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बढ़ई की जोरू
किसी नगर में वीरवर नाम का एक बढ़ई रहता था। उसकी घरवाली का नाम कामिनी था। वह बहुत चलता-पुर्जा और बदनाम थी। जब सबकी जबान पर एक ही बात हो तो भला बढ़ई के कान में इसकी भनक क्यों न पड़ती। बढ़ई ने सोचा, मुझे पहले इस बात की जाँच करनी चाहिए। पुरुष होने के नाते बढ़ई यह तो जानता ही था कि स्त्रियाँ स्वभाव से बदचलन होती हैं। जैसे आग का शीतल होना या चन्द्रमा का गर्म होना या दुष्टों का परोपकारी होना असम्भव है उसी तरह स्त्री का सती होना भी असम्भव है। फिर उसकी जोरू को तो सारी दुनिया कुलटा कह रही थी।
ताड़नेवाले तो पत्थर की नजर रखते ही हैं। वे उसे भी जान लेते हैं जो न वेद में लिखी हो न शास्त्र में। कोई लाख परदे में कोई अच्छा-बुरा काम करे, वह लोगों से छिपा नहीं रह पाता है।
ऐसा सोचकर उसने अपनी जोरू से कहा, ‘‘प्यारी, मैं कल सुबह ही किसी दूसरे गाँव जाने वाला हूँ। मुझे वहाँ पूरा दिन लग जाएगा। तुम इसी समय मेरे खाने के लिए कुछ सामान बनाकर रख दो।’’
उसकी जोरू को और क्या चाहिए था! उसकी तो मन की मुराद पूरी हो गयी। सारा काम-धाम छोड़कर पकवान बनाने में जुट गयी।
दूसरे दिन सोकर उठते ही बढ़ई घर से बाहर निकला। अब पति का डर तो था नहीं। उसकी जोरू सारे दिन सजती-सँवरती रही। किसी तरह शाम हुई। अब वह पहुँची अपने यार के घर और बोली, ‘‘मेरा मुँहजला खसम आज किसी दूसरे गाँव को गया हुआ है। लोगों की आँख लगते ही चुपचाप मेरे यहाँ आ जाना।’’
उधर बढ़ई ने जैसे-तैसे दिन काटा और शाम का झुटपुटा होते ही चुपचाप पीछे की खिड़की से घर में घुसा और चारपाई के नीचे छिप गया। उसकी जोरू का यार देवदत्त आकर उस चारपाई पर बैठ गया। बढ़ई को अपना गुस्सा रोकते न बनता था। उसके मन में आता वह अभी चारपाई के नीचे से निकले और उसकी जान ले ले। पर उसने अक्ल से काम लिया। सोचा, जब ये दोनों सो जाएँगे उसी समय इनका गला दबा दूँगा। पहले यह तो देख लूँ कि यह इसके साथ करती क्या है। दोनों की बातें भी तो सुनूँ। क्या करना है, क्या नहीं, इसका फैसला बाद में करूँगा।
अभी बढ़ई इस उधेड़बुन में पड़ा हुआ था कि इसी समय उसकी जोरू भी आकर अपने यार के पास बैठ गयी। चारपाई पर बैठते समय उसका पैर बढ़ई के शरीर को छू गया। उसे ताड़ते देर न लगी कि चारपाई के नीचे कोई दुबका हुआ है। अब यह बात तो उसकी समझ में आ ही गयी कि हो न हो यह उसका पति ही है, जो उसको परखने की कोशिश कर रहा है। उसने सोचा, अब मैं भी इसे दिखा ही दूँ कि मैंने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं।
अभी वह कोई जुगत सोच ही रही थी कि उसके यार ने उसे अपनी बाँहों में भरने के लिए अपने हाथ बढ़ाये। उसे अपनी ओर हाथ बढ़ाते देखकर बढ़ई की जोरू बोली, ‘‘देखो, मुझे हाथ लगाया तो तुम्हारी खैर नहीं है। तुम नहीं जानते मैं कितनी सती-साध्वी स्त्री हूँ। यदि तुमने कुछ भी ऐसा-वैसा किया तो मैं तुम्हें शाप देकर भस्म कर दूँगी।’’
देवदत्त को तो कुछ मालूम नहीं था। उसने कहा, ‘‘ऐसा था तो तूने मुझे बुलाया क्यों?’’
