Dr Rajeshwar Uniyal

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Photos from Dr Rajeshwar Uniyal's post 23/10/2025

साहित्य और साहित्यकार का सम्मान करना महाराष्ट्र से सीखें ...
बंधुओ, हालांकि भारत के पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु व महाराष्ट्र आदि ऐसे राज्य हैं, जहां साहित्य और साहित्यकारों का बहुत अधिक सम्मान होता है और यह सम्मान दिखावे का नहीं बल्कि यहां की संस्कृति में ही रचा बसा है । मैं कुछ समय पहले जब बारामती गया था, जो कि पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री शरद पवार जी का नगर है! वहां के सड़कों के नाम, चौराहों के नाम और सभागृह व प्रमुख स्थलों के नाम महाराष्ट्र के महान साहित्यकारों की स्मृति में समर्पित किए गए हैं ।
लेकिन अभी जब मैं छत्रपति संभाजी नगर (जो कि स्वतंत्रता से 75 वर्ष तक बाबर के वंशजो के शासनकाल में औरंगाबाद नगर था) गए, तो हम जिस विला में रुके थे, वहां के बैठक का एक कोना पुस्तकों से सजा था और दंग तो मैं तब रह गया, जबकि हम रात को खाना खाने परब्रह्म रेस्टोरेंट गए, तो वहां होटल के एक कोने में एक टोकरी में मराठी की प्रचलित साहित्यिक पुस्तकें सजाकर रखी हुई थी तथा पीछे दीवार में कुसुमाग्रज व बिंदा करंदीकर सहित अन्य विख्यात मराठी साहित्यकारों एवं लता मंगेशकर जैसी महान विभूतियों के चित्र भी लगे थे। मैंने जब होटल के मैनेजर से पूछा कि लोग तो आजकल होटलों में डीजे और गीत संगीत के कार्यक्रम आयोजित करते हैं, तो आपने यह पुस्तक संस्कृति का प्रदर्शन किस उद्देश्य से किया ? तो उन्होंने बताया कि सामान्यतः खाने का ऑर्डर देने के बाद खाना परोसने में 20-30 मिनट का समय लगता है । हम चाहते हैं कि लोग इस दौरान कम से कम इतनी देर तो इन पुस्तकों का अध्ययन करें और पुस्तक पढ़ ना सकें, तो कम से कम इन पुस्तकों को देखकर अपने साहित्य पर गर्व तो कर सकें कि हमारे महाराष्ट्र में इतने बड़े साहित्यकार और साहित्य उपलब्ध है। आज पता चला कि आखिर महाराष्ट्र संतों की भूमि क्यों कहलाई जाती है - डा. राजेश्वर उनियाल, मुंबई

10/10/2025

छुंयाल ...
बंधुओ! आज करवा चौथ का पवित्र दिन है। मैं सोच ही रहा था कि इस पावन अवसर पर आज अपनी कौन सी कविता या प्रसंग को पोस्ट करूं ? कि तभी मुझे समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून के प्रकाशक श्री प्रवीण कुमार भट्ट जी का भेजा हुआ मेरी छुंयाल नामक कहानी संकलन की पुस्तक का प्रकाशन पूर्व मसौदा प्राप्त हुआ। इसे देखते ही मुझे लगा कि आज के इस पावन दिवस पर मातृशक्ति को नमन करने हेतु इससे बढ़िया उपहार भला और क्या हो सकता है ?
“छुँयाल स्त्रीवाचक शब्द ही नहीं है, बल्कि यह शब्द बना ही स्त्रियों के लिए है । इसमें स्त्रियों का एकाधिकार है । छुँयाल स्त्री ही हो सकती है, पुरूष नहीं । पुरूष को आप ज्यादा से ज्यादा बातूनी, गप्पी या गपोड़ कह सकते हैं, पर छुँयाल नहीं । छुँयाल स्त्री का गहना है, जो स्त्रियों के कंठ पर ही सुहाता है ...
मुझे पूरा विश्वास है कि 32 विविध कहानियों के संकलन की यह छुयाल नामक पुस्तक शीघ्र ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होगी 🙏 - डा. राजेश्वर उनियाल

06/10/2025

बंधुओ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की साधना के बाद संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार जी को समर्पित मेरी कविता 🙏 🙏

