Arvind Patel

Arvind Patel

Share

नि. राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, समाजवादी छात्र सभा

04/05/2026

30 जनवरी 1948 शाम 5 बजकर 17 मिनट पर दिल्ली के बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा के लिए जा रहे 78 वर्षीय महात्मा गांधी पर 37 वर्षीय नाथूराम गोडसे ने नजदीक से तीन गोलियाँ दाग दीं।

वह आदमी जिसने अंग्रेजी साम्राज्य को बिना सेना, बिना हथियार, बिना खून की नदियाँ बहाए घुटनों पर ला दिया, उसे एक कट्टर सोच से भरे व्यक्ति ने गोली मार दी।

यही कारण है कि गोडसे को कुछ लोग चाहे जितना चमकाने की कोशिश करें, इतिहास में उसकी पहचान एक हत्यारे, उग्रवादी और आतंकवादी मानसिकता वाले व्यक्ति से आगे कभी नहीं गई।

यह हत्या अचानक नहीं हुई थी। 20 जनवरी 1948 को भी गांधी जी की प्रार्थना सभा में बम धमाका किया गया था। मदनलाल पाहवा पकड़ा गया था और उसने साजिश के सूत्र खोले थे। इसके बावजूद सुरक्षा व्यवस्था कठोर नहीं हुई।

गांधी जी स्वयं हथियारबंद सुरक्षा से असहज रहते थे। यही लापरवाही दस दिन बाद भारत के लिए भारी पड़ी।

इस पूरी साजिश में नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे, दिगंबर बड़गे जैसे नाम सामने आए। जांच में विनायक दामोदर सावरकर का नाम भी आया, पर अदालत में पर्याप्त सबूत न होने के कारण उन्हें बरी कर दिया गया।

गोली लगने के बाद गांधी जी गिर पड़े। उनके अंतिम शब्द “हे राम” थे या नहीं, इस पर आज भी मतभेद हैं। मनु गांधी और आभा गांधी ने कहा कि उन्होंने यही कहा, जबकि कुछ चश्मदीदों का दावा था कि वे बोल नहीं पाए।

गोडसे भागा नहीं। उसने आत्मसमर्पण किया। भीड़ ने उसे पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। जिस व्यक्ति ने सोचा था कि वह इतिहास बदल देगा, वह वहीं एक अपराधी की तरह खड़ा था।

सरदार वल्लभभाई पटेल उस दिन गांधी जी से मिलकर अभी निकले ही थे, उन्हें तुरंत वापस बुलाया गया। जवाहरलाल नेहरू को सूचना मिली तो वे व्याकुल अवस्था में बिड़ला हाउस पहुँचे।

उसी रात नेहरू ने रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, “हमारे जीवन से रोशनी चली गई है और चारों ओर अंधेरा छा गया है।” यह केवल एक वाक्य नहीं था, उस समय पूरे देश की हालत थी।

लाल बहादुर शास्त्री स्तब्ध थे। इंदिरा गांधी भी तुरंत वहाँ पहुँचीं। मौलाना आजाद, राजगोपालाचारी, डॉ भीमराव अंबेडकर सहित अनेक नेताओं ने इसे राष्ट्रीय त्रासदी कहा।

दुनिया भर से शोक संदेश आए। अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी को आने वाली पीढ़ियों के लिए आश्चर्य बताया। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने इसे सभ्यता पर धब्बा कहा।

बाद के वर्षों में भी बड़े नेताओं ने गांधी की हत्या को भारत की आत्मा पर हमला माना। अटल बिहारी वाजपेयी ने गांधी को भारतीय चेतना का नैतिक स्तंभ कहा और स्पष्ट कहा कि हिंसा किसी विचारधारा का समाधान नहीं हो सकती।

इंदिरा गांधी ने अनेक अवसरों पर कहा कि गांधी केवल व्यक्ति नहीं, भारत की अंतरात्मा हैं और उनकी हत्या घृणा की राजनीति का परिणाम थी। लगभग हर जिम्मेदार राष्ट्रीय नेता ने गांधी को सम्मान दिया, क्योंकि वे जानते थे कि गांधी पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं था, भारत के नैतिक आधार पर हमला था।

