Infinite Solutions
Ancient Classical KriyaYoga, Life Problem, Chronic Health Problem, Self-healing Solutions. Bhutashuddhi, Chakra healing and Balance.
22/02/2024
♾️ मन की शक्ति अतीत है|
महान संतों द्वारा किए गए चमत्कार हमारे लिए चमत्कार हो सकते हैं, लेकिन उनके लिए नहीं। जब आप जानते हैं कि मन वह शक्ति है जो इस ब्रह्मांड को बनाती है, तो आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं।
लेकिन पहले "अद्भुत" चीजें करने की कोशिश न करें
मन सब कुछ है; लेकिन जब तक आप नहीं सीखते कि इसकी शक्ति का उपयोग कैसे करना है, तब तक "क्योंकि सब मन है, मैं इस चट्टान से कूद जाऊंगा और सब ठीक हो जाएगा" का तर्क करना मूर्खपन है।
लेकिन जो कुछ भी आप मन को सच्चे रूप से प्रभावित कर सकते हैं, वह आप कर सकते हैं
सब कुछ मन से बनाया गया है, और इसे मन द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। जैसे ही आप मानसिक शक्ति को और बढ़ाते हैं, आप आखिरकार कुछ भी कर सकेंगे।
महान लोगों ने इसका प्रदर्शन किया है
यीशु ने बीमारों को ठीक किया, मरे हुए को जगाया, पानी को शराब में बदला। कृष्ण ने पूरे पहाड़ को उठाया और उसे अपने भक्तों के ऊपर लटका दिया ताकि वे एक विनाशकारी तूफान से सुरक्षित रह सकें।
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Everyone
13/02/2024
An Ancient Wisdom - "Prana-2"📜
''सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान, को दो श्वासों के बीच टिकाओ। इस से थोड़े ही दिन में नया जन्म होगा''। “सांसारिक कामों में लगे हुए” इसलिए कहा गया है, “सांसारिक कामों में लगे हुए… तुम जो भी कर रहे हो, उसमे अवधान को दो श्वासों के अंतराल में स्थिर रखो।
लेकिन काम-काज में लगे हुए ही इसे साधना है। ”श्वासों को भूल जाओं और उनके बीच में अवधान को लगाओ। एक श्वास भीतर आती है। इसके पहले कि वह लौट जाए, उसे बाहर छोड़ा जाए। वहां एक अंतराल होता है। उदाहरण के लिए तुम भोजन कर रहे हो।
भोजन करते जाओ और अंतराल पर अवधान रखो। तुम चल रहे हो, चलते जाओ और अवधान को अंतराल पर टिकाओ। तुम सोने जा रहे हो, लेटो और नींद को आने दो। लेकिन तुम अंतराल के प्रति सजग रहो। काम-काज में डांवाडोल न हों और अंतराल में स्थिर रहें।
तब तुम्हारे अस्तित्व के दो तल हो जाएंगे। करना ओर होना अथार्त एक करने का जगत और दूसरा होने का जगत। एक परिधि है और दूसरा केंद्र। परिधि पर काम करते रहो, रूको नहीं; लेकिन केंद्र पर भी सावधानी से काम करते रहो।
तब तुम्हारा काम-काज अभिनय हो जाएगा। मानों तुम कोई पार्ट अदा कर रहे हो। उदाहरण के लिए, तुम किसी नाटक में पार्ट कर रहे हो । नाटक में तुम श्रीकृष्ण बने हो। यद्यपि तुम श्रीकृष्ण का अभिनय करते हो, तो भी तुम स्वयं बने रहते हो।
केंद्र पर तुम जानते हो कि तुम कौन हो और परिधि पर तुम श्रीकृष्ण का रोल अदा करते हो। तुम जानते हो कि तुम श्रीकृष्ण नहीं हो, उनका का अभिनय भर कर रहे हो। तुम कौन हो तुमको मालूम है। तुम्हारा अवधान तुममें केंद्रित है और तुम्हारा काम परिधि पर जारी है।
यदि इस विधि का अभ्यास हो तो पूरा जीवन एक लंबा नाटक बन जाएगा। तुम एक अभिनेता होगें। अभिनय भी करोगे और सदा अंतराल में केंद्रित रहोगे। जब तुम अंतराल को भूल जाओगे, तब तुम अभिनेता नहीं रहोगे, तब तुम कर्ता हो जाओगे।
तब वह नाटक नहीं रहेगा। उसे तुम भूल से जीवन समझ लोगे और यही हम सबने किया है। हर मनुष्य सोचता है कि वह जीवन जी रहा है लेकिन यह जीवन नहीं बल्कि एक रोल है। जो समाज ने, परिस्थितियों ने, संस्कृति ने, देश की परंपरा ने तुमको थमा दिया है।
तुम अभिनय कर रहे हो और तुम इस अभिनय के साथ तादात्म्य भी कर बैठे हो। उसी तादात्म्य को तोड़ने के लिए यह विधि है। श्रीकृष्ण के अनेक नाम है, वे सबसे कुशल अभिनेताओं में से एक है। वे सदा अपने में स्थिर है और लीला कर रहे है।
गंभीरता तादात्म्य से पैदा होती है। यदि नाटक में तुम सच ही श्री कृष्ण हो जाओ तो अवश्य समस्याएं खड़ी होगी। जब-जब राधा से विछोह होगा , तो तुमको दिल का दौरा पड़ सकता है और पूरा नाटक बंद हो जाना भी निश्चित है। लेकिन अगर तुम बस अभिनय कर रहे हो ।
तो राधा का विछोह से तुमको समस्याएं नहीं होगी । तुम अपने घर लौटोगे और चैन से सो जाओगे। इसका बड़ा गहरा अर्थ है, और अर्थ यह है कि यदि तुम समझ जाते हो कि तुम्हारे लिए जीवन नाटक हो जाता है। तो उसका अर्थ हुआ कि तुम केवल उसे अंजाम देने वाले हो।
तुमको उसे जीना नहीं उसका अभिनय करना है। यह विधि, तुमको एक खेल बना देती है। तुम दो श्वासों के अंतराल में स्थिर हो और जीवन परिधि पर चल रहा है। यदि तुम्हारा अवधान केंद्र पर है, तो तुम्हारा अवधान परिधि पर नहीं है। परिधि पर जो है वह उपावधान है।
इस विधि से तुम्हारा समूचा जीवन बदल जाएगा और स्वय की प्रतीति होना शुरू होगा । जब स्वय को जान लिया तो बहुत से संसारिक दुखो से मुक्त हो जाते।
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