Jai Singh Rathore

Jai Singh Rathore

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Jai Singh Rathore, Congress activist since 1968,
former General Secretary, Rajasthan Pradesh Congre

05/02/2026

“जो चीज़ें पहली नज़र में बहुत कूल लगती हैं, उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी यही होती है कि उनका असर ज्यादा दिन नहीं टिकता।”
प्रसिद्ध साहित्यकार शिवानी की बेटी ईरा पांडे अपनी माँ की जीवनी में एक दिलचस्प प्रसंग दर्ज करती हैं। वह लिखती हैं कि उनके नाना के ठीक बगल वाले घर में डेनियल पंत रहते थे, जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था। नाना की सोच काफ़ी रूढ़िवादी थी, इसलिए उन्होंने दोनों घरों के बीच एक दीवार खड़ी करवा दी—ताकि “उनकी दुनिया” और “हमारी दुनिया” अलग-अलग रहें। घर में सख़्त निर्देश थे कि उस तरफ़ न देखा जाए, न कोई मेल-जोल हो।
शिवानी ने कहीं लिखा है कि डेनियल पंत के घर से उठने वाली मसालेदार मांस की खुशबू उनके साधारण ब्राह्मण रसोईघर तक पहुँच जाती थी और उनकी दाल, आलू की सब्ज़ी और चावल को फीका बना देती थी।
यह वर्णन उसी घर का था, जिसके मुखिया तारादत्त पंत ने 1874 में हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया था—और इस तरह वे कुमाऊँ की उस “नीरस” ब्राह्मण रसोई से आज़ाद हो गए थे।
इसी डेनियल पंत की बेटी आयरीन रूथ पंत ने आगे चलकर अपने से दस साल बड़े, पहले से विवाहित और पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से विवाह किया। इसके साथ ही उन्होंने ईसाई धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार कर लिया।
दिलचस्प बात यह है कि लियाकत अली खान के पूर्वज करनाल के जाट थे, इक़बाल के परदादा कश्मीरी पंडित और जिन्ना के दादा कठियावाड़ी हिंदू। यानी पाकिस्तान की नींव रखने वाले ज़्यादातर लोग, दो-चार पीढ़ी पहले तक उसी सांस्कृतिक दुनिया का हिस्सा थे, जिसे बाद में उन्होंने “नापाक” बताकर खारिज कर दिया—और एक नए देश का निर्माण खून और विभाजन के रास्ते किया।
धीरे-धीरे एक सोच गढ़ी गई—
जो कुछ भी अपने पूर्वजों, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने देश के विरुद्ध हो, वही कूल है।
मांसाहार, नशा, विवाह से बाहर संबंध, भागकर शादी, बार-बार विवाह और धर्म परिवर्तन—इन सबको आधुनिकता और प्रगति का प्रतीक बना दिया गया।
इस्लाम स्वीकार करने के बाद आयरीन रूथ पंत का नाम “गुल-ए-राणा” पड़ा और वे राणा लियाकत के नाम से जानी गईं। वे निस्संदेह साहसी महिला थीं। पाकिस्तान निर्माण के दौर में उन्होंने मुस्लिम लीग की महिला शाखा का नेतृत्व किया—तब यह कूल माना गया।
लेकिन विडंबना देखिए, जब वही पाकिस्तान बन गया और वहाँ “दो महिलाओं की गवाही एक पुरुष के बराबर”
वाला क़ानून आया, तो उसी के विरोध में बोलने पर राणा लियाकत को जेल जाना पड़ा।
जोगेंद्र मंडल ने दलित अधिकारों की उम्मीद में पाकिस्तान का समर्थन किया—वह भी उस समय कूल था। मगर जब नए देश में दलितों पर हो रहे अत्याचार सामने आए, तो उन्हें सब कुछ छोड़कर भारत लौटना पड़ा।
लियाकत अली खान ने अपनी मातृभाषा पंजाबी त्यागकर उर्दू को अपनाया—यह भी तब कूल समझा गया। लेकिन जब यही विचार बंगालियों पर थोपा गया, तो परिणामस्वरूप लाखों जानें चली गईं।
जीवन के अंतिम वर्षों में राणा लियाकत ने अपने भाई नॉर्मन पंत को भेजे एक तार में सिर्फ़ इतना लिखा—
“आई मिस अल्मोड़ा।”
वह जीवन भर मड़ुए की रोटी, पहाड़ी गेहत की दाल और दाड़िम की चटनी को याद करती रहीं।
जिस भोजन को कभी “बोरिंग” कहा गया था, वही स्मृतियों में सबसे सुकून देने वाला बन गया।
यही कूल चीज़ों की सच्ची हक़ीक़त है—
वे कुछ समय तक चमकती हैं, तालियाँ बटोरती हैं, लेकिन अंत में इंसान को उसी जड़ों की याद दिलाती हैं, जिन्हें छोड़कर वह चला था।

पूर्व सांसद मोहर सिंह राठौड़ की मनाई जयंती। 06/01/2026

पूर्व सांसद मोहर सिंह राठौड़ की मनाई जयंती। news plus 24×7@पूर्व सांसद मोहर सिंह राठौड़ की मनाई जयंती।

06/01/2026

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