Mata vaisno devi
15/04/2026
ज्वाला देवी मंदिर बिना घी तेल के यह ज्योत जलती है।
51 शक्ति पीठ में से एक मां ज्वाली देवी से जुड़ा रहस्य आज तक कोई सुलझा नहीं पाया। मान्यता है कि यहां लगातार मां ज्वाली की ज्योत जलती रहती है। इनका रहस्य जानने के लिए पिछले कई साल से भू-वैज्ञानिक जुटे हुए हैं,लेकिन 9 किमी खुदाई करने के बाद भी उन्हें आज तक वह जगह ही नहीं मिली जहां से प्राकृतिक गैस निकलती हो।
इस मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि इसमे किसी मूर्ति की नहीं बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही 9 ज्वालाओं की पूजा होती है।
आइए जानते हैं ज्वाली देवी मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा और मान्यताएं क्या कहती हैं।
यह मंदिर भी शिव और शक्ति से जुड़ा है। जब भगवान विष्णु ने अपनी चक्र से देवी सती के शरीर को 51 भागों में बांट दिया। जो अंग जहां पर गिरा वहीं पर शक्तिपीठ बन गया। मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान पर माता सती की जीभ गिरी थी। इसलिए इसे ज्वाला जी के नाम से जाना जाता है। इसे जोता वाली और नगरकोट के नाम से भी जाना जाता है।
ज्वाला देवी मंदिर की धार्मिक मान्यता
ज्वालादेवी मंदिर से संबंधित एक धार्मिक कथा के अनुसार, भक्त गोरखनाथ यहां माता की आराधना किया करते थे। वह माता के परम भक्त थे और पूरी सच्ची श्रद्धा के साथ उनकी उपासना करते थे। एक बार गोरखनाथ को भूख लगी और उसने माता से कहा कि आप आग जलाकर पानी गर्म करें, मैं भिक्षा मांगकर लाता हूं। माता ने आग जला ली। बहुत समय बीत गया लेकिन, गोरखनाथ भिक्षा लेने नहीं पहुंचे। कहा जाता है कि तभी से माता अग्नि जलाकर गोरखनाथ की प्रतीक्षा कर रही हैं। ऐसी मान्यता है कि सतयुग आने पर ही गोरखनाथ लौटकर आएंगे। तब तक यह ज्वाला इसी तरह जलती रहेगी।
अकबर ने भी की थी ज्वाला बुझाने की कोशिश
एक अन्य कथा के अनुसार, मुगल बादशाह अकबर ने ज्वाला देवी की शक्तिपीठ में लगातार जल रही ज्वाला को बुझाने का प्रयास किया था। लेकिन, वह कामयाब नहीं हो सका। उसने अपनी पूरी सेना बुलाकर ज्वाला की आग बुझाने का प्रयास किया लेकिन, कामयाब नहीं हुआ। जब अकबर को ज्वाला देवी की शक्ति का आभास हुआ तो उसने मां ज्वाला से क्षमा मांगते हुए देवी को सोने का क्षत्र चढ़ाया।
ज्वाला देवी मंदिर में सदियों से बिना तेल बाती के प्राकृतिक रूप से नौ ज्वालाएं जल रही हैं। नौ ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला जो चांदी के जाला के बीच में हैं उसे महालाकी कहते हैं। बाकी आठ, अन्नपूर्णा, चण्डी, हिंगलाज, विध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, और अंजी देवी ज्वाला मंदिर में निवास करती हैं।
15/04/2026
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Aap sabhi ka matavaisno pariwaar mein swagat hai Jai Mata Di
12/04/2026
जय माता दी
माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड ने तीन महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। इनमें लौटने वाले श्रद्धालुओं के लिए नया रास्ता, विशेष साधना कक्ष और हेलीकॉप्टर सेवा शामिल है, जिससे इस यात्रा का अनुभव पूरी तरह से बदल जाएगा।
यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं, जिससे आने वाले समय में श्रद्धालुओं को और भी बेहतर अनुभव मिलने वाला है।
