Vishal Singh
Jay Shree Ram
|| रामदास जी महाराज सत्संग ||
थू हांसों परस्यो दिजे मारी || "Bharat" old music episode 4 || गायक डालू बा ||
जय श्री राम, जय माता दी आप सभी को मेरा प्रणाम और स्वागत हैं आप सभी का मेरे इस video में,
हालाँकि काफी सारे मेरे viewer's को इस video में जो गीत गाया गया हैं वो समझ मे नहीं आयेगा क्यूँ की ये एक स्थानीय भाषा गाया गया हैं , इसलिए मैं आपको थोड़ा describe कर देता हूँ कि ये क्या होता हैं और क्यूँ और किस लिए गाया जाता हैं | ताकि आपको थोड़ी आसानी हो जायेगी |
भील समाज में 'माताजी की लावणी' केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक शक्ति अनुष्ठान और पूर्वजों से मिली एक पवित्र धरोहर है।
भील समाज आदिकाल से ही प्रकृति और शक्ति का उपासक रहा है। लावणी के माध्यम से आद्यशक्ति (अम्बे माता, काली माता या स्थानीय देवियाँ) का आह्वान किया जाता है।
यह माना जाता है कि जब श्रद्धा के साथ लावणी गाई जाती है, तो माताजी स्वयं वहां उपस्थित होती हैं।
लावणी के सुरों से वातावरण में एक सकारात्मक ऊर्जा पैदा की जाती है ताकि समाज पर आने वाली अदृश्य बाधाएं और बुरी शक्तियां दूर रहें।
राजस्थान के भील समाज में 'गवरी' (राई) उत्सव के दौरान लावणी का विशेष महत्व है।
गवरी सवा महीने तक चलने वाली तपस्या है। इस दौरान माताजी की लावणी गाकर उनकी वीरता और उनके द्वारा किए गए असुरों के संहार का वर्णन किया जाता है।
इन लावणियों में अक्सर सृष्टि की रचना और देवी-देवताओं के पृथ्वी पर आगमन की कहानियाँ लोक-भाषा में पिरोई होती हैं
यह गायन साधारण नहीं होता। इसमें मांदल और थाली का प्रयोग मुख्य रूप से किया जाता है।
इनकी थाप पर जब लावणी गाई जाती है, तो गायक 'भगत' या 'भोपा' भाव-विभोर होकर माताजी की गाथा सुनाते हैं।
इसमें माताजी के श्रृंगार से लेकर उनके युद्ध कौशल तक का बारीकी से वर्णन होता है।
सीताराम
अगर आपको ये वीडियो अच्छा लगा हो और नहीं भी लगा हो फिर भी please like, comment, subscribe and do share this video.
thanks you so much ♥️
Instagram:- Vishal0584
|| होई हरिकी बेना माता जी लावणी || "BHARAT" old music episode 2 || गायक डालूँ बा ||
जय श्री राम, जय माता दी आप सभी को मेरा प्रणाम और स्वागत हैं आप सभी का मेरे इस video में,
हालाँकि काफी सारे मेरे viewer's को इस video में जो गीत गाया गया हैं वो समझ मे नहीं आयेगा क्यूँ की ये एक स्थानीय भाषा गाया गया हैं , इसलिए मैं आपको थोड़ा describe कर देता हूँ कि ये क्या होता हैं और क्यूँ और किस लिए गाया जाता हैं | ताकि आपको थोड़ी आसानी हो जायेगी |
भील समाज में 'माताजी की लावणी' केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक शक्ति अनुष्ठान और पूर्वजों से मिली एक पवित्र धरोहर है।
भील समाज आदिकाल से ही प्रकृति और शक्ति का उपासक रहा है। लावणी के माध्यम से आद्यशक्ति (अम्बे माता, काली माता या स्थानीय देवियाँ) का आह्वान किया जाता है।
यह माना जाता है कि जब श्रद्धा के साथ लावणी गाई जाती है, तो माताजी स्वयं वहां उपस्थित होती हैं।
लावणी के सुरों से वातावरण में एक सकारात्मक ऊर्जा पैदा की जाती है ताकि समाज पर आने वाली अदृश्य बाधाएं और बुरी शक्तियां दूर रहें।
राजस्थान के भील समाज में 'गवरी' (राई) उत्सव के दौरान लावणी का विशेष महत्व है।
गवरी सवा महीने तक चलने वाली तपस्या है। इस दौरान माताजी की लावणी गाकर उनकी वीरता और उनके द्वारा किए गए असुरों के संहार का वर्णन किया जाता है।
इन लावणियों में अक्सर सृष्टि की रचना और देवी-देवताओं के पृथ्वी पर आगमन की कहानियाँ लोक-भाषा में पिरोई होती हैं
यह गायन साधारण नहीं होता। इसमें मांदल और थाली का प्रयोग मुख्य रूप से किया जाता है।
इनकी थाप पर जब लावणी गाई जाती है, तो गायक 'भगत' या 'भोपा' भाव-विभोर होकर माताजी की गाथा सुनाते हैं।
इसमें माताजी के श्रृंगार से लेकर उनके युद्ध कौशल तक का बारीकी से वर्णन होता है।
सीताराम
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