Radhey Radhey

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Srimati Radharani is the mother of the universe, the spiritual mother of all souls. This potency is a person. Her name is Srimati Radharani.

22/04/2025

मनोकामना पूर्ति के लिए भक्त कितने जतन करते हैं. कुछ अपने आराध्य का दिन रात जाप करते हैं. कुछ भक्त उपवास (Fast) रखते हैं और भगवान की पूजा अर्चना में लीन रहते हैं. कुछ भक्त कोई संकल्प लेते हैं और मनोकामना पूर्ती के बाद उसे पूरी सच्चाई के साथ निभाते हैं. ऐसे भक्त जो सारे जतन कर चुके हैं लेकिन उनकी मनोकामना (Wishes) पूर्ण नहीं हो रही है. उन्हें राधा रानी (Radha Rani) के चमत्कारी नामों का जाप करना चाहिए. राधा रानी के 28 चमत्कारी नाम जिनका जाप करने से हर मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता है. इन 28 नामों के जाप से इंसान के सारे कष्ट कट जाते हैं और दुख दर्द भी दूर होते हैं.

"राधा रानी" के 28 चमत्कारी नाम...

1. राधा

2. रासेश्वरी

3. रम्या

4. कृष्ण मत्राधिदेवता

5. सर्वाद्या

6. सर्ववन्द्या

7. वृन्दावन विहारिणी

8. वृन्दा राधा

9. रमा

10. अशेष गोपी मण्डल पूजिता

11. सत्या

12. सत्यपरा

13. सत्यभामा

14. श्री कृष्ण वल्लभा

15 वृष भानु सुता

16. गोपी

17. मूल प्रकृति

18. ईश्वरी

19. गान्धर्वा

20. राधिका

21. रम्या

22. रुक्मिणी

23. परमेश्वरी

24. परात्परतरा

25. पूर्णा

26. पूर्णचन्द्रविमानना

27. भुक्ति- मुक्तिप्रदा

28. भवव्याधि-विनाशिनी

राधे राधे 🙏

24/12/2023

राधा-कृष्ण प्रेम श्लोक (संस्कृत)
एक बार उपवन मे बैठे,कान्हा कूक लगाई जैसे
कहत राधिका गोरी कैसे,चमक रही चिंता चित मन मे
राधा सनन चुप मुख मंदिर से
राधा सनन चुप मुख मंदिर से
का कारण है ऐसो तोरो,मोसे न सुन जाई जो
काहे तर्क (बात) छिपावत मोसे,मन-मंदिर मे आई जो

सोच कन्हैया कुछ क्षण बोले

काहे प्रीत लगाई मोसे,काहे बात चलाई मोसे
ग्वाला तोहे कई मिलेंगे,काहे रास रचाई मोसे
जानत ऐसो प्रीत न करतो,ऐसी बात छिपाई मोसे
मन की बाते मैं बतलाऊ,तोसे अपनो प्रेम जताऊ

राधा जी:-
भय है तोरो छोड़ ना जावे,कीसे कीसे प्रेम जतावे
मन मे प्रेम हदय है,चंचल
प्रेम करू पर समझ ना आबे

श्री कृष्ण
प्रेम करू मैं नित्य करू मैं,कभी न करियो ऐसी बात
भभक उठो तो हृदय जो मोरो,तोसे हो गई ऐसी बात

प्रीत-रीत गुमनाम समुंदर तुमको मैं समझाऊगा।
प्रीत करुगा प्रियतम ऐसी करके मैं बतलाऊंगा।।

*************राधा कृष्ण प्रेम संवाद भावार्थ*************

एक बार श्री कृष्ण( कान्हा) वन में बैठे हुए थे तो उन्होंने राधा जी को बुलाया और राधा जी से बोले की हे राधे! तुम्हारे मुख मंदिर में ये चिंता के भाव कैसे?

उस क्षण राधा जी प्रभु श्री कृष्ण की बात सुनकर बिल्कुल चुप रही

राधा जी को चुप और शांत देखकर श्री कृष्ण बोले की ऐसी कौन सी बात है? जो हमसे ना सुनी जाएगी।

श्री कृष्ण राधा जी से कहते हैं कि तुम तो मुझसे प्रेम करती हो तो ऐसी कौन सी बात है जो तुम मुझसे छिपा रही हो अर्थात बता नहीं रही हो।

जब इतनी देर प्रयत्न करने के पश्चात राधिका जी कुछ ना बोली तब श्री कृष्ण कुछ क्षणों के लिए सोच में पड़ गए

और बोले..

