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पनी जिंदगी में "कर्मों का तूफ़ान" पैदा करो,
भाग्य के रास्ते अपने आप खुल जायेंगे1. "कर्म करो, फल की इच्छा मत करो."
2. "हमारी सफलता हमारे द्वारा किये गए "कार्य के पीछे की नियत" पर निर्भर करती है....."
---------------------------------1. "कर्म करो, फल की इच्छा मत करो" :-
धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य. हमारे ग्रंथों ने कर्त्तव्य को ही धर्म कहा है. हमें भी जीवन में अपने कर्त्तव्य को पूरा करने में कभी भी ये नहीं सोचना है कि ये कर्त्तव्य करने से हमारा नाम होगा या बेइजत्ती, हमारा फायदा होगा या नुकसान. अपने मन को सिर्फ और सिर्फ अपने कर्तव्य पर टिकाकर काम करना है. इससे हमें अपनी "जिंदगी के सबसे बढ़िया परिणाम" मिलेंगे और सबसे बड़ी बात हम काफी बिमारियों से मुक्त रहेंगे. हमारे बीमार पड़ने के सबसे बड़े कारणों में से एक है, हमारा अपने "कर्तव्यों को करने से पहले उसके फायदे या नुकसान के बारे में सोचकर कार्य करना".चलिए जरा कुछ उदाहरण लेते हैं :-
1. स्कूल या कॉलेज में पढ़ाई पर कम और कितने नंबर आएंगे, इस पर ज्यादा ध्यान देते हैं.
2. अपने ऑफिस में काम में पूरा ध्यान न लगा कर, हमारी सैलरी कितनी और कब बढ़ेगी, इस पर ज्यादा ध्यान देते हैं.
3. बिज़नेस में पूरा ध्यान ग्राहक की सेवा में न लगा कर, साल के आखिर में कितना मुनाफा होगा, इस पर ज्यादा ध्यान देते हैं.
4. राजनीति में एक बार जीतने के बाद, काम करने की जगह, पहले दिन से ही अगली बार का टिकट मिलेगा की नहीं, इस पर ज्यादा ध्यान देते हैं.मित्रों शुरू से ही "अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा" हमारे अंदर नकारात्मक भाव पैदा करती है और फिर हम हर वक़्त अपने कर्त्तव्य यानि कार्य को न कर अपनी "पसंद के परिणाम" पर ही "ध्यान केंद्रित" कर देते हैं और अपने को "धीरे धीरे कमजोर" करते हैं.गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने यही कहा है - "कर्म करो, फल की इच्छा मत करो" और "कर्म ही पूजा है."2. मित्रों हमें इससे भी महत्वपूर्ण बात, "किसी भी कार्य को करने के पीछे की नियत" को भी समझना होगा, जी हाँ किसी भी कार्य (चाहे छोटा हो या बड़ा).
अगर पहले से ही हमारी नियत गलत है और हमने वो कार्य शुरू कर दिया तो पहले से ही समझ लीजिएगा कि वो कार्य शुरू होकर चलने तो लग जायेगा पर बहुत आगे तक नहीं जा सकता. जैसे :-
(a) अगर हम "स्कूल/ कॉलेज" में पढ़ाई "अपना भविष्य बनाने की नियत से नहीं" अपितु "अपने दोस्तों को दिखाने की नियत" से कर रहें हैं तो हम बहुत ज्यादा सफल नहीं हो पाएंगे.
(b) अगर हम "ऑफिस" में काम "खुद को सीखने की नियत से नहीं" अपितु "अपने बॉस को खुश करने की नियत" से कर रहे हैं तो भी हम अपनी जिंदगी में बहुत ज्यादा सफल नहीं होंगे.
(c) अगर हम "बिज़नेस" अपने को "बढ़ाने की नियत से नहीं" अपितु "अपने प्रतिद्वंद्वीयों को गिराने" के लिए कर रहे हैं तो भी हम बिज़नेस में बहुत ज्यादा सफल नहीं होंगे.