बढ़ई की जोरू ने कहा, ‘‘कारण जानना ही चाहते हो तो सुनो। आज सुबह मैं चण्डी देवी के दर्शन करने गयी थी। मेरे वहाँ पहुँचते ही एकाएक आकाशवाणी हुई, ‘बेटी, तू मेरी सच्ची भक्त है इसलिए कहते हुए दुख तो होता है पर इस बात को छिपा जाना और भी दुखद है। जी कड़ा करके सुन। दुर्भाग्य से आज से छह महीने के भीतर तू विधवा हो जाएगी।’
आकाशवाणी सुनकर मैंने पूछा, ‘माँ भगवती, आप यदि यह जानती हैं कि मेरे ऊपर कौन-सी विपदा आनेवाली है तो यह भी जानती ही होंगी कि इससे बचने का उपाय क्या है। क्या ऐसा कोई उपाय नहीं जिससे मेरे पति सौ वर्ष तक जीवित रहें।’
देवी माँ ने कहा, ‘उपाय तो तेरे वश का है, पर क्या तू उसे कर भी पाएगी?’
मैंने कहा, ‘माँ आप बताएँ तो सही। अपने पति के लिए तो मैं अपने प्राण भी दे सकती हूँ। आप बिना किसी आशंका के मुझे वह उपाय बता भर दें।’
मेरी प्रार्थना सुनकर देवी ने कहा, ‘यदि तू किसी पर-पुरुष के साथ शयन करके उसका आलिंगन करे तो तेरे पति की अकाल मृत्यु का प्रवेश उस पुरुष में हो जाएगा। इससे तुम्हारा पति तो सौ साल तक जीवित रहेगा, पर उसकी आयु घट जाएगी। मैंने आपको इसीलिए बुलाया है। आप मेरे साथ जो चाहे सो करें, पर एक बात जान लें कि देवी के मुँह से निकली बात अकारथ नहीं जाएगी।’
बढ़ई की बहू की बात सुनकर उसका यार मन ही मन उसकी चतुराई पर मुस्कराने लगा और जिस काम के लिए आया था उस काम पर जुट गया।
वह मूर्ख बढ़ई तो अपनी जोरू की बातें सुनकर पुलकित हो गया। उसके आनन्द का कोई ठिकाना न था। वह चारपाई के नीचे से निकलकर बाहर आ गया और बोला, ‘‘धन्य है! मेरी पतिव्रता पत्नी, तू धन्य है। मैंने नाहक चुगलखोरों के कहने में आकर तेरे ऊपर सन्देह किया। मैं तो तुम्हें परखने के लिए ही दूसरे गाँव जाने का बहाना बनाकर निकला था। अब मेरा मन साफ हो गया। आओ, मेरे हृदय से लग जाओ। तुम पतिव्रता नारियों की सिरमौर हो। पर-पुरुष के साथ रहकर भी तुमने इतने संयम से काम लिया। तुमने मेरी अकाल मृत्यु को दूर करने और मुझे दीर्घायु बनाने के लिए जो कुछ किया उसे मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ।’’ यह कहकर उसने अपनी पत्नी को बाँहों में भर लिया।
उसने अपनी जोरू को अपने कन्धे पर चढ़ा लिया और देवदत्त से बोला, ‘‘महानुभाव, यह मेरे पिछले जन्म का पुण्य है जो आप ने यहाँ आने का कष्ट किया। आपकी कृपा से ही मुझे सौ वर्ष की आयु मिली है इसलिए आप भी मेरे गले लग जाएँ और कन्धे पर चढ़ जाएँ।’’
देवदत्त आना-कानी करता रहा पर उसने उसकी एक न सुनी। हारकर उसे भी उसके कन्धे पर सवार होना ही पड़ा। अब वह खुशी से नाचते हुए कहने लगा, ‘‘आप लोगों ने मेरा इतना बड़ा उपकार किया है, आप दोनों धन्य हैं।’’
वह उन दोनों को लेकर अपने सगे-सम्बन्धियों के यहाँ जाता और सभी को यह कहानी सुनाता और उन दोनों की तारीफ के पुल बाँधने लगता।
कहानी पूरी करके रक्ताक्ष बोला, ‘‘मैं इसीलिए कह रहा था कि अपनी आँखों से किसी को पाप करते देखकर भी मूर्ख आदमी झूठे बहानों से ही सन्तुष्ट हो जाता है।’’
