Vishal Rastogi
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17/05/2025
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कभी सोचा है ---
जब कोई चीज़ हमसे छीनी जाए,
दिल में टीस सी उठती है।
अधूरी सी लगती है ज़िंदगी,
हर ख़ुशी कहीं खो जाती है।
पर कभी सोचा, हम जो लेते,
हर दिन धरती से चुपचाप,
वो धूप, वो छाँव, वो पानी,
उनका क्या कोई हिसाब?
पेड़ों की सांसें हमने छीनी,
नदियों से छीना बहाव।
हवाओं में भर दिया ज़हर,
फिर भी कहते, "हम सभ्य हैं अब!"
हम दर्द में तड़पते हैं,
जब अपना कुछ हमसे जाता है।
पर जो प्रकृति से लूट लिया,
उसका ग़म कौन बताता है?
कभी धरती ने पूछा हमसे?
"तुम क्यों मेरा हरा लहू पीते हो?"
नदी ने कब कहा,
"अब और नहीं, मैं सूख रही हूँ धीरे-धीरे।"
फिर भी वो देती रही सब कुछ,
बिन कहे, बिन कुछ माँगे।
और हम?
सिर्फ़ लेते गए, जैसे हक़ हो हमारा।
अब भी वक़्त है, सोच बदलो,
थोड़ा लौटाओ, थोड़ा सँभालो।
वरना जो प्रकृति देगी जवाब,
वो होगा एक अनकहा भूचाल।
विशाल रस्तोगी
ऐ मन, तू सुन ज़रा, किसी से बहस मत किया कर,
हर बात को दिल पर लेना छोड़, अब थोड़ा सह लिया कर।
हर बार तू ही क्यों टूटे, हर बार तू ही क्यों बोले?
थोड़ा सा चुप रहकर, अपने ज़ख्मों को धो लिया कर।
तेरे शब्द कभी-कभी रिश्ते तोड़ देते हैं,
तू समझता है न्याय कर रहा है — पर दिल तोड़ देते हैं।
हर बार तर्क नहीं काम आते,
कभी मौन से भी सुलझ जाते हैं रास्ते।
ऐ मन, तू थक गया है ना?
कभी किसी की बेरुख़ी पर रोया है चुपचाप?
कभी अपनों की अनकही बातें चुभी हैं?
फिर क्यों हर बार तू ही चीख़ कर जवाब ढूँढता है?
बहस में जो जीते, वो भी क्या पाए?
कभी कोई अपना ही तो खो जाए…
तो किस काम की वो जीत, ऐ मन?
जिसमें तन्हाई ही साथ रह जाए।
तो सुन… अब खुद से प्यार करना सीख ले,
हर सवाल का जवाब देना छोड़ दे।
कुछ लोग समझेंगे तुझे ख़ामोश देखकर,
बाकी जो जाएं — उन्हें जाने दे।
ऐ मन, तू अब बस इतना कर,
तू सुकून ढूँढ... बहस नहीं।
कभी अपनी चुप से भी रिश्ता निभा,
कभी आंसू पीकर भी मुस्कुरा।
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अकेले मुस्कराकर जीना सीख लिया है
हर आँसू को चुपचाप पीना सीख लिया है
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