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27/12/2024
हर किसी का बचपन बड़ा निराला होता है । मेरा भी कुछ ऐसा ही था । पिताजी और अपनी नौकरी पर चले जाते थे । बस समय निकाल कर मटरगश्ती करने निकाल पड़ता था । जैसे मैं निकलता वैसे ही मेरे कुछ और मित्र भी आ मिलते थे । उन दिनों कुछ दस ग्यारह वर्ष की उम्र रही होगी । जहाँ बैठते एक नई कहानी शुरू हो जाती। मैं उसमें श्रोता बनकर ही रह जाता क्योंकि अधिकांश कहानियाँ केवल कोरी गप्पें होती थीं। और गप्पें मारना अबतक मैं सीख नहीं पाया था । हर कहानी की शुरुआत के लिए कोई न कोई मसला चाहिए था । मसला कुछ विशेष नहीं था ।
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तांक-झांक | बिनय कुमार शुक्ल | shabd.in Read तांक-झांक By बिनय कुमार शुक्ल exclusively on shabd.in - रोज के भाग दौड़ भरी जिंदगी से कुछ समय बचाकर हास्य, विनोद और सेवाकार्य में लग.....
27/12/2024
शेष विश्व से अलग एक द्वीप जैसे गाँव में मेरा जन्म हुआ था जहाँ से शहर आना जाना अत्यंत ही कठिन था। वर्षा ऋतु में तो यह असंभव ही हो जाता था। लोगों के कन्धों पर डोली पर बैठ ही संभव हो पाता था। घोड़ा, बैलगाड़ी अथवा पैदल ही चार कोस अर्थात लगभग तेरह किलोमीटर जंगलों और खेतों के मध्य से होते हुए फैजाबाद से आमघाट मार्ग तक पहुँचना होता था। यह आमघाट गोमती नदी के इस किनारे पर था और नदी पर पुल न होने के कारण जो एक्का दुक्का बसें चलती...
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विस्मृत यादें | सोमेश कुमार | shabd.in Read विस्मृत यादें By सोमेश कुमार exclusively on shabd.in - शेष विश्व से अलग एक द्वीप जैसे गाँव में मेरा जन्म हुआ था जहाँ से शहर आना जान.....
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