हत्या के बाद देशभर में शोक और आक्रोश फैल गया। महाराष्ट्र के कई हिस्सों, विशेषकर पुणे और मुंबई में ब्राह्मण विरोधी दंगे हुए क्योंकि गोडसे चितपावन ब्राह्मण था।

घर जले, दुकानें टूटीं, लोग डरे। गांधी ने जीवनभर सांप्रदायिकता बुझाई, उनकी हत्या के बाद वही आग फिर भड़क उठी। इतिहास कभी-कभी बहुत क्रूर व्यंग्य करता है।

गोडसे के तथाकथित “तर्क” की बात भी कर लेते हैं, जिसे आज कुछ लोग बड़ी चालाकी से फैलाते हैं। उसने विभाजन, 55 करोड़ रुपये और मुस्लिम तुष्टीकरण जैसे मुद्दे गिनाए।

सच यह है कि 55 करोड़ रुपये भारत-पाकिस्तान विभाजन समझौते के तहत पाकिस्तान की वैधानिक हिस्सेदारी थे। गांधी का कहना था कि भारत यदि अपना वादा तोड़ेगा तो नैतिक रूप से गिर जाएगा।

दूसरी तरफ गोडसे ने इसे देशद्रोह कहा।मतभेद होना एक बात है, हत्या करना दूसरी। यदि राजनीतिक असहमति का उत्तर हत्या है, तो फिर लोकतंत्र खत्म समझो।

मुकदमा लाल किले में चला। जस्टिस आत्मा चरण ने सुनवाई की। गोडसे ने लंबा बयान पढ़ा। उसने स्वयं को राष्ट्रभक्त साबित करने की कोशिश की। लेकिन अदालतें भावुक भाषणों से नहीं, अपराध से फैसला करती हैं। नतीजा यह हुआ कि नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सजा मिली।

15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में दोनों को फांसी दे दी गई। गांधी जी के कुछ परिजनों ने दया की अपील की थी, क्योंकि गांधी क्षमा के पक्षधर थे, लेकिन राष्ट्र ने इसे गंभीर अपराध माना।

आज कुछ लोग गोडसे को हीरो बताते हैं। यह वही मानसिकता है जो किताब से डरती है, बहस से डरती है, सत्य से डरती है और गोली को तर्क समझती है। जो निहत्थे 78 वर्षीय वृद्ध पर गोली चलाए, वह वीर नहीं हो सकता। जो देश को जोड़ने वाले व्यक्ति की हत्या करे, वह राष्ट्रभक्त नहीं हो सकता। जो नफरत बोए, वह सभ्यता का प्रतिनिधि नहीं हो सकता।

कुछ राजनीतिक दलों के भीतर या आसपास ऐसे तत्व समय-समय पर गोडसे की प्रशंसा करते दिखाई देते हैं। खुलकर नहीं तो इशारों में, सीधे नहीं तो चुप्पी से। कारण सरल है, गांधी का नाम प्रेम, संयम, सत्य और जवाबदेही मांगता है। गोडसे का नाम गुस्सा, ध्रुवीकरण और भीड़ की राजनीति को हवा देता है।

वोट का गणित कई बार नैतिकता का गला घोंट देता है। लोकतंत्र का यह भी एक बीमार चेहरा है।

गांधी के पास निजी संपत्ति लगभग कुछ नहीं थी, पर नैतिक संपत्ति अपार थी। गोडसे के पास पिस्तौल थी, पर नैतिक दिवालियापन भी साथ था। गांधी दुनिया भर में शांति, सत्याग्रह और न्याय के प्रतीक हैं। गोडसे केवल हत्या का पर्याय है।

एक अमर हुआ, दूसरा बदनाम। इतिहास ने दोनों का फैसला कर दिया। बाकी जो लोग हत्यारे की आरती उतारते हैं, वे बस अपनी सोच की राख हवा में उड़ा रहे हैं।

11/08/2025

नरबलि का मामला है और पूरे परिवार को गिरफ्तार कर जेल में डालना चाहिए... पुलिस अन्याय कर रही है...

Want your public figure to be the top-listed Public Figure in Bareilly?
Click here to claim your Sponsored Listing.

Category

Address


Bareilly
243123