Bhakti Ras
18/12/2021
दत्त आत्रेय सिर्फ वहीं अवतरित होते है जहां अत्रि जैसी प्रचंड वेद निष्ठा हो। और अनसूया जैसा सतीत्व।
लेकिन ऐसा सतीत्व भी तभी निर्माण हो सकता है जब पति भी अत्रि जैसा हो। दोनो ही एक दूसरे के पूरक है।
जो किसी एक का हो सकता है वह सबका नहीं हो सकता। सब के लिए नहीं हो सकता। और यह मनोभाव है। यह सतीत्व है। और यह सतीत्व का दायित्व है कि निर्वस्त्र तो ईश्वर के सामने भी नहीं। यदि ईश्वर को भी उन्हे निर्वस्त्र देखना है तो शिशु रूप में आना होगा जहां कामनाएं न हो मन में। और ऐसी पतिव्रता पत्नी, और ऐसे पति अत्रि के घर आता है दत्त, अवधूत दत्त।
गुजराती मे कहा भी जाता है,
અત્રિ અનસૂયા કરી નિમિત્ત,
પ્રગટ્યો જગ કારણ નિશ્ચિત.
अत्रि और अनसूया को ही निमित्त बना कर जग कारण से, जगत का उद्धार करने केलिए उस दत्त ने अवतरण किया।
और वह दत्त भी कैसा अवधूत, वेश्या तक उसके गुरु। २४ गुरु बना कर जगत को बोध दिया। यदि शिष्यत्व निर्माण हुआ है भीतर तो गुरुत्व तो प्रकृति के कण कण में है।
चन्द्र और दुर्वासा उनके भाई थे। ब्रह्म की सृजन शक्ति, विष्णु का पालन भाव और शिव का परम ज्ञान एवम् मृतुन्जय यह तीनों का प्रतीक है दत्त आत्रेय।
तत्कालीन समाज में उपनिषद् का निवृत्ति वाद एवम् ज्ञान मार्ग अवधूत ने प्रस्थापित किया। यह बिलकुल ऐसे है कि परम कर्म मार्गी अत्रि और उसके पुत्र परम निवृत्ति वादी। कर्म का अंत जैसे ज्ञान। अत्रि का अंत जैसे दत्त।
सप्तर्षि मे से एक अत्रि के पुत्र दत्त स्वयं ईश्वर है। अवतार हैं। आज उनका अवतरण दिन है। जिसे भारत में दत्तात्रेय जयंती के रूप में मनाया जाता है। 😊🙏
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त। 💐
(Repost)
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