Menka Raman
सदस्य, जिला परिषद,37 लकड़ी नबीगंज सिवान, बिहार(2016-21)
प्रत्याशी,19 महाराजगंज लोकसभा(2019)
06/04/2026
सरकारी कर्मचारी “Servant” नहीं, “लोकसेवक” हैं।
आजकल सोशल मीडिया पर कुछ नेता और तथाकथित जनप्रतिनिधि सरकारी कर्मचारियों एवं अधिकारियों के लिए बार-बार “Servant” शब्द का प्रयोग करते दिख जाते हैं।
यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक मानसिकता को दर्शाता है — ऐसी मानसिकता, जो प्रशासनिक व्यवस्था को सम्मान नहीं, बल्कि दबाव और अपमान की दृष्टि से देखती है।
मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहती हूँ कि
सरकारी कर्मचारी और अधिकारी किसी व्यक्ति विशेष के servant नहीं होते, वे संविधान, कानून और जनता के प्रति उत्तरदायी “लोकसेवक” होते हैं।
जो लोग दिन-रात
कानून-व्यवस्था संभालते हैं,
डाक, शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व, पंचायत, विकास, प्रशासन और जनसेवा का भार उठाते हैं,
चुनाव से लेकर आपदा तक हर मोर्चे पर खड़े रहते हैं,
उन्हें अपमानित करना केवल कर्मचारियों का नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक गरिमा का अपमान है।
लोकतंत्र में चुने हुए प्रतिनिधियों का सम्मान अपनी जगह है,
लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों की गरिमा भी उतनी ही आवश्यक है।
अगर हर मंच पर उन्हें “servant” कहकर नीचा दिखाने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, तो इसका सीधा असर व्यवस्था, मनोबल और जनसेवा पर पड़ेगा।
मैं यह मानती हूँ कि
सरकारी कर्मचारी “हुक्म बजाने वाले servant” नहीं, बल्कि “व्यवस्था चलाने वाले लोकसेवक” हैं।
वे किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि राज्य और राष्ट्र की संस्थागत शक्ति हैं।
आज समय आ गया है कि हम शब्दों की मर्यादा तय करें।
सम्मानजनक शब्द अपनाइए — “लोकसेवक” कहिए, “राज्यकर्मी” कहिए, “जनसेवा अधिकारी” कहिए — लेकिन अपमानजनक मानसिकता छोड़िए।
जो व्यवस्था चलाते हैं, उनका सम्मान होना चाहिए, अपमान नहीं।
मैं सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के सम्मान, सुरक्षा और गरिमा के पक्ष में अपनी मजबूत आवाज़ दर्ज करती हूँ।
उनकी निष्ठा, मेहनत और सेवा को सलाम।
— मेनका रमण
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