Abhay Kumar

Abhay Kumar

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Author, Muslim Personal Law (Manohar, 2026) | PhD, JNU | Interested in Social Justice & Minority Rights | Email: [email protected]

16/06/2026

Only those who put pen to paper know the unique pain and pleasure of the writing process.

12/06/2026

क्या मुसलमानों को कॉकरोच जनता पार्टी का समर्थन करना चाहिए?

अभय कुमार

इन दिनों इस बात पर तीखी बहस चल रही है कि क्या मुसलमानों को कॉकरोच जनता पार्टी का समर्थन करना चाहिए या उससे पूरी तरह दूरी बनाए रखनी चाहिए। कॉकरोच जनता पार्टी का खुलकर या परोक्ष रूप से विरोध करने वाले गुट का तर्क है कि जिस तरह अन्ना हज़ारे आंदोलन ने हिन्दुत्व राजनीति को मजबूत करने में भूमिका निभाई थी, उसी तरह कॉकरोच जनता पार्टी का गठन भी विपक्ष को कमजोर करने के उद्देश्य से किया गया है।

इस दृष्टिकोण के अनुसार, ‘जेन-ज़ी’ के इस नवगठित संगठन का मुख्य उद्देश्य केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ बढ़ते जन-असंतोष के लिए एक ‘सेफ़्टी वाल्व’ का काम करना है। इस दावे के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि यदि सत्ताधारी वर्ग वास्तव में कॉकरोच जनता पार्टी के खिलाफ होता, तो उसे 7 जून को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी जाती।

इसके अलावा, कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के पुराने रिकॉर्ड का भी हवाला दिया जा रहा है। दावा किया जाता है कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाले ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन के साथ काम किया था, जिसके उभार से भाजपा को सबसे अधिक राजनीतिक लाभ मिला। इस आंदोलन के कारण कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इतनी “बदनाम” हुई कि भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक दल आज भी क़ौमी सियासत में व्यापक स्वीकार्यता पाने के लिए संघर्ष कर रही है। यह दृष्टिकोण कांग्रेस से जुड़े सोशल मीडिया ‘इन्फ्लुएंसर्स’ द्वारा व्यक्त किए जा रहे विचारों से भी मेल खाता है।

जहाँ आम आदमी पार्टी, टीएमसी, समाजवादी पार्टी, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और वामपंथी दलों सहित कई विपक्षी पार्टियाँ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के मुद्दे पर अपने-अपने तरीके से मुखर रही हैं, वहीं कांग्रेस ने पूरे घटनाक्रम पर अपेक्षाकृत सतर्क, बल्कि कुछ हद तक मौन रुख अपनाया है।

आलोचकों का मानना है कि इसके पीछे कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरियाँ जिम्मेदार हैं। उनके अनुसार, कांग्रेस न तो भाजपा सरकार की जनविरोधी-नीतियों के खिलाफ किसी बड़े जन-आंदोलन को संगठित करने में प्रभावी भूमिका निभाती दिखाई देती है और न ही ऐसे आंदोलनों को पूरी तरह स्वीकार करने के लिए तैयार दिखती है, जिनमें उसके शीर्ष नेता केंद्रीय भूमिका में न हों।

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कांग्रेस इस समय असमंजस की स्थिति में है। पार्टी के भीतर गुटबाज़ी अपने चरम पर है और इसमें दक्षिणपंथी तत्वों का वर्चस्व अब भी कायम है, जो यह मानते हैं कि ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह ही उसे दोबारा सत्ता तक पहुँचा सकती है।

यही वजह है कि कांग्रेस के अंदर ‘नई’ लकीर खींचने की कोशिशें नाकाम कर दी जा रही हैं और पार्टी के भीतर वंचित समाज से आने वाले नेताओं को खुले दिल से स्वीकार नहीं किया जा रहा है। लगातार चुनावी पराजयों के बावजूद उसका नेतृत्व अपनी पारंपरिक राजनीतिक रणनीति में कोई बड़ा बदलाव करने के प्रति विशेष उत्साह नहीं दिखा रहा।