कि जब तुम्हे मुझसे बात ही छिपानी थी तो मुझसे प्रेम ही क्यों किया? क्योंकि प्रेम में बातें गुप्त नहीं रखी जाती और श्री कृष्ण बोले कि क्यों फिर प्रेम की बातें करके मेरे मन-मंदिर में प्रेम की बात चलाई।

श्री कृष्ण वो बात सुनने के लिए इतने आतुर हो गए थे कि उन्होंने राधिका जी से बोल दिया कि इस संसार में कई ग्वाले मिल जाते तुझे,फिर क्यों प्रेम रूपी रास या कह सकते हैं प्रेम का बंधन मुझसे ही क्यों जोड़ा?

और कहने लगे की मुझे ऐसा पता होता की तुम्हें मुझसे बात छुपानी है तो मैं प्रेम ही ना करता क्योंकि मैं अपना प्रेम व्यक्त भी करता हूं और अपने मन की बात भी बताता हूं।

तब राधिका जी चिंतित हो गई और कान्हा की गंभीर बात सुनकर बोली:-

कि मुझे भय है कि तुम कहीं मुझे छोड़कर चले ना जाओ क्योंकि तुम अपने प्रेम को सभी में वितरित करते हो और इसी बात का भय हर क्षण सताता है। मैं यह जानती हूं कि तुम मुझसे अनंत प्रेम करते हो पर मेरा ह्रदय और मन इस तरह से चंचल है की उसे इस बात का यकीन नहीं होता।

मैं तुझसे इतना प्रेम करती हूं कान्हा कि मुझे उसके अंत का भी आभास नहीं है।

तब श्री कृष्ण बहुत ही उदार भाव से कहते हैं कि मैं तुझसे ही प्रेम करता हूं और हर वक्त तुम्ही से करता हूं पर पता नहीं तुम्हें मेरे प्रेम पर संदेह क्यों हैं? अगर तुम भी मुझसे प्रेम करती हो तो हे राधे! ऐसी बात पुनः दोबारा न करना क्योंकि जब भी तुम ऐसी बात करती हो तब मेरा हृदय इस संसार रूपी मायाजाल में भी,इस मधुबन की शीतल हवा में आग की लपेटो को महसूस करता है।

पर हे राधे! तुम भी इस संसार के मायाजाल में फसकर मुझ पर संदेह कर रही हो तो सुनो इस संसार में हमारा प्रेम अमर होगा यह वचन मैं आज तुम्हें देता हूं।

🙏राधे राधे 🙏

29/06/2019

... कहते हैं कि एक बार श्रीराधा गोलोकविहारी से रूठ गईं। इसी समय गोप सुदामा प्रकट हुए। राधा का मान उनके लिए असह्य हो हो गया। उन्होंने श्रीराधा की भर्त्सना की, इससे कुपित होकर राधा ने कहा- सुदामा! तुम मेरे हृदय को सन्तप्त करते हुए असुर की भांति कार्य कर रहे हो, अतः तुम असुरयोनि को प्राप्त हो। सुदामा कांप उठे, बोले-गोलोकेश्वरी ! तुमने मुझे अपने शाप से नीचे गिरा दिया। मुझे असुरयोनि प्राप्ति का दुःख नहीं है, पर मैं कृष्ण वियोग से तप्त हो रहा हूं। इस वियोग का तुम्हें अनुभव नहीं है अतः एक बार तुम भी इस दुःख का अनुभव करो। सुदूर द्वापर में श्रीकृष्ण के अवतरण के समय तुम भी अपनी सखियों के साथ गोप कन्या के रूप में जन्म लोगी और श्रीकृष्ण से विलग रहोगी। सुदामा को जाते देखकर श्रीराधा को अपनी त्रृटि का आभास हुआ और वे भय से कातर हो उठी। तब लीलाधारी कृष्ण ने उन्हें सांत्वना दी कि हे देवी ! यह शाप नहीं, अपितु वरदान है। इसी निमित्त से जगत में तुम्हारी मधुर लीला रस की सनातन धारा प्रवाहित होगी, जिसमे नहाकर जीव अनन्तकाल तक कृत्य-कृत्य होंगे। इस प्रकार पृथ्वी पर श्री राधा का अवतरण द्वापर में हुआ।

"राधे राधे"

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