Devbhoomi uttarakhand

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10/06/2026

यमुनोत्री धाम मंदिर
जनपद उत्तरकाशी
देवभूमि उत्तराखंड
यमुनोत्री धाम मंदिर उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गढ़वाल हिमालय के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित एक पवित्र हिंदू तीर्थस्थल है। यह भारत की प्रसिद्ध चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव माना जाता है, जो देवी यमुना को समर्पित है। मंदिर में माँ यमुना की काले संगमरमर की अत्यंत सुंदर मूर्ति स्थापित है।

हिंदू पुराणों के अनुसार, यमुना सूर्य देव की पुत्री और यमराज (मृत्यु के देवता) की बहन हैं। मान्यता है कि यमुनोत्री में पवित्र स्नान और दर्शन करने से असमय मृत्यु का भय दूर होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

मंदिर के प्रवेश द्वार के पास स्थित एक पवित्र चट्टान है, जिसकी पूजा मुख्य मंदिर में प्रवेश करने से पहले अनिवार्य रूप से की जाती है।

यह मंदिर के पास स्थित एक प्राकृतिक गर्म पानी का झरना है। इसका तापमान इतना अधिक होता है कि श्रद्धालु इसमें कपड़े में बांधकर चावल और आलू उबालते हैं, जिसे माता के प्रसाद के रूप में घर ले जाया जाता है।

यमुनोत्री मंदिर के कपाट हर साल अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर (अप्रैल/मई में) खुलते हैं और भाई दूज (अक्टूबर/नवंबर) के दिन सर्दियों के लिए बंद कर दिए जाते हैं।
सर्दियों में जब भारी बर्फबारी के कारण मंदिर बंद रहता है, तब माँ यमुना की उत्सव मूर्ति को नीचे स्थित खरसाली (खुशीमठ) गांव में लाया जाता है, जहाँ छह महीने तक उनकी शीतकालीन पूजा होती है।

09/06/2026

हर की पौड़ी
जनपद हरिद्वार
देवभूमि उत्तराखंड
हर की पौड़ी, उत्तराखंड के पवित्र शहर हरिद्वार में स्थित हिंदू धर्म का एक अत्यंत पावन और अलौकिक आध्यात्मिक केंद्र है。 इसका शाब्दिक अर्थ "भगवान हरि (विष्णु) के चरण" होता है। यह केवल एक नदी का घाट नहीं है, बल्कि करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था, मुक्ति और दिव्य चेतना का जीवंत प्रतीक है।

हर की पौड़ी के सबसे पवित्र हिस्से को ब्रह्मकुंड कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब देव-दानवों के बीच अमृत कलश के लिए छीना-झपटी हो रही थी, तब आकाश मार्ग से अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिरी थीं, जिनमें से एक स्थान यह ब्रह्मकुंड था। इसी दिव्य घटना के कारण यहाँ हर 12 वर्ष में विश्व प्रसिद्ध कुंभ मेले का आयोजन होता है, जहाँ स्नान करने से अमरत्व और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

धार्मिक मान्यता है कि वैदिक काल में स्वयं भगवान विष्णु यहाँ प्रकट हुए थे और घाट के एक पत्थर पर उनके दिव्य पदचिह्न (चरण चिह्न) आज भी अंकित हैं। यह स्थल 'हरि' (विष्णु) और 'हर' (शिवा) के एकाकार होने का स्थान है, क्योंकि इसे मोक्ष के द्वार 'हरिद्वार' और भगवान शिव के धाम 'बद्रीनाथ-केदारनाथ' का मुख्य प्रवेश मार्ग माना जाता है।

भूगोलीय और आध्यात्मिक दृष्टि से, यही वह स्थान है जहाँ पतितपावनी माँ गंगा पर्वतों की शृंखलाओं को छोड़कर पहली बार मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती हैं। मान्यता है कि यहाँ के गंगा जल में अलौकिक औषधीय और आध्यात्मिक शक्तियाँ समाहित हैं। इसमें श्रद्धापूर्वक एक डुबकी लगाने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और आत्मा को मोक्ष (जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति) प्राप्त होती है।

इस भूमि का ऐतिहासिक महत्व राजा विक्रमादित्य के भाई भर्तृहरि से भी जुड़ा है, जिन्होंने राजपाठ त्यागकर यहाँ वर्षों तक गहन ध्यान और वैराग्य की साधना की थी। आज भी यहाँ संतों, योगियों और साधकों की उपस्थिति से एक ऐसी निरंतर आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है, जो हर अशांत मन को स्थिरता और ईश्वर से जुड़ाव का अनुभव कराती है।

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