यही वजह है कि कांग्रेस से जुड़े कुछ पारंपरिक मुस्लिम नेता आम मुसलमानों को कॉकरोच जनता पार्टी से दूरी बनाए रखने और कांग्रेस के करीब आने की सलाह दे रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि इस रुख के पीछे वैचारिक कारणों से अधिक इन नेताओं की आला-कमान को खुश रखने की प्रवृत्ति काम कर रही है। इसलिए कॉकरोच से दूर रहने की उनकी सलाह को उनके निजी हितों से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

हालाँकि, कांग्रेस लॉबी की आलोचना का यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि कॉकरोच जनता पार्टी का समर्थन करने वाली राजनीतिक पार्टियों की आँखों में कोई क्रांतिकारी सपना है। इस आंदोलन में भाग लेने वाले या इसका समर्थन करने वाले विपक्षी नेताओं को भी भली-भांति पता है कि उनके अपने संगठनों में इतनी क्षमता नहीं है कि वे अपने नेतृत्व में ऐसा व्यापक जन-आंदोलन खड़ा कर सकें। वे सोशल मीडिया पर मोदी की आलोचना को ही ‘अपोज़िशन’ अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के रूप में देखते हैं। सत्ता से बाहर हो चुकी ये विपक्षी पार्टियाँ फिर से सत्ता में लौटने के लिए बेचैन हैं। हालाँकि इनमें इतनी ताकत नहीं है कि वे सड़कों पर उतरकर प्रतिरोध कर सकें, इसलिए वे अक्सर आसान रास्ता तलाशती हैं। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी से उनकी नज़दीकी बढ़ने का एक खतरा यह भी है कि कहीं वे अपनी रूढ़िवादी सोच से दूसरों को भी प्रभावित न कर दें।

इसी बीच जिस तरह विपक्षी पार्टियों के नेता रातों-रात पार्टी बदल रहे हैं और भाजपा के खिलाफ चुनाव जीतने वाले विपक्षी उम्मीदवार कुछ ही महीनों में भाजपा में शामिल हो जा रहे हैं, वह न सिर्फ कमजोर विपक्ष बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भी अस्वस्थ होने के संकेत देता है।
वास्तव में, देश की व्यवस्था इतनी जर्जर हो चुकी है कि मजदूर वर्ग की कौन कहे, यहाँ तक कि मध्यम वर्ग की स्थिति भी लगातार बदतर होती जा रही है। बढ़ती महंगाई ने गरीबों के लिए दो-वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल बना दिया है, जबकि परीक्षा प्रश्नपत्रों के ‘लीक’ होने और शिक्षा व्यवस्था में कथित भ्रष्टाचार ने मध्यम वर्ग के भीतर भी यह भावना पैदा कर दी है कि सत्ताधारी पार्टी उनके बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। यही कारण है कि रविवार को जंतर-मंतर पर आयोजित विरोध प्रदर्शन में केवल छात्र और नौकरी के अभ्यर्थी ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में उनके अभिभावक भी शामिल हुए।

सत्ताधारी भाजपा भी इस वास्तविकता से अनभिज्ञ नहीं है। जिस मध्यम वर्ग ने उसे सत्ता तक पहुँचाया था, उसके अनेक सपने अब चकनाचूर हो चुके हैं और उसके बड़ी संख्या में युवा गहरी निराशा का सामना कर रहे हैं। उनमें से कुछ ने आत्महत्या तक कर ली है। सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी की तेज़ी से बढ़ती लोकप्रियता और इंस्टाग्राम पर उसके दस मिलियन ‘फॉलोअर्स’ को व्यवस्था के प्रति बढ़ते असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, और सरकार भी इस तथ्य से पूरी तरह परिचित है।

