलमानों को वहां से काफ़ी दूरी पे एक गांव में मस्जिद बनाने के लिए जगह दे दी गई
10. इस्लामी शरीअत का उसूल और क्लियर स्टेंड यह है कि एक मर्तबा जिस जगह पर मस्जिद की तामीर हो गई अब क़यामत तक वह मस्जिद ही रहेगी , मस्जिद की ज़मीन का तबादला यानी एक जगह से दूसरी जगह पर मुन्तक़िल नहीं कर सकते
11. इस्लाम में मस्जिद के मामले में ख़ुसूसी तैर पे शरीयत का यह आदेश है कि उसकी जमीन जायज़ मिल्कियत वाली हो वर्ना इबादत मकबूल नहीं होगी
12. इसलिए मुसलमानों की दीगर मिलकियतों के मुकाबले में मस्जिद की ज़मीन के बारे में यह बात ज़्यादा एतिमाद के साथ कही जा सकती है कि वह किसी ना जायज़ कब्जे से पाक और साफ (Fair) है
*ऐसी सूरत में यह कैसे मुम्किन है कि मुस्लिम बादशाह मंदिर तोड़ कर उसी जगह मस्जिद बनाते रहे हों???*
और सच भी यही है कि मंदिर तोड़ कर उसी जगह पर मस्जिद बनाना साबित नहीं है और न ही ऐसी किसी मस्जिद को उलमा और मुसलमान तस्लीम कर सकते थे,
लेकिन इन सब हकीकतों के बावजूद अंग्रेज़ों का लगाया हुआ हिंदू मुस्लिम में फूट डालो राज करो वाला दरख़्त फल देने पे आ गया
*मुसलमानों को जंगे आज़ादी में दी गई उनकी बे पनाह कुर्बानियों का सबसे पहला नतीजा एक ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद छिन जाने की शक्ल में मिला*😭
तूने बख़्शे हैं जो आजार कहां रखूंगा
यह गिरे गुंबद व मीनार कहां रखूंगा
अपने बच्चों से हर एक राज छुपा लूंगा मगर
6 दिसंबर तेरे अख़बार कहां रखूंगा
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तुझको कितनों का लहू चाहिए ए अर्जे वतन
जो तेरे आरिज़ बे रंग को गुलनार करें
कितनी आहों से कलेजा तेरा ठंडा होगा
कितने आंसू तेरे सहराओं को गुलज़ार करें
इस वक़्त मस्जिदों से अपने रिश्ते को मज़बूत बनाने की जरूरत है
अल्लाह रब्बुल इज्ज़त से दुआ है कि इस मुश्किल वक़्त में अहले ईमान की मदद फरमाए , मसाजिद, मदारिस, मराकिज और दीनी मिल्ली तंजीमों की शर पसंदों से हिफाज़त फरमाए
मुल्क में अमन और शांति का माहौल क़ायम फरमाए।
M***iazamqasmi
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