Divya Gupta
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17/08/2024
जब तक बाप जिंदा रहता है, बेटी मायके में हक़ से आती है और घर में भी ज़िद कर लेती है और कोई कुछ कहे तो डट के बोल देती है कि मेरे बाप का घर है। पर जैसे ही बाप मरता है और बेटी आती है तो वो इतनी चीत्कार करके रोती है कि, सारे रिश्तेदार समझ जाते है कि बेटी आ गई है।*
*और वो बेटी उस दिन अपनी हिम्मत हार जाती है, क्योंकि उस दिन उसका बाप ही नहीं उसकी वो हिम्मत भी मर जाती हैं।*
*आपने भी महसूस किया होगा कि बाप की मौत के बाद बेटी कभी अपने भाई- भाभी के घर वो जिद नहीं करती जो अपने पापा के वक्त करती थी, जो मिला खा लिया, जो दिया पहन लिया क्योंकि जब तक उसका बाप था तब तक सब कुछ उसका था यह बात वो अच्छी तरह से जानती है।*
आगे लिखने की हिम्मत नहीं है, बस इतना ही कहना चाहता हूं कि बाप के लिए बेटी उसकी जिंदगी होती है, पर वो कभी बोलता नहीं, और बेटी के लिए बाप दुनिया की सबसे बड़ी हिम्मत और घमंड होता है, पर बेटी भी यह बात कभी किसी को बोलती नहीं है।
बाप बेटी का प्रेम समुद्र से भी गहरा है
13/06/2024
हर तस्वीर कुछ कहती है
“ बुआ जी आज दोपहर की फ्लाइट से मैं रांची पहुंच रही हूं”।कुहू चहकती हुई आवाज में बोली, “बहुत मजा आएगा,बहुत दिनों बाद आप सब से मिलना भी होगा,साथ ही साथ आरव और अंकिता से मिलना भी हो जाएगा “उधर से बुआ की बहुत धीमी आवाज सुनाई दी, “ठीक है बेटी जल्दी से आजा मेरा मन भी तुझे देखने को तरस रहा है।” वह सोच रही थी कैसे जल्दी से वह रांची पहुंचे।उसे याद आ रहा था, बुआ का वह आंगन जिसमें लगा हुआ अशोक का और हरसिंगार का पेड़। उसे याद आ रहा था कि कैसे सुबह उठते ही वह दौड़कर आंगन में जाती और हरसिंगार के फूल जो चारों तरफ आंगन में बिखरे हुए होते, उन्हें वह अपने हाथों से बटोरने लगती। हरसिंगार के फूलों की महक कहीं उसके मन में अंदर तक रच बस गई थी। उसे फ्लाइट में बैठे-बैठे वो सारी घटनाएं याद आ रही थी, कैसे वह और आरव अशोक के पेड़ पर चढ़ जाते थे, चिड़िया के घोंसले को देखने के लिए, एक बार जब उन्होंने चिड़िया के अंडे को छूने की कोशिश की थी तो बुआ ने उन्हें बहुत डांटा था कि तुम्हें कभी भी अंडों को हाथ से नहीं छूना चाहिए नहीं तो चिड़िया उनको सेंतेगी
नहीं और चिड़िया के अंडे खराब हो जाएंगे। बुआ उन चिड़िया के बच्चों के लिए थोड़ा दाना डाल देती थी और पानी भी रख देती थी गर्मी के दिनों में।
सोचते -सोचते कब सफर खत्म हो गया और फ्लाइट ने रांची में लैंड किया, पता ही नहीं चला। टैक्सी घर के सामने रुकते ही वह सोचने लगी आज तो बहुत मजा आएगा,पहले तो आरव की खबर लेगी कि क्यों वह मुझे लेने एयरपोर्ट तक भी नहीं आया।कोई बात नहीं बच्चू से मिलकर बताऊंगी।घंटी बजते ही जैसे दरवाजा खुला वह चौंक पड़ी एक सोलह वर्षीय नवयौवना ने दरवाजा खोला और बोली, “ आइए दीदी आप कुहू हो ना,बुआ जी आपका बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही हैं। बुआ -बुआ चिल्लाते हुए जैसे वह अंदर के कमरे की तरफ बढ़ी,वह अचंभित सी खड़ी रह गई। बुआ जो अपनी खूबसूरती की मिसाल थी,आज लग रहा है जैसी अपनी उम्र से और ज्यादा बूढी हो गई हैं ।बुआ ने कुहू को गले से लगा लिया, उनकी आंखों से अनवरत आँसू गिरने लगे।वह समझ गई कि ये आँसू दिल में बहुत सा दर्द छुपाए हुए हैं। आरव और अंकु कहीं भी दिखाई नहीं दिए।बुआ जैसे कुछ छिपाना चाह रहीं थीं वह पहले ही बोल उठी,अरे आरव और अंकु दोनों इन दिनों नौकरी की वजह से कुछ परेशान थे तो दोनों को मैंने ही कहा तुम दोनों यहां से बाहर जाकर नौकरी करना चाहो तो चले जाओ, तुम दोनों का तो अभी पूरा भविष्य तुम्हारे सामने पड़ा है। मेरा क्या है?ये बोलते हुए बुआ अपनी आंखों में आए हुए आंसुओं को छुपाने का प्रयास कर रही थी,लेकिन मैं संकोच के कारण बुआ जी से यह भी नहीं पूछ सकी, लेकिन आरव तो कहता था कि कोई भी परिस्थिति हो, मैं अपनी मां को कभी अकेला नहीं छोडूंगा। शायद संकोच ने मेरे होंठ सिल दिए शायद यही संकोच बुआ जी को भी अपने दर्द को बयाँ करने से रोक रहा था। बुआ जी बाहर जाकर उसी हरसिंगार और अशोक के पेड़ के नीचे बैठ गई,जहाँ पर उस बया ने अपना घोंसला बनाया था। बया आज अकेली थी बच्चे तो कब के उड़ चुके थे।
त्रिशला मिश्रा
स्वरचित
बेंगलुरु
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