बहुत जल्द ही माता वैष्णो देवी भवन परिसर में एक नए रास्ते का निर्माण किया जा रहा है। यह रास्ता खास तौर पर उन श्रद्धालुओं के लिए होगा, जो दर्शन करने के बाद वापस लौटते हैं। इस नए मार्ग के बनने से भीड़ को नियंत्रित करने में काफी मदद मिलेगी और श्रद्धालुओं की आवाजाही पहले से ज्यादा सुगम और सुरक्षित हो जाएगी।
भवन परिसर में श्रद्धालुओं की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक विशेष साधना कक्ष का निर्माण भी किया गया है। ऐसे श्रद्धालु जो दर्शन के बाद कुछ समय शांत वातावरण में बैठकर साधना या ध्यान करना चाहते हैं, उनके लिए यह सुविधा बेहद लाभकारी साबित होगी।
बहुत जल्द शिवखोरी और कटरा के बीच हेलीकॉप्टर सेवा शुरू की जाएगी। इस सेवा के शुरू होने से श्रद्धालुओं को यात्रा के लिए एक नया और तेज विकल्प मिलेगा, खासकर बुजुर्गों और उन लोगों के लिए जो लंबी पैदल यात्रा करने में असमर्थ होते हैं। हेलीकॉप्टर सेवा के शुरू होने से क्षेत्र में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
श्रद्धालुओं को न केवल बेहतर सुविधाएं मिलेंगी बल्कि उनका आध्यात्मिक अनुभव भी और गहरा होगा।
🌹जय माता दी 🙏🌹
माँ वैष्णो देवी की कहानी
बहुत समय पहले, कटरा के पास हंसाली गाँव में एक गरीब ब्राह्मण पंडित श्रीधर रहते थे। वे माता वैष्णो देवी के सच्चे भक्त थे और पूरी श्रद्धा से उनकी पूजा करते थे।
एक दिन, माता वैष्णो देवी ने एक छोटी बच्ची के रूप में श्रीधर के सपने में आई और उनसे गाँव में एक भंडारे (भोजन प्रसाद) का आयोजन करने के लिए कहा। श्रीधर गरीब थे, लेकिन देवी माँ पर उनकी अटूट आस्था थी, इसलिए उन्होंने निडर होकर यह आयोजन करने का संकल्प लिया।
इस आयोजन में भैरवनाथ भी अपने 360 शिष्यों के साथ आए। उन्होंने पंडित श्रीधर को सभी को भोजन करने के लिए कहा। श्रीधर बहुत चिंतित हुए क्योंकि उनके पास इतने लोगों को खिलाने का कोई साधन नहीं था। भैरवनाथ ने उनकी असहायता पर हँसी उड़ाई और देवी की शक्ति पर संदेह किया। लेकिन श्रीधर को अपनी माँ वैष्णो देवी पर अटूट विश्वास था।
तभी माता वैष्णो देवी एक छोटी कन्या के रूप में प्रकट हुईं और अपनी दैवीय शक्ति से सभी को भोजन कराया।
यह देखकर भैरवनाथ को संदेह हुआ कि यह बालिका साधारण नहीं है। वह माता वैष्णो देवी की असली पहचान जानने के लिए उनका पीछा करने लगा।
माँ वैष्णो देवी त्रिकुटा पहाड़ियों की ओर चल दी और एक गुफा में छिप गईं। जब भैरवनाथ वहाँ पहुँचा, तो देवी ने अपना महाकाली रूप प्रकट किया और उसे दंडित किया। भैरवनाथ ने तब माता की महिमा को समझा और उनसे क्षमा माँगी। माता वैष्णो देवी प्रेम और करुणा की प्रतीक हैं, इसलिए उन्होंने भैरवनाथ को क्षमा कर दिया और इस तीर्थ स्थल में उसे भी स्थान दिया, जिसे भैरव घाटी के नाम से जाना गया।
इधर, पंडित श्रीधर बहुत दुखी थे कि देवी माँ अचानक कहाँ चली गईं। बाद में, माता ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और अपनी पवित्र गुफ़ा का पता बताया, जहाँ वे तीन पिंडियों के रूप में विराजमान थीं— माता काली, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती।
श्रीधर ने जब इन पिंडियों को खोजा, तो वे प्रेम और भक्ति से भर गए और अपना पूरा जीवन माँ वैष्णो देवी की सेवा और पूजा में समर्पित कर दिया। यहीं से इस पवित्र तीर्थयात्रा की शुरुआत हुई।
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