Yogesh Krishna

Yogesh Krishna

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JAI KRISHNA

13/06/2025

"भगवान को कभी दोष नहीं देना चाहिए"

अहमदाबाद के एक व्यापारी को एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यवसायिक सौदे के लिए लंदन जाना था। उसने समय पर टैक्सी बुक की, लेकिन काफी इंतजार के बाद भी टैक्सी नहीं आई। वह झुंझला गया और दूसरी टैक्सी बुक की, जो देर से ही सही, लेकिन आई।

रास्ते भर वह भगवान को कोसता रहा — “क्या किस्मत है मेरी! क्या भगवान मेरे साथ ही अन्याय करते हैं?” वह मन ही मन गुस्से में भरा हुआ एयरपोर्ट पहुंचा।

जैसे ही उसने बोर्डिंग के लिए बैग खोला, देखा कि वह अपना पासपोर्ट घर ही भूल आया है। अब उसकी उड़ान छूटना तय था। वह निराश, हताश और क्रोधित होकर वापस घर लौट आया।

घर पहुंचकर वह फिर भगवान को कोसने लगा — "कितनी अहम मीटिंग थी, करोड़ों का टेंडर हाथ से निकल गया! भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?"

उसी मनोदशा में उसने टीवी ऑन किया। सामने जो खबर चल रही थी, वह देखकर वह पत्थर सा रह गया। वही लंदन जाने वाली फ्लाइट, जिसमें उसे सवार होना था, क्रैश हो गई थी। कोई नहीं बचा।

उसे समझ में आ गया कि भगवान ने उसके साथ अन्याय नहीं किया, बल्कि उसे बचाया है। आंखों से आंसू बहने लगे। उसने हाथ जोड़कर भगवान से क्षमा मांगी और उन्हें हृदय से धन्यवाद दिया।

कहानी की सीख:
हमें कभी भी भगवान या अपनी किस्मत को दोष नहीं देना चाहिए। हम जो भी भोगते हैं, वह हमारे ही कर्मों का फल होता है। ईश्वर हमें वो नहीं देते जो हम चाहते हैं, बल्कि वो जो हमारे लिए सही होता है। हमें बस उन पर भरोसा रखना चाहिए और हर परिस्थिति में उनका धन्यवाद करना चाहिए।

24/04/2025

My boyhood days by "Rabindranath Tagore"

There was no gas then in the city, and no electric
light. When the kerosene lamp was introduced, its
brilliance amazed us. In the evening the house-
servant lit castor-oil lamps in every room. The one
in our study-room had two wicks in a glass bowl.

By this dim light my master taught me from
Peary Sarkar’s First Book. First I would begin to yawn,
and then, growing more and more sleepy, rub my
heavy eyes. At such times I heard over and over again
of the virtues of my master’s other pupil Satin, a
paragon of a boy with a wonderful head for study, who
would rub s***f in his eyes to keep himself awake, so
earnest was he. But as for me — the less said about
that the better! Even the awful thought that I should
probably remain the only dunce in the family could
not keep me awake. when nine o'clock struck I was
released, my eyes dazed and my mind drugged with
sleep

शाम के समय, रवीन्द्रनाथ टैगोर के घर का अध्ययन वातावरण मंद रोशनी वाला होता था, जहाँ हर कमरे में कैस्टर ऑयल (अरण्डी के तेल) के दीपक जलाए जाते थे। अध्ययन कक्ष में एक काँच के कटोरे में दो बातियों वाला दीपक जलता था। उस समय गैस या बिजली नहीं थी, इसलिए केरोसीन लैंप की चमक भी चौंका देने वाली लगती थी।

इस हल्की रोशनी में उनके गुरु उन्हें पियारी सरकार की फर्स्ट बुक से पढ़ाते थे। टैगोर को नींद आने लगती, वह जम्हाई लेते और आँखें मसलते रहते। उनके गुरु अक्सर अपने दूसरे शिष्य "सतीन" की मिसाल देते, जो इतना मेहनती था कि जागे रहने के लिए आँखों में सुंघनी (स्नफ़) रगड़ लेता था। लेकिन टैगोर खुद को उतना लगनशील नहीं मानते थे और मजाक में कहते हैं कि वह शायद परिवार का इकलौता मंदबुद्धि ही रह जाएंगे। जैसे ही नौ बजे की घड़ी बजती, वह राहत की साँस लेते, क्योंकि नींद से बोझिल मन और आँखों से पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता था।

