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22/05/2026
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जाति जनगणना २०२७ और 'जातिविहीन' समाज का विरोधाभास! 📊⚖️
दोस्तों, आगामी 'जनगणना २०२७' में होने वाली देशव्यापी जातिगत जनगणना को लेकर इस समय पूरे देश में एक बहुत ही गंभीर बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर रोक लगाने वाली याचिका को खारिज करते हुए साफ कह दिया कि—"किसी भी मौजूदा सरकार के लिए यह जानना ज़रूरी है कि समाज में कितने लोग पिछड़े हैं, ताकि जनकल्याणकारी नीतियां सही तरीके से बनाई जा सकें।"
लेकिन इस पूरे मुद्दे का एक दूसरा पहलू भी है जो हमें सोचने पर मजबूर करता है। 🔍
१. हमारी आज़ादी का बुनियादी सिद्धांत: स्वतंत्रता के बाद शुरुआती सरकारों ने जाति की गिनती न करने का फैसला इसलिए किया था ताकि समाज से जातिवाद को खत्म किया जा सके।
२. आज का ऐतिहासिक विरोधाभास: एक तरफ हमारी नीतियां एक 'जातिविहीन' (Casteless) समाज बनाना चाहती हैं, लेकिन दूसरी तरफ आरक्षण और हिस्सेदारी तय करने के लिए हमें जातियों को गिनना भी पड़ रहा है।
३. २०११ का सबक: जब २०११ में ऐसा प्रयास हुआ था, तो खुली छूट के कारण ४६ लाख से ज़्यादा जातियों के नाम सामने आ गए और ८ करोड़ से ज़्यादा डेटा त्रुटियाँ (Errors) हुईं, जिससे वह पूरा डेटा बेकार हो गया।
가 सबसे बड़ा और क्रांतिकारी सवाल:
लेखक ने आज के 'द हिंदू' (The Hindu) संपादकीय में एक बेहद जरूरी मांग उठाई है—क्या इस जनगणना में देश के नागरिकों को खुद को 'जातिहीन' (Casteless) घोषित करने का कानूनी विकल्प नहीं मिलना चाहिए? जो लोग जाति व्यवस्था को नहीं मानते, उन्हें ज़बरदस्ती किसी जाति में क्यों बांधा जाए?
🤔 आप क्या सोचते हैं?
क्या २०२७ में जाति गिनने से समाज में दूरियां और बढ़ेंगी या पिछड़ों को उनका हक मिलेगा? और क्या फॉर्म में 'जातिहीन' का कॉलम होना चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें! 👇
📺 इस पूरे एडिटोरियल का वर्ड-बाय-वर्ड हिंदी अनुवाद, इंग्लिश एक्सप्लेनेशन और हर सेंटेंस की बारीक ग्रामर (UPSC/Aspirants के लिए विशेष) को समझने के लिए हमारा आज का वीडियो देखना न भूलें। ⬇️
https://youtu.be/Xhqk3WmaCSE?si=DTRvtui8BMGKTGoK
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