Kripaluforeternity
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12/05/2019
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Happy Mother’s Day
20/04/2019
प्रेम रस मदिरा
वृन्दावन, रसिकन रजधानी।
जा रजधानी की ठकुरानी, महरानी राधा - रानी।
जा रजधानी पनिहारिनि बनि, चारिहुँ मुक्ति भरति पानी।
जा रजधानी रज अज याचत, प्रान-सजीवनि सम जानी।
जा रजधानी बिच नहिं पावत, टुक प्रवेश कमला वानी।
कह 'कृपालु' जेहि महिमा कुछ-कुछ, लालिहिकृपा लाल जानी।।
भावार्थ -एक रसिक कहता है कि-श्री वृन्दावन-धाम रसिकों की राजधानी है। जिस राजधानी में वृषभानुनन्दिनी स्वामिनी रूप से सुशोभित है। जिस राजधानी में चारों मुक्तियाँ पनिहारिन बन कर पानी भरती हैं। जिस राजधानी की धूलि को प्राणाधिक प्रिय जानकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भिक्षुक बनकर भिक्षा-याचना करता है। जिस राजधानी में महालक्ष्मी तथा सरस्वती को प्रवेश का अधिकार प्राप्त नहीं है। 'कृपालु' कहते हैं कि इतना ही कहना पर्याप्त है कि वृन्दावन की महिमा किशोरी जी के कृपा-कटाक्ष से श्यामसुन्दर भी कुछ-कुछ ही जानते हैं।
रसिया माधुरी पद संख्या २१
प्रेम रस मदिरा
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