Vishaaanu
सूक्ष्मयॊनीनि भूतानि तर्क गम्यानि का
जीवन में किस बात का मलाल करता है ,
तू क्यों जीवन से इतने सवाल करता है ,
जो नहीं मिला ,वो भी ख्वाहिश थी ,जो मिल गया,वो कभी ख्वाहिश हुआ करती थी ,
तमन्नाओं की गोद बहुत गहरी है ,सपनों की उड़ान बहुत लंबी है ,
थोड़ा ठहर ,थोड़ा तो सबर कर ले ,
दर्द है तो क्या ,कुछ नहीं मिला तो क्या कुछ खो दिया तो क्या ,
अब भी मैँ बाकी हूँ तुझमें ,मौके मिलेंगे तुझे अनेक ,
लेकिन अगर मुझसे मुँह मोड़ेगा ,
तो फिर ना तेरी सुबह होगी,ना शाम होगी ,
ना कोई रात होगी और ना ही कोई बात होगी,
तू अकेला होगा , ना कोई तेरे संग होगा।
आत्महत्या की इस खाई में गिर कर पूछते हो , मेरा वजूद क्या था ,
प्रियजन तू छोड़ गया ,रोने के लिए ,
आत्महत्या तूने किया , लोगो ने मुझपे सवाल उठा दिए कि
क्यों मैंने तुम्हें आकर्षित नहीं किया ,जीने के लिए ,
मैँ क्या कहुँ ,तू डर गया या महान था या नादान था या कोई सैतान था ,
पर जो भी था, तू किसी का संतान था,
दर्द और सवाल उनको दे कर ,तू चला गया।
मौत!!! ,तूने इसके मन में ,मेरी अच्छी तस्वीर उतारी ,
ले गया इसको अपने आगोश में , केह कर की ,'जीवन है एक मिथ्या ',
और इस नादान ने ,दूर करने मन की उलझन ,खोजा एक उत्तर , "बस ! आत्महत्या" ।
30/04/2020
पहचान
“कौन हो तुम?”
“तुम कौन हो”
“हरहर महादेव......हरहर महादेव”
“हरहर महादेव”
“सुबूत क्या है?”
“सुबूत......मेरा नाम धर्मचंद है”
“ये कोई सुबूत नही, कोई ठोस सबूत दो"
“ तो फिर चार वेदों से कोई भी बात मुझ से पूछ लो।”
“ सले हम वेदों को नहीं जानते......कोई जिस्मानी सुबूत दो, जनेयू दिखाओ, तिलक भी तो नहीं लगाया है।"
“क्या? तिलक माथे के पसीने से धूल गया, मजदूर आदमी हूं भाई।"
“ठीक है फिर पाएजामा ढीला करो”
पाएजामा ढीला हुआ तो एक शोर मच गया।
मार डालो......मार डालो”
“ठहरो ठहरो...... मैं तुम्हारा भाई हूँ......
भगवान की क़सम तुम्हारा भाई हूँ।” “तो ये क्या सिलसिला है?”
“जिस इलाक़े से आ रहा हूँ वो हमारे दुश्मनों का था
इस लिए मजबूरन मुझे ऐसा करना पड़ा......
सिर्फ़ अपनी जान बचाने के लिए......
एक यही चीज़ ग़लत होगई है।
बाक़ी बिल्कुल ठीक हूँ।”
“उड़ा दो ग़लती को”
ग़लती उड़ा दी गई.....
धर्मचंद भी साथ ही उड़ गया।
उसकी पहचान भी उसके साथ उड़ गई।
16/04/2020
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