एक ओर मोदी सरकार अपने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बचाव करना चाहती है, तो दूसरी ओर उसे यह भी एहसास है कि जनाक्रोश को सरकारी तंत्र के सहारे अनिश्चित काल तक नियंत्रित नहीं रखा जा सकता। यही कारण है कि सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शनों को सीधे तौर पर रोकने से परहेज़ किया। उसे आशंका थी कि आंदोलन को दबाने की कोई भी कोशिश उसे और अधिक लोकप्रिय बना सकती है।

हालाँकि, इस दौरान उसका प्रोपेगंडा तंत्र सक्रिय बना रहा। जंतर-मंतर पर हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान कुछ हिंदुत्ववादी तत्वों ने व्यवधान उत्पन्न करने की कोशिश की और मौजूदा स्थिति के लिए कांग्रेस तथा अरविंद केजरीवाल समेत विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया। इसी क्रम में कुछ हिंदुत्व कट्टरपंथी समूहों ने कॉकरोच जनता पार्टी को मुस्लिम “जिहादियों” और “खालिस्तानियों” से जोड़ने का प्रयास भी किया। उनकी पूरी कोशिश थी कि इस आंदोलन को किसी न किसी तरह कलंकित किया जाए और इसे सांप्रदायिक रंग दिया जाए, ताकि लोगों की एकता को कमजोर किया जा सके। हालाँकि, भाजपा अध्यक्ष का इस पूरे मसले पर आया बयान विशेष रूप से दुर्भाग्यपूर्ण माना जा रहा है। नितिन नबी ने कॉकरोच जनता पार्टी की परोक्ष आलोचना करते हुए कहा कि कुछ लोग विदेशों से भारतीय युवाओं को दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं।

जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन से जो संदेश उभरकर सामने आया है, वह यह है कि कॉकरोच जनता पार्टी बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों में अपनी आस्था व्यक्त कर रही है। हालाँकि, इस बात की पूरी संभावना है कि इस आंदोलन से जुड़े विभिन्न संगठन और नेता इसे अलग-अलग वैचारिक दिशाओं में मोड़ने का प्रयास करें। डॉ. अंबेडकर के साथ-साथ गांधी का नाम भी लिया जा रहा है, और ‘जय भीम’ के साथ ‘वंदे मातरम्’ के नारे भी सुनाई दिए हैं। वामपंथी छात्र संगठन तथा ‘क्वीर’ आंदोलन से जुड़े ‘एक्टिविस्ट’ भी इसमें सक्रिय हैं। इसलिए यह कहना अभी मुश्किल है कि यह आंदोलन अंततः किस वैचारिक स्तंभ पर टिकेगा।

मगर एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि यह आंदोलन सांप्रदायिक राजनीति का विरोध कर रहा है और शिक्षा क्षेत्र से व्यवस्था में सुधार की शुरुआत करने की बात कर रहा है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। ये ऐसे मुद्दे हैं जो देश के मुस्लिम और गैर-मुस्लिम, दोनों समुदायों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

वर्तमान परिस्थितियों में मुसलमानों को इस देश के नागरिक के रूप में अपने दायित्वों से पीछे नहीं हटना चाहिए। हालाँकि, अन्ना हज़ारे आंदोलन का अनुभव हमें यह भी सिखाता है कि हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती और हर आंदोलन समाज को आगे ले जाने के बजाय कभी-कभी उसे पीछे भी धकेल सकता है। इसलिए मुसलमानों को न तो ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का अंध-विरोध करना चाहिए और न ही बिना शर्त उसका समर्थन करना चाहिए। उन्हें प्रत्येक घटनाक्रम और राजनीतिक पहल को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन में भागीदारी से पहले मुसलमान न केवल देश की व्यापक समस्याओं पर विचार करें, बल्कि अपने मिल्ली मसायल—जैसे गरीबी, निरक्षरता, बेरोज़गारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी, सांप्रदायिकता तथा राज्य के दमन और उत्पीड़न—को भी एजेंडे का हिस्सा बनाएं।