(d) अगर हम "राजनीति "समाज को बढ़ाने की नियत से नहीं" अपितु "अपने को बढ़ाने" के लिए कर रहे हैं तो भी हम एक दिन नीचे आएंगे ही आएंगे.मित्रों जब हम कोई भी "काम सिर्फ दूसरों को दिखाने या दूसरों को गिराने की नियत" से करते हैं तो हम दूसरों के "सोच के जाल" "(Trap of Thinking)" में फंस जाते हैं और तब हमारी "अपनी सोच बंद" हो जाती है और हम "दूसरों की सोच के इर्द गिर्द ही घूमते घूमते" अपनी सारी की सारी जिंदगी गुजार देते हैं.इसलिए मित्रों आप सभी से नम्र निवेदन है की जिंदगी जीनी है, तो, "किसी को भी गिराने की सोच से कोई काम मत करो" और "अगर हमने ये किया, तो समझ लीजिएगा कि जब उस काम की "शुरूआत ही गलत नियत" से हुई है, तो, हमें जिंदगी में "सफलता मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता."ये बात भी भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में हमें "समझाकर", "सचेत रहने" के लिए कहा है कि "हमारी सफलता कार्य के पीछे की नियत पर ही निर्भर करती है."मित्रों अगर हम "अपना धर्म यानि कर्त्तव्य यानि कर्म" "बिना किसी फल की इच्छा के साथ करेंगे" और "किसी भी कार्य को करने से पहले "निस्वार्थ नियत" को साथ रखेंगे" तो मान कर चलिए हमको किसी भी "कर्म के" "सबसे बेहतर, जी हाँ सबसे बेहतर फल मिलेंगे, इसमें कोई संशय नहीं.किसी ने बिलकुल सही कहा है :-अपनी जिंदगी में "कर्मों का तूफ़ान" पैदा करो,
भाग्य के रास्ते अपने आप खुल जायेंगे ......
1. अंतरिक्ष में कुल कितने तारामंडल हैं? – 89 2. सूर्य का पृष्ठीय तापमान कितना आंका गया है? – 6000°C 3. सूर्य के रासायनिक मिश्रण में हाइड्रोजन का प्रतिशत कितना है? – 81% 4. किस ग्रह को ‘सौन्दर्य का देवता’ कहा जाता है? – शुक्र को 5. सौरमंडल का सबसे ठंडा ग्रह कौन-सा है? – नेप्च्यून 6. हेली पुच्छल तारा कितने वर्ष बाद नजर आता है? – 76 वर्ष 7. हेली पुच्छल तारा को किस वर्ष देखे जाने की संभावना है? – 2062 में 8. हेली पुच्छल तारा अंतिम बार कब दिखई दिया था? – 1986 ई .में 9. ग्रहों के गति के नियम को किसने प्रतिपादित किया? – केप्लर ने10. कौन-से ग्रह मंगल और यूरेनस के मध्य स्थित हैं? – बृहस्पति और शनि 11. अपने परिक्रमा पथ पर पृथ्वी लगभग किस माध्य वेग से सूर्य के चक्कर लगाती है? – 30km/s 12. मंगल पर जीवन की उपस्थिति के लिए कौन-सी एक अवस्था सबसे सुसंगत है? – बर्फ
ताकतवर कौन - मैं या वो
ताकतवर कौन - Positivity या Negativity
ताकतवर कौन - भारत का निर्माणकर्ता या भारत को पीछे धकेलने वालासोच है हमारी आखिर "भारत के निर्माणकर्ता" हैं हम.
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कोई आदमी बार बार आकर हमारे साथ बदतमीजी,गाली गलौच और जगह जगह हमारी बेज्जती करता है ? एक दिन मैंने भी उसके साथ बदतमीजी, गाली गलौच कर दी.सोचिये कमजोर कौन ?"कमजोर मैं हूँ" क्योँकि दूसरे ने मुझे अपनी negativity से इतना उकसाया की मैं भी उसके साथ negativity करने लगा.मैं तब अपने आप को ताकतवर मानता जब दूसरा व्यक्ति मेरी positive बातों में आ कर खुद भी positive बातें करने लग जाता.जब मैंने और ध्यान से सोचा, तो मुझे इसका उत्तर बहुत ही गहरा मिला :-
मैंने उस आदमी के साथ बदतमीजी और गाली गलौच करके Negative काम किया और अपने पैदाइशी Nature से छेड़ छाड़ की क्योकि इंसान का पैदाइशी Nature सिर्फ और सिर्फ Positive होता है. सोच कर देखिये जब हम बच्चे थे और हमें समझ नहीं थी तो हम हर किसी के साथ चाहे जानवर हो या इंसान, Positivity में ही रहते थे. पर हम जैसे जैसे बड़े होने लगे और "कहने को" समझदार होने लगे, हम दूसरों की बातें सुन सुन कर Positivity से Negativity की तरफ जाने लगे, और इस तरह Negative काम और Negative बात करके हम सिर्फ और सिर्फ अपनी Ego Satisfy कर रहे हैं और कुछ नहीं ……मित्रों अपने को पहचानने और ठीक करने के लिए हमें किसी दूसरे की सलाह की जरुरत नहीं हैं. हम "हर क्षण", "हर वक़्त" अपने को देख सकते हैं कि हम अपना Positive Increase कर रहे हैं या Negative. अगर हