Azhar Sabri

Azhar Sabri

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Educating minds by profession, but my heart lives between the lines. Proud author of 3 books. Living life one chapter at a time.

19/06/2026

गुज़रे हुए दिनों का न इतना मलाल कर।
आईना सामने है तो ख़ुद से सवाल कर।

काँटों से डर के राह में रुकना नहीं कभी,
गुलशन में अपने ख़्वाबों की फ़सलें बहाल कर।

सच की डगर पे चलना तो मुश्किल है दोस्तों,
हँसते हैं लोग पाँव में छाले उछाल कर।

ख़ामोश रह के सहना भी इक जुर्म है यहाँ,
ज़ालिम के सामने तू ज़रा सा सवाल कर।

सूरज की सम्त देख के चलता नहीं है जो,
बैठा है अपनी राह में ज़ुल्मत को पाल कर।

किरदार में अगर तेरे पाकीज़गी नहीं,
क्या फ़ायदा जो चेहरा तू रखे संभाल कर।

दुनिया के ऐब देखने की तुझको धुन है क्यूँ,
'अज़हर' तू अपने आप से पहले सवाल कर।

~ Azhar Sabri ~

18/06/2026

हम तो यादों को मिटाते हुए मर जाते हैं।
अपने अश्कों को छुपाते हुए मर जाते हैं।

जिनके हिस्से में वफ़ाओं के सिवा कुछ भी न था,
वो ही अश्कों को बहाते हुए मर जाते हैं।

ज़हर मिलता है जिन्हें हमसे अदावत में सदा,
हम उन्हें भी दुआ देते हुए मर जाते हैं।

अपने हिस्से की थकन बाँट के लोगों में सदा,
ख़ुद को तन्हा ही सुलाते हुए मर जाते हैं।

उम्र भर धूप की शिद्दत से लड़ाई करके,
ख़्वाब पलकों पे सजाते हुए मर जाते हैं।

कितने मासूम हैं इस शहर के रहने वाले,
काँच के घर को बचाते हुए मर जाते हैं।

कितने चेहरे यहाँ नफ़रत की धुआँ ओढ़े हैं,
हम मुहब्बत को बचाते हुए मर जाते हैं।

उनको ज़िद है कि वो पत्थर ही रहेंगे ता-उम्र,
हम तो आईना दिखाते हुए मर जाते हैं।

जो अँधेरों में भी उम्मीद का सूरज रख दें,
वो ही दुनिया को जगाते हुए मर जाते हैं।

हमको मालूम है दुनिया है फकत एक सराय,
फिर भी ईंटों को सजाते हुए मर जाते हैं।

उनको अपनों की भी परवाह नहीं है अज़हर,
जो चराग़ों को बुझाते हुए मर जाते है

15/06/2026

हर किसी को मेरी चाहत हो ज़रूरी तो नहीं।
उसकी नीयत में मुहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं।

हम ही बिखरे हैं सदा याद के वीरानों में
उस पे भी ऐसी क़यामत हो ज़रूरी तो नहीं

हम ने सोचा था कि वो भी हमें समझेंगे कभी
उन को मेरी ये ज़रूरत हो ज़रूरी तो नहीं

इक नज़र मुझ पे ठहर जाए तो ये मत समझो
उस के लहजे में भी चाहत हो ज़रूरी तो नहीं

मुस्कुराते हुए जीते हैं कई दर्द के साथ
हर खुशी के लिए राहत हो ज़रूरी तो नहीं

वक़्त की धूल में गुम कितने ही मंज़र होंगे
सब में बाकी वही हसरत हो ज़रूरी तो नहीं

एक ही राह पे चलने से कोई अपना नहीं
हर सफ़र में वही उल्फ़त हो ज़रूरी तो नहीं

ख़्वाब आँखों ने कई देख लिए हैं लेकिन
हर दुआ की वही क़िस्मत हो ज़रूरी तो नहीं

हर त'अल्लुक़ का नतीजा हो मुहब्बत 'अज़हर'
ज़िंदगी की यही फितरत हो ज़रूरी तो नहीं

~ Azhar Sabri ~

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