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि मुसलमान किसी भी समूह या दल के अधीन होकर राजनीति करने के बजाय अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ संवाद स्थापित करें, शोषित और वंचित वर्गों के साथ व्यापक गठबंधन बनाएं तथा उनकी सामूहिक आवाज़ को मज़बूत करें। जिस तरह दलित आंदोलन ने यह नारा दिया था कि “वोट हमारा, राज तुम्हारा नहीं चलेगा”, उसी तरह मुसलमानों को भी किसी का स्थायी वोट-बैंक नहीं बनना चाहिए।

आज़ादी के बाद सेक्युलर पार्टियों ने मुसलमानों का वोट तो भरपूर लिया, मगर उन्हें क़ियादत और वाजिब नुमाइंदगी देने के मामले में हमेशा हिचकिचाहट दिखाई। आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि भाजपा मुसलमानों को चुनाव में टिकट नहीं देती, और यदि कहीं देती भी है तो उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए कोई विशेष प्रयास करती दिखाई नहीं देती। भाजपा एक के बाद एक राज्यों में सरकारें बना रही है, लेकिन वहाँ की विधानसभाओं में उसके सदस्यों के बीच मुसलमान ढूँढ़ने से भी नहीं मिलते, न ही उन्हें मंत्रिमंडलों में समुचित स्थान दिया जा रहा है।

यह तो हिंदुत्व की राजनीति का हाल है, जो खुले तौर पर मुसलमानों को हाशिए पर रखकर गैर-मुस्लिम समुदायों को लामबंद करने की कोशिश कर रही है। वहीं तथाकथित सेक्युलर पार्टियाँ भी मुसलमानों का नाम लेने या उन्हें टिकट देने से पहले कई बार यह सोचती हैं कि कहीं इससे बहुसंख्यक समाज नाराज़ तो नहीं हो जाएगा। यह पूरी सूरत-ए-हाल बताती है कि देश की राजनीति का एक बड़े पैमाने पर सांप्रदायीकरण हो चुका है और सेक्युलरिज़्म की बातें काफी हद तक क़ानून की किताबों तक ही महदूद होकर रह गई हैं।

ऐसे माहौल में मुसलमानों में निराशा पैदा होना स्वाभाविक है। इस निराशा का फ़ायदा उठाकर यह प्रोपेगंडा भी चलाया जा रहा है कि मुसलमानों को जहाँ मौक़ा मिले, वहाँ चले जाना चाहिए। कुछ मुसलमान इस सोच पर यक़ीन करते हुए अवसरवादी एत्तेहादों का हिस्सा भी बन रहे हैं और उन पार्टियों के साथ जा मिले हैं जिनकी किसी भी अल्पसंख्यक अधिकार या ‘प्लुरलिज़्म’ के प्रति कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं है।

यह रुझान भी ख़तरनाक है, क्योंकि यदि ग़लत मंज़िल की ओर जा रही बस में किसी मुसाफ़िर को तमाम सुविधाओं के साथ सीट मिल भी जाए, तब भी वह अपनी मंज़िल तक नहीं पहुँच पाएगा। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति के निजी स्वार्थ, जातीय या सांप्रदायिक हितों और आम अवाम के व्यापक हितों के बीच एक संतुलन और सामंजस्य होना चाहिए। इसलिए यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि मुसलमान हों या कोई अन्य समुदाय, उन्हें ऐसा कोई राजनीतिक निर्णय नहीं लेना चाहिए जो संविधान के मूलभूत मूल्यों—समानता, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता—के विरुद्ध जाता हो।

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अभय कुमार (Forward Press, February 7, 2026) Link https://www.forwardpress.in/2026/02/news-ugc-regulation-3/

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Religious Conversion and Right-Wing Propaganda in Bihar, Abhay Kumar writes in the Urdu daily Inquilab (March 3, 2026).

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