SAQIB ALI

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18/06/2026

40 साल के आसपास की शहरी औरते, अब तो गाँव मे भी पड़ोस में बैठने का रिवाज खत्म हो गया है।
इस उम्र की औरतें बहुत अकेली हो जाती है।

क्योंकि इन औरतों का अपनी सहेलियो/फुफेरी/खलेरी/चचेरी बहनों से मेल-मिलाप उस दौर में खत्म हो जाता हैं जब इनके बच्चा होता है, उसकी परवरिश में एकदम से वक़्त नही मिलता, दुनिया से अनजान होकर औलाद को पालती है, फिर स्कूल भेजने में सुबह जागना, लंच बनाना, बाकि काम करके थककर सो जाना।

फिर औलाद इनकी जवान हो जाती है, जिनकी निर्भरता अब अपनी माँ पर खत्म हो जाती है, वो खुद स्कुल/कॉलेज या घूमने लायक हो जाते हैं। पति नौकरी में बिजी रहता है। शाम को आते हैं, औलाद अपने मोबाइल में बिजी, पति बुढापे और औलाद के फ्यूचर को सिक्यूर करने के तनाव में थककर सो जाता है। औऱ अब कोई बात बची भी नही होती जो दिलचस्पी से करे।
ऐसे अकेलेपन में एक मोबाइल सहारा होता है अपना वक़्त काटने का, कुछ दोस्त बनते है , जिनसे अपने मन की कह लेती हैं, सुन लेती है । लेकिन समाज के डर से इनके अंदर एक डर बना रहता है कि औलाद जवान है और यह मोबाइल में लगी रहती हैं ।इसलिए ऊंच नीच का ख्याल रखती है.. कुछ ऐसे अकेलेपन में भटक भी जाती हैं, सीमाएं लांघ जाती हैं।

इस उम्र में जो औरते मोबाइल नही इस्तेमाल करती उनके बच्चो की शादी तक तो बिल्कुल जीवन नीरसता रहती है। बच्चो की शादी के बाद, लड़के की बीवी से मनमुटाव हुआ तो जिंदगी में कुछ रौनके आ जाती हैं.. इधर उधर ही बुराई करने का कुछ काम मिल जाता है, दिन आसानी से कट जाता है।

17/06/2026

ट्रेन के सफ़र के दौरान बराबर में 8-10 मरदूदों का परिवार भी कहीं जा रहा है. करीब आधा दर्जन बच्चे भी हैं उनके साथ. ऊ-ऊ की आवाज निकालकर चिचिया रहे हैं. आँखों से टसुए भी बह रहे हैं. इस पर परिवार के सब आदमी-औरत ताड़का जैसी हंसी हस रहे हैं. अब इस सब माहौल में सो तो मैं भी नहीं पा रहा, जैसे आदमी पड़ोसी की तरक्की से मन ही मन खुश होता है, वैसे ही मैं भी मन में खुश हो रहा हूं.

खैर, नीचे की बर्थ पर बैठे मर्द से यह दर्द झेला नहीं गया, उठकर दहाड़ पड़ा, समझा रहा है बच्चे कैसे 'हैंडल' किये जाते हैं. कैसे उन्हें चुप कराया जाता है. दूसरी तरफ से परिवार की एक मादा बोली बच्चे हैं तो रोएंगे ही. मर्द ने भी कार्ड खेला, मैं फौजी आदमी हूं, मेरे भी बच्चे हैं, श्रीनगर में देश की रक्षा कर रहा हूं, मेरे बच्चे तो नहीं रोते, और यहां तो बच्चों से ज्यादा आप लोग हल्ला कर रहे हो. दूसरी तरफ वाली मादा ने जवान के कार्ड को अंग विशेष पर रखते हुए जवाब दिया अजी हम तो एंजॉय कर रहे हैं, छुट्टियाँ हैं हमारी, ऐसे ही करेंगे.

इस पर जवान चिंघाड़ उठा मानो किसी चौपाये के लालफल पर पेट्रोल की फुरफुथी लगा दी हो, चिंघाड़ते हुए बोला ये क्या तरीका हुआ बात करने का. अब दूसरी तरफ से मादा को किनारे करते हुए नर आ गया जंग ए मैदान में. और मुंह से जवाबी बाण प्रत्यंचा पर चढ़ा रहा है. अब बच्चे शांत हो चुके हैं. आदमी सियार की तरह से हुयूँ हुयूँ हुयूँ करते हुए चिल्ला रहे हैं.

मैं, मेरा क्या है, बस इंतज़ार में हूँ, मुँह के बाणों से बात कुछ आगे बढ़े, चप्पल जूता गुम्मा चले, थोड़ा गुत्थम गुत्थी हो, तो किसी वकील के घर कुछ आमद बढ़े.
CP

15/06/2026

भारतीय ट्रेन के एक डिब्बे में हर तरह के लोग मिल जाते हैं:

मुफ़्त में ज़िंदगी की नसीहतें देने वाले अंकल

पूरे कोच को खेल का मैदान समझने वाला बच्चा

आपकी बर्थ पर "बस थोड़ी देर के लिए" बैठा मुसाफ़िर

"भैया, फोन चार्ज पर लगा दूँ?" पूछने वाला यात्री

इंजन से भी ज़्यादा आवाज़ में खर्राटे मारने वाला चैम्पियन

रात 10 बजे पूरा खाना खोलकर दावत जमाने वाला ग्रुप

अपने सामान की हिफ़ाज़त ऐसे करने वाला जैसे कोई क़ौमी ख़ज़ाना हो

और वह ख़ामोश इंट्रोवर्ट जो दुआ कर रहा होता है कि कोई उससे बात शुरू न कर दे

एक डिब्बा...पूरा हिंदुस्तान।

Photos from SAQIB ALI's post 15/06/2026

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