8 PM INDIA
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नज़रिया
ऊर्जा संकट का स्थाई हल हो
अमरीका-इस्राइल का ईरान के साथ युद्ध जितना लंबा खिंच रहा है भारत में रसोई गैस और पेट्रोलियम पदार्थों का संकट बढ़ रहा है। कमर्शियल एलपीजी की कमी के कारण देश भर में एलपीजी सिलेंडर की कालाबाजारी जारी है। गैस एजेंसियों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं। देश में एलपीजी की कमी नहीं होने और गैस आपूर्ति सुधारने के सरकार के तमाम दावों के बावजूद ना लाइनें घटी हैं और ना ही कालाबाजारी थमी है। कमर्शियल एलपीजी की कमी के कारण होटल, रेस्टोरेंट्स और ढाबों से लेकर खाने पीने की छोटी-छोटी दुकानों और हलवाइयों तक का कारोबार ठप हो रहा है। इससे करोड़ों लोगों के रोजगार पर संकट खड़ा हो गया है। सरकार ने एलपीजी की कालाबाजारी रोकने के लिए आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम यानी एस्मा लागू कर रखा है। लेकिन देश भर में लगातार मारे जा रहे छापों से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने बड़े पैमाने पर जमाखोरी और कालाबाजारी हो रही है। सरकार के निर्देश के बाद सभी तेल रिफाइनरी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही हैं। इससे चालीस फीसदी तक उत्पादन बढ़ा है। लेकिन एलपीजी के लिए मारामारी बंद नहीं हुई। एलपीजी संकट को देखते हुए लोगों ने बिजली से चलने वाले इंडक्शन चूल्हे को विकल्प के रूप में चुना तो बाजार में उनका भी अकाल पड़ गया। वहीं बिजली की मांग भी बढ़ गयी।
युद्ध शुरू हुए बामुश्किल बीस-इक्कीस दिन हुए हैं तब ये हालत है और यदि ये यूक्रेन-रूस जंग की तरह लंबा चला, तो इसका भारत की अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। प्रति व्यक्ति तेल खपत के मामले में अमरीका हमसे सोलह गुणा और चीन तीन गुणा ज्यादा है। लेकिन तेल पर हमारी दूसरे देशों पर निर्भरता बहुत ज्यादा है। ये भारत की कमजोरी भी है। इसलिए देश की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब हम ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनें या फिर आयात के कई विकल्प प्रतियोगी दरों पर उपलब्ध हों। वर्तमान संकट हमारे नीति निर्माताओं के लिए दूसरे देशों पर ऊर्जा निर्भरता को कम करने के बारे में विचार करने का उचित अवसर है। भारत सरकार इस समय एलपीजी की बजाय पीएनजी को बढ़ावा दे रही है। अब तक देश के बड़े शहरों में डेढ़ करोड़ घरों में पीएनजी कनैक्शन हैं, जिन्हें पाइप लाइन के जरिए नेचुरल गैस आपूर्ति की जाती है। इसके अलावा 45 हजार से ज्यादा व्यवसायिक प्रतिष्ठान और लगभग 20 हजार औद्योगिक इकाइयाँ भी पीएनजी का उपयोग कर रही हैं। सरकार का साल 2032 तक साढ़े बारह करोड़ घरों में पीएनजी कनैक्शन देने का लक्ष्य है। देश में पीएनजी की कुल जरूरत का करीब पचास फीसदी हिस्सा विभिन्न देशों से आयात किया जाता है। यानी इसके लिए हम किसी एक देश या रास्ते पर निर्भर नहीं हैं। इसके विपरीत देश में करीब 33 करोड़ एलपीजी कनैक्शन हैं। एलपीजी की जरूरत का साठ फीसदी हिस्सा आयात किया जाता है। उसमें से 90 फीसदी एलपीजी होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से आती है। इसलिए रणनीतिक रूप से एलपीजी से पीएनजी पर शिफ्ट करना भविष्य में भी फायदेमंद रहेगा।
चीन समेत ज्यादातर देश पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग बहुतायत में करने लगे हैं। भारत में अभी इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने में लोगों की रुचि कम है। इसका मुख्य कारण है चार्जिंग स्टेशनों की कमी और इलेक्ट्रिक वाहनों में आग लगने की घटनाएं होना। अभी बुधवार की सुबह ही इंदौर में एक इलेक्ट्रिक कार में चार्जिंग के दौरान धमाका होने पर इमारत में आग लगने से आठ लोगों की मौत हो गयी। इस तरह की घटनाओं को देखते हुए ये सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इलेक्ट्रिक वाहन सुरक्षित हैं। सरकार तेल पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा जरूर दे रही है, लेकिन उन्हें सुरक्षित बनाने की दिशा में ऐतिहाति कदम उठाने चाहिए। साथ ही चार्जिंग स्टेशनों की संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए। दूसरी तरफ देश में कोयला आधारित बिजली उत्पादन को हतोसाहित करके ज्यादा पनबिजली परियोजनाएं तथा परमाणु बिजली संयंत्र लगाने की और ध्यान देना चाहिए। बेशक सरकार नवीनीकृत ऊर्जा यानी सौर व पवन ऊर्जा को प्रोत्साहित कर रही है। लेकिन इसे ज्यादा लोकप्रिय बनाने तथा इसमें प्रयुक्त होने वाले यंत्रों की कीमत करने की दिशा में काफी काम करना होगा। साथ ही ऊर्जा के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़े नीतिगत व सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।
