Waterman Rajendra Singh
A social activist working for water and river issues in India. He is commonly referred to as "Waterman of India".
06/05/2026
नदियों के संरक्षण एवं पुनर्जनन प्रबंधन हेतु कानून की जरूरत है
प्रकाशनार्थ - जलपुरुष राजेन्द्र सिंह
दिनांक- 6 मई 2026
जब भी जीवन की जटिलताऐं बढ़ती है, तब-तब प्रकृति और मानवता पर संकट आता है। अब मानवीय जीवन जटिलतम्, कृत्रिम बृद्धिमत्ता से बन रहा है। इसीलिए नदी-पहाड़, प्रकृति-धरती से हमारे रिस्ते टूटते जा रहे है, नदियां बीमार हो रही है। ये मानवीय जीवन के साथ-साथ प्रकृति को भी बीमार बना रही है। इनकी चिकित्सा का कोई कानून उपलब्ध नहीं है। इसलिए अब नदियों की चिकित्सा एवं पुनर्जनन हेतु नदी संरक्षण व नदी पुनर्जनन कानून चाहिए।
नदियों का प्रदूषण भ्रष्टाचार के कारण है। केवल यही सत्य नहीं है। हां, भ्रष्टाचार में नदियां नाले बनती है। सदाचार नालों को नदियां बनाता है। यही किसी भी राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य की पहचान कराता है। अभी भारत की नदियां गंदे नाले बन रही है। गंदे नालों को नदियां बनाने वाला कानून चाहिए।
दुनिया की सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ है। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे जीवन, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और प्रकृति के संतुलन की आधारशिला हैं। इसके बावजूद आज की वास्तविकता यह है कि देश की अधिकांश नदियाँ अतिक्रमण, प्रदूषण और अत्यधिक शोषण के कारण अपनी पहचान खोती जा रही हैं। जो नदियाँ कभी जीवनदायिनी थीं, वे आज कहीं सूख रही हैं तो कहीं बाढ़ के रूप में विनाश का कारण बन रही हैं। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि हमारे भविष्य के अस्तित्व से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। नदिया मरती है तो सभ्यता नष्ट हो जाती है।
आज भारत तेजी से जल संकट की स्थिति में है। जल का अभाव और बाढ़-सुखाड़ की ओर बढ़ रहा है। अनियंत्रित शहरीकरण, बढ़ती औद्योगिक गतिविधियाँ, जल स्रोतों पर अतिक्रमण, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का असंतुलन सभी कारण मिलकर जल संकट को और अधिक गहरा कर रहे हैं। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में किए गए हस्तक्षेप ने जल चक्र को बाधित कर दिया है, जिससे बाढ़ और सूखे का चक्र और अधिक तीव्र एवं अनियमित हो गया है।
नदी पुनर्जनन का अर्थ केवल नदियों की सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी पारिस्थितिकी, जैविक और जलवैज्ञानिक अखंडता को पुनः स्थापित करने की एक व्यापक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नदियाँ अपने प्राकृतिक मार्ग में स्वतंत्र रूप से बह सकें, जल निकायों पर किसी प्रकार का अतिक्रमण न हो, जल का उपयोग संतुलित और सतत रूप में हो तथा प्रदूषण पर पूर्ण नियंत्रण रखा जाए। नदी को एक जीवित तंत्र के रूप में समझना और उसी दृष्टि से उसका संरक्षण करना समय की मांग है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को पर्यावरण संरक्षण का दायित्व सौंपता है। यह केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक कर्तव्य भी है कि हम अपने जल स्रोतों की रक्षा करें। इसी प्रकार स्थानीय स्वशासन संस्थाओं, ग्राम पंचायतों और नगर निकायों को भी यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे अपने क्षेत्र के जल स्रोतों का संरक्षण करें और जल सुरक्षा सुनिश्चित करें। जब तक इन संस्थाओं और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी नहीं होगी, तब तक कोई भी नीति या कानून प्रभावी नहीं हो सकता।
स्थानीय स्तर पर “नदी पंचायत” या “क्षेत्र सभा” जैसी व्यवस्थाएँ इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती हैं। इनके माध्यम से स्थानीय लोग न केवल जल उपयोग की निगरानी कर सकते हैं, बल्कि जल निकायों का सामाजिक लेखा-जोखा भी रख सकते हैं। वे अतिक्रमण और प्रदूषण को रोकने में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं और जल संरक्षण को एक जन आंदोलन का रूप दे सकते हैं। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी है।
नदियों और जल निकायों की रक्षा के लिए कठोर नियमों की आवश्यकता है। जल स्रोतों में किसी भी प्रकार का निर्माण, उद्योग, खनन या कचरा डालना पूर्णतः प्रतिबंधित होना चाहिए। प्रदूषण फैलाने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। जल का उपयोग इस प्रकार होना चाहिए कि वह प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से अधिक न हो। इसके साथ ही वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन और वृक्षारोपण जैसे उपायों को बढ़ावा देना आवश्यक है।
जल सुरक्षा का वास्तविक अर्थ यह है कि आज के विकास के कारण आने वाली पीढ़ियों के जल अधिकार प्रभावित न हों। वर्तमान में हम जल स्रोतों का अंधाधुंध उपयोग कर रहे। पेयजल का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है, कृषि और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट आई है। इसलिए जल संरक्षण केवल वर्तमान की आवश्यकता नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नदी पुनर्जनन को केवल एक सरकारी योजना या कानून तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में अपनाया जाए। सरकार नीति और कानून बनाए। स्थानीय संस्थाएँ उसे लागू करें और नागरिक जागरूक होकर उसमें भागीदारी करें, तभी इस संकट का समाधान संभव है। नदियों को बचाना वास्तव में जीवन को बचाना है, और यही हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
नोट- मैप फोटो गूगल द्वारा ली गई है
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