जाग रहा है अब सोया हिन्दू
- डा. राजेश्वर उनियाल

जाग रहा है अब सोया हिंदू, लगा मचलने सागर सिंधु,
दोहराने फिर गौरव गाथा, भरने लगा हुंकार है हिंदू ।

सदियों से सुसुप्त-सा सो रहा, सहिष्णुता का पाठ पढ़ रहा,
धर्म से विमुख हो वो अपने,आततायियों को था झेल रहा।
नई चेतना है पाई उसने, धर्म ध्वजा लहराई उसने,
तोड़ता हुआ अंगड़ाईयों को, जाग रहा है अब सोया हिंदू ।

समरभूमि को देख रहा है, खड्ग अपने वो ढूंढ रहा है,
ले सीख इतिहास से अपने, नादानियों को वो भूल रहा है।
गांडीव को उठाकर हाथ में, विजयी शंख को लिए साथ में,
तंद्राओं को तोड़ता हुआ हिंदू, जाग रहा है अब सोया हिंदू।

वेद ऋृचाओं का है वह ज्ञाता, धरा अंबर से उसका नाता,
अश्वमेध वह करने वाला, दसों दिशाओं का है रखवाला।
नवराष्ट्र का निर्माण करने, मां भारती का मंदिर सजाने,
हिंदुत्व को झकझोरता हिंदू, जाग रहा है अब सोया हिंदू ।
- डॉ. राजेश्वर उनियाल

13/09/2025

श्रीनगर, कश्मीर के दरगाह के बोर्ड से हमारे राष्ट्रीय प्रतीक अशोक चिन्ह को तोड़ दिया गया। सिवाय राष्ट्रवादी भाजपा के बाकी सेकुलर दलों की प्रतिक्रिया -
अखिलेश यादव - ऐं ऐं ऐं
तेजस्वी यादव - मैं मैं मैं
रावण - हैं हैं हैं
स्टालिन - खैं खैं खैं
केजरीवाल - खों खों खों
राहुल गांधी - आप भाजपा के हो क्या ?
देशद्रोही वामपंथी - इसमें आर एस एस का हाथ है।
ममता दीदी - अब्बा डब्बा झब्बा

09/09/2025

हिमालय दिवस की शुभकामनाओं सहित,
बंधुओ, आज के दिन 9 सितंबर को प्रतिवर्ष हिमालय दिवस मनाया जाता है । देवाधिदेव नागाधिराज हिमालय की स्तुति वंदना करते हुए मेरी काव्य पुस्तक का शीर्षक ही “मैं हिमालय हूं” है । उसी पुस्तक की यह कविता आज आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ -
मैं हिमालय हूं
- डॉ. राजेश्वर उनियाल
9869116784/8369463319
मैं हिमालय हूं हिमालय, ही रहूंगा मैं सदा,
मैं खड़ा यूं ही रहूंगा, हिमशिलाओं से लदा ।
हिल नहीं सकता कभी भी, यह मुझे आता नहीं,
झुक नहीं सकता कभी भी, वह मुझे भाता नहीं ।

मैं निशब्द सा मौन पर, भावनाओं से भरा,
छू रहा हूँ व्‍योम को पर, अस्तित्‍व मेरा धरा ।
मैं अडिग अविचल हिमालय, भाव से गंभीर हूं,
पर हृदय से मैं बहाता, अपने सदा नीर हूं ।

सूर्य की रश्मियां मेरा, करती नित श्रृँगार है,
इंद्रधनुष की घटाएं, चमचमाती हार है ।
दिव्य हूं मैं भव्य हूं मैं, रत्‍नों का भंडार हूं,
जनक हूं गौरी का और स्वर्ग रोहिणी द्वार हूं ।

मैं चौखंबा मैं नंदा, शिखरों का शूल हूं,
मैं ही नर मैं नारायण, शिवजी का त्रिशूल हूं ।
शीश हूं मैं ताज हूं मैं, भारती का भाल हूं,
संतरी हूं प्रहरी मैं, सरहदों का ढाल हूं ।
मैं हिमालय हूं हिमालय....
(यह पुस्तक बिक्री हेतु आन लाइन पर उपलब्ध है)

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