नज़रिया
कृषि को लील रहा कर्ज
आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक विगत एक दशक में लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाला क्षेत्र कृषि है। कृषि क्षेत्र की पिछले पांच साल में 4.4 फीसदी और विगत दस साल में 3.9 फीसदी की वृद्धि दर रही है। इतना ही नहीं, देश में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र भी कृषि है। लेकिन विडंबना देखिए कि लगातार बेहतर प्रदर्शन के बावजूद देश का किसान कर्ज में डूबता जा रहा है और खेतीहर मजदूरों की संख्या बढ़ रही है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले दिनों संसद में एक सवाल के जवाब में बताया कि देश के प्रत्येक किसान परिवार पर औसतन 74,121 रुपये का कर्ज है। उन्होंने बताया कि देश में सबसे ज्यादा कर्ज आंध्रप्रदेश के किसानों पर है। वहां प्रति किसान परिवार 2.45 लाख रुपए का कर्ज है, तो दूसरे नंबर पर केरल के हर किसान परिवार पर 2.42 लाख रुपए का कर्ज हैं। वहीं केंद्रीय अन्न भंडार में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले पंजाब और हरियाणा में क्रमशः 2.03 लाख रुपए और 1.83 लाख रुपए प्रत्येक किसान परिवार पर कर्ज का बकाया है।
कृषि मंत्री के मुताबिक देश में सबसे कम कर्ज नागालैंड के किसानों पर है। यहां प्रत्येक किसान परिवार पर केवल 1,750 रुपये और मेघालय में 2,237 तथा अरुणाचल में 3,581 कर्ज है। पहाड़ी राज्यों में सबसे ज्यादा कर्ज हिमाचल के किसानों पर है। हिमाचल में प्रत्येक किसान परिवार पर 85,835 रुपये, उत्तराखंड में 48,338 रुपये और जम्मू-कश्मीर में 30,435 रुपये का कर्ज बाकी है। इसी तरह राजस्थान में 1.13 लाख रुपए प्रति किसान परिवार तो उत्तरप्रदेश में 51,107 रुपये और बिहार में 23,254 प्रत्येक किसान परिवार पर ऋण है। कहने का तात्पर्य ये है कि कर्ज के इस मर्ज से देश के किसी राज्य के किसान मुक्त नहीं हैं। यहां तक कि केंद्र शासित प्रदेशों के किसान परिवारों पर भी औसतन 25,629 रुपये कर्जा है। कर्ज के बढ़ते दबाव में बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री के संसद में दिये गये आंकड़ों से जाहिर है कि देश में किसानों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। किसानों और खेती की बदहाली का सबसे बड़ा कारण किसानों को बाजार में उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलना और कृषि लागत का लगातार बढ़ना है। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन में कमी आना तथा बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार लगातार किसानों की आय दोगुनी करने के दावे करती आ रही है। लेकिन हकीकत ये है कि कृषि उत्पादन में वृद्धि के बावजूद किसानों की आय नहीं बढ़ रही है, जबकि उन पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। केंद्र सरकार ने किसानों की मदद के लिए छह हजार रुपए सालाना किसान निधि देना शुरू किया है। वहीं दूसरी तरफ कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली सब्सिडी में साल दर साल कटौती की जा रही है। खाद, बीज, कीटनाशकों के रेट तथा कृषि मजदूरी लगातार बढ़ रही है।
केंद्र सरकार विभिन्न फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य सी-2+लागत की बजाय ए-2+एफ एल लागत पर तय करती है। इससे किसानों को हर साल करीब 40 हजार करोड़ रुपए का नुक़सान होने का अनुमान है। किसानों की सारी फसल समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदे जाने तथा बिचौलियों के कारण उन्हें अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ती है। ऐसा नहीं है कि सरकार किसानों की दशा सुधारने के लिए प्रयासरत नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें किसान कल्याण और कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की योजनाएं चला रहीं हैं, लेकिन उनका कोई सकारात्मक प्रभाव धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है। इतना ही नहीं अंतराष्ट्रीय मुक्त व्यापार समझौतों के तहत कृषि के विभिन्न सेक्टरों को विदेशी उत्पादों के लिए खोलने से भी किसानों को नुकसान हो रहा है। अभी यूरोप और अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील से भी किसानों में मायूसी है।
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