04/01/2025

. पश्चाताप

31 दिसंबर की रात मोहन अपनी पत्नी अपर्णा के संग एक दोस्त के यहां हुई नये साल की पार्टी से लौट रहा था- बाहर बड़ी ठंड थी।

दोनों पति पत्नी कार से वापस घर की और जा रहे थे- तभी सड़क किनारे पेड़ के नीचे पतली पुरानी फटी चिथड़ी चादर में लिपटे एक बूढ़े भिखारी को देख मोहन का दिल द्रवित हो गया.....

उसने गाडी़ रोकी ।

पत्नी अपर्णा ने मोहन को हैरानी से देखते हुए कहा... क्या हुआ !

गाडी़ क्यों रोकी आपने ।
वह बूढ़ा ठंड से कांप रहा है। अपर्णा इसलिए गाडी़ रोकी

तो......?

मोहन बोला अरे यार ..
गाडी़ में जो कंबल पड़ा है ना! उसे दे देते हैं..

क्या !- वो कंबल..? -
मोहन जी इतना मंहगा कंबल- आप इसको देंगे....?
अरे वह उसे ओढ़ेगा नहीं- बल्की उसे बेच देगा- ये ऐसे ही होते है.

मोहन मुस्कुरा कर गाड़ी से उतरा और कंबल डिग्गी से निकालकर उस बुजुर्ग को दे दिया।

अपर्णा ने गुस्से में मुंह बना लिया...

संयोग से अगले दिन यानी 1 जनवरी को मोहन और अपर्णा एक फंग्शन से उसी रास्ते से लौट रहे थे जिस रास्ते पर एक दिन पहले उस बुजुर्ग को कंबल दिया था, और आज तो ठंड और भी ज्यादा थी, तो अपर्णा ने कहा..

चलिए मोहन जी एक-बार देखें. उस रात वाले बूढ़े का क्या हाल है..!
मोहन ने वहीं गाडी़ रोकी,और जब देखा तो बूढ़ा भिखारी वही था- मगर उसके पास वह कंबल नहीं था..

वह अपनी- वही फटी पुरानी चादर ओढ़े लेटा था.!

अपर्णा ने आँखे बड़ी करते हुए कहा देखा..!

मैंने कहा था....! कि वो कंबल उसे मत दो- इसने जरूर बेच दिया होगा।

दोनों कार से उतर कर उस बूढ़े के पास गये.

अपर्णा ने व्यंग्य करते हुए पूछा क्यों बाबा

रात वाला कंबल कहां है ? बेच कर नशे का सामान ले आये क्या...?
बुजुर्ग ने हाथ से इशारा किया- जहां थोड़ी दूरी पर एक औरत लेटी हुई थी।
जिसने वही कंबल ओढ़ा हुआ था...!

बुजुर्ग बोला. बेटा! वह औरत पैरों से विकलांग है- और उसके कपड़े भी कहीं-कहीं से फटे हुए है, लोग भीख देते वक्त भी गंदी नजरों से देखते है- ऊपर से ये ठंड ..!

मेरे पास कम से कम ये पुरानी चादर तो है,उसके पास कुछ नहीं था- तो मैंने कंबल उसे दें दिया..

अपर्णा हतप्रभ सी रह गयी..

अब उसकी आँखो में पश्चाताप के आँसु थे- वो धीरे से आकर मोहन से बोली..

चलिए...घर से एक कंबल और लाकर बाबा जी को दे भी देते हैं..

दोस्तों ... ईश्वर का धन्यवाद कीजिए कि ईश्वर ने आपको देनेवालों की श्रेणी में रखा है- अतः जितना हो सके जरूरतमंदों की मदद करें
और इस समय उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। अतः आप से निवेदन है कि थोड़ा अपने आसपास ध्यान दे लीजिए, कहीं राह- फुटपाथ पर कोई गरीब ठंड से परेशान है तो उसके लिए कंबल इत्यादि की व्यवस्था जरूर कर दिजिए, भगवान ने आप को समर्थ बनाया है।🙏

चिड़ी चोंच भर ले गई...।
नदी न् घटिये नीर...।।
दान दिए धन ना घटे...।
कह गए दास कबीर...।।

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