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09/07/2026
क्या आप जानते हैं कि एक ऐसी जंग भी हुई, जिसमें मुसलमानों की तादाद बहुत कम थी, लेकिन हज़रत ख़ालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु की बेहतरीन हिकमत-ए-अमली ने पूरी जंग का रुख़ बदल दिया?
यह वाक़िया जंग-ए-मुता (8 हिजरी / 629 ईस्वी) का है। इस जंग में मुसलमानों की तादाद लगभग 3,000 थी, जबकि सामने रोमी (बाइज़न्टाइन) और उनके सहयोगी क़बीलों की फ़ौज मुसलमानों से कई गुना ज़्यादा बताई जाती है। सही संख्या के बारे में इतिहासकारों की अलग-अलग राय है।
इस जंग में पहले हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु, फिर हज़रत जाफ़र बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु और उसके बाद हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा रज़ियल्लाहु अन्हु शहीद हो गए।
तीनों सरदारों की शहादत के बाद मुसलमानों ने मशविरे से हज़रत ख़ालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु को कमान सौंपी।
हज़रत ख़ालिद रज़ियल्लाहु अन्हु ने रात के समय फ़ौज की पोज़िशन बदल दी। आगे वाले दस्तों को पीछे और पीछे वालों को आगे कर दिया, ताकि दुश्मन को लगे कि मुसलमानों के पास नई फ़ौज पहुँच गई है।
सुबह जब दुश्मन ने बदली हुई सफ़ें देखीं, तो वह उलझन में पड़ गया। इस रणनीति का फ़ायदा उठाकर हज़रत ख़ालिद रज़ियल्लाहु अन्हु ने मुसलमानों को बड़े नुक़सान से बचाया और फ़ौज को सुरक्षित वापस ले आए।
जब यह ख़बर हुज़ूर ﷺ तक पहुँची, तो आपने हज़रत ख़ालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु को "सैफ़ुल्लाह" (अल्लाह की तलवार) का लक़ब अता फ़रमाया।
यह वाक़िया हमें सिखाता है कि बहादुरी सिर्फ़ तलवार चलाने का नाम नहीं, बल्कि सही वक़्त पर सही फ़ैसला लेने का नाम भी है। ईमान, सब्र और हिकमत से बड़ी से बड़ी मुश्किल का सामना किया जा सकता है।
🤲 अल्लाह तआला हमें हज़रत ख़ालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु जैसी दीन की मोहब्बत, हिम्मत और हिकमत अता फ़रमाए। आमीन।
📚 हवाला:
• सहीह बुख़ारी – हदीस 4261 (जंग-ए-मुता और "सैफ़ुल्लाह" का ज़िक्र)
• अल-बिदाया वन्निहाया – अल-बिदाया वन्निहाया
• तारीख़ अल-तबरी – तारीख़ अल-तबरी
• अर-रहीक़ अल-मख़तूम
09/07/2026
🕋 क्या काबा शरीफ़ पर हमेशा से काला ग़िलाफ़ ही चढ़ाया जाता था? या इसका रंग और तरीका समय के साथ बदलता रहा? आइए, इस्लामी तारीख़ की एक दिलचस्प हक़ीक़त जानते हैं।
ग़िलाफ़-ए-काबा (किस्वा) वह ख़ास कपड़ा है जिससे काबा शरीफ़ को ढका जाता है। यह मुसलमानों के लिए बेहद सम्मान और मोहब्बत की निशानी है।
तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, इस्लाम से पहले भी अरब के कुछ लोग काबा पर कपड़ा चढ़ाते थे। इस्लाम आने के बाद हुज़ूर ﷺ ने भी इस अमल को जारी रखा। बाद में खुलफ़ा-ए-राशिदीन, उमय्यद, अब्बासी, ममलूक और उस्मानी दौर में भी हर साल नया ग़िलाफ़ तैयार कराया जाता रहा।
बहुत से लोगों को यह मालूम नहीं कि ग़िलाफ़ का रंग हमेशा काला नहीं था। अलग-अलग दौर में सफ़ेद, हरा, लाल और पीले रंग के ग़िलाफ़ भी इस्तेमाल किए गए। बाद में अब्बासी दौर से काला रंग ज़्यादा मशहूर हुआ और फिर यही परंपरा जारी रही।
आज काबा शरीफ़ का ग़िलाफ़ शुद्ध काले रेशम से तैयार किया जाता है। उस पर सोने और चाँदी के धागों से क़ुरआन की आयतें कढ़ाई की जाती हैं। हर साल 1 मुहर्रम को नया ग़िलाफ़ चढ़ाया जाता है। (पहले कई वर्षों तक इसे 9 ज़िलहिज्जा को बदला जाता था, लेकिन अब यह व्यवस्था बदल चुकी है।)
ग़िलाफ़-ए-काबा की तैयारी मक्का मुकर्रमा के किंग अब्दुल अज़ीज़ किस्वा कॉम्प्लेक्स में विशेष कारीगरों द्वारा की जाती है। इसे बनाने में महीनों की मेहनत लगती है।
ग़िलाफ़-ए-काबा हमें यह याद दिलाता है कि काबा शरीफ़ पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा की एकता, तौहीद और अल्लाह की इबादत का मरकज़ है।
🤲 अल्लाह तआला हमें काबा शरीफ़ की अदब के साथ ज़ियारत नसीब फ़रमाए, हज और उमरा की सआदत अता फ़रमाए और अपने घर की मोहब्बत हमारे दिलों में हमेशा क़ायम रखे। आमीन।
📚 हवाला:
• क़ुरआन – सूरह आल-इमरान (3:96–97)
• अख़बार मक्का
• शिफ़ाउल ग़राम
• वफ़ाउल वफ़ा
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