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story writing
उसके मैसेज अब “Seen” पर रुकने लगे थे,
और मेरे जवाब “Typing…” पर।
रातें पहले हमारी होती थीं,
अब बस मेरी रह गई थीं।
एक दिन मैंने हिम्मत करके फिर पूछा-
मैं:
“तुम पहले जैसी क्यों नहीं रहीं?”
वो (थोड़ा झुंझलाकर):
“तुम हर बात सोच क्यों लेते हो?
सब ठीक है, बस overthink मत करो।”
उसके लिए वो एक साधारण-सी लाइन थी,
पर मेरे लिए वो एक बंद दरवाज़ा।
उसके बाद मैं चुप रहने लगा,
सोचा - शायद चुप्पी से चीज़ें ठीक हो जाएँगी।
पर चुप्पी ने ठीक नहीं किया,
उसने दूरी पक्की कर दी।
दिन में मैं हँसता,
दोस्तों में मज़ाक करता,
स्टेटस भी डालता…
पर सच यह था:
रात होते ही मैं वही बन जाता
जो मैं उससे छुपाता था — टूटा हुआ।
कॉल लॉग में उसका नाम देखकर
उँगली ठहर जाती थी,
पर दिमाग कहता -
“जिसे परवाह होती है,
वो समय पर बात करता है…
बहाने नहीं।”
मैं हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूटता गया,
पर हर सुबह खुद को समझाता—
“सब ठीक है।”
“बस फेज़ है।”
“वो लौट आएगी।”
जबकि दिल जानता था -
वो जा चुकी है, बस बोली नहीं है।