Science student janak
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प्रणाम साथियों! आज मैं आपसे एक ऐसी बात साझा करने जा रहा हूँ जिसे शायद समाज 'विवादित' कहे, पर मेरा शोध इसे 'वैज्ञानिक' कहता है।
लोग कहते हैं—स्त्री और पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर चलें। लेकिन मेरा शोध (अपना ज्ञान) कहता है कि प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को 'समान' (Equal) बनाया है, पर 'एक जैसा' (Identical) नहीं। जब हम प्रकृति के बनाए गए इस सूक्ष्म अंतर को मिटाकर उन्हें बिल्कुल एक ही सांचे में ढालने की कोशिश करते हैं, तो समाज और शरीर, दोनों में 'रोग' बढ़ते हैं।
प्रकृति में हर जीव की अपनी एक धुरी होती है। जब हम दिखावे की होड़ में उस धुरी को छोड़ते हैं, तो मानसिक और शारीरिक तनाव पैदा होता है।
पुरुष और स्त्री की ऊर्जा अलग-अलग है। जब इन दोनों ऊर्जाओं को बिना सोचे-समझे एक ही काम और एक ही गति पर लगाया जाता है, तो संतुलन बिगड़ता है और यही बीमारियों की जड़ है।
समानता का अर्थ हक देना है, लेकिन भूमिकाओं को आपस में गड्ड-मड्ड कर देना शरीर की संरचना के खिलाफ है।
मैं किसी को पीछे रखने की बात नहीं कर रहा, मैं 'प्रकृति के साथ चलने' की बात कर रहा हूँ। क्योंकि प्रकृति से छेड़छाड़ ही रोगों को जन्म देती है।"
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