अब वह मन्त्रियों की ओर मुड़ा और बोला, ‘‘आप लोगों ने तो अपनी ही जड़ खोद डाली है। अब हमें तबाह होने से कौन रोक सकता है? सयानों ने कुछ गलत तो कहा नहीं है कि जो मित्र बनकर भी भलाई की जगह बुराई की सलाह देते हैं उन्हें समझदार लोग अपना दुश्मन समझते हैं। कौन नहीं जानता कि जिस मन्त्री को यह मालूम ही नहीं कि किस देश में और किस मौके पर क्या करना चाहिए, उसे मन्त्री बनानेवाला राजा उसी तरह मिट जाता है जैसे सूरज के निकलने पर अँधेरा मिट जाता है।’’
पर वहाँ कौन था जो रक्ताक्ष की बात पर कान देता। अब वे उल्लू स्थिरजीवी को उठाकर अपने दुर्ग में ले जाने लगे। जब वे स्थिरजीवी को इस तरह ले जा रहे थे तो उसने कहा, ‘‘मैं अब किसी काम का तो रहा नहीं। मेरे लिए आप लोग इतना कष्ट क्यों उठा रहे हैं? मुझे तो आप लोग थोड़ी-सी आग दे दें, मैं उसी में जल मरूँ। इसी में मेरा कल्याण है।’’
उसकी बात सुनकर राजनीति कुशल रक्ताक्ष बोला, ‘‘जनाब, आप काफी घुटे हुए हैं और बातें गढ़ने में तो आपका कोई जवाब नहीं। आप अगले जन्म में उल्लू योनि में पैदा हों तो भी आप को कौओं से ही लगाव रहेगा। कहते हैं जाति का मोह आसानी से नहीं छूटता। चुहिया को ब्याहने के लिए सूर्य, मेघ, पवन और पर्वत सभी तैयार थे, फिर भी उसने अपने पति के रूप में यदि चुना तो एक चूहे को चुना।’’
मन्त्रियों में से किसी को इस चुहिया के बारे में कुछ मालूम न था। उनके आग्रह करने पर रक्ताक्ष ने जो कहानी सुनायी वह इस प्रकार थी।
09/04/2013
चलो आज कुछ अचछा सुनाते हैं,
चलो इस मायूसी को दूर भगाते हैं,
बहुत देर हुई नकली मुस्कान ओढ़े,
चलो आज आईने को हँसाते हैं,
शायद कोई दुकान हो तारों-सितारों की,
चलो इन आखों के लिए चमक लातें हैं,
बहुत वक्त से आया नहीं कोई मिलने,
चलो सबको अपनी याद दिलाते हैं,
नफरतें अकेला कर देती हैं सबको,
चलो इस नफरत को अकेला छोड़ जाते हैं,
कड़वी दवाओं की खुराक है हर रोज़,
चलो सबका मुंह मीठा कराते हैं,
क्यों नहीं लिखता खुशी की गज़लें कोई,
चलो खुशी के दो शेर कह आते हैं,
ख्वाहिशों के चलते ज़िंदगी पीछे रह गयी,
इस फासले को चलो धीरे धीरे घटाते हैं,
सोने चांदी का क्या करेगा कोई,
चलो सबकी खुशी की दुआ कर आते हैं,
किताब की सफ़ेद जिल्द चुभती है आखों में,
चलो फूलों से कह के इसमें कुछ रंग भर आते हैं,
बैठ के सोचने से क्या होगा हासिल 'मित्र'
जो सोचा है चलो आज कर के दिखाते हैं...
थी मुस्कुराती ज़िन्दगी मेरी रुला के चल दिए,
फेका मैय्यत पे फूल और मुस्कुरा के चल दिए..
देखा है प्यार हमने बेशुमार उनका,
झुकी नजरों से इकरार उनका,
आज करके इनकार चल दिए..
फेका मैय्यत पे फूल और मुस्कुरा के चल दिए..
मेरी तन्हाइयों को महफ़िल बनाया,
हर मुश्किल में गले लगाया,
करके बेसहारा आज चल चल दिए..
फेका मैय्यत पे फूल और मुस्कुरा के चल दिए..
जब अपनों ने छोड़ा तूने अपनाया,
हर जख्म पर तूने मरहम लगाया,
आज सीने पर खंजर मार के चल दिए..
थी मुस्कुराती ज़िन्दगी मेरी रुला के चल दिए,
फेका मैय्यत पे फूल और मुस्कुरा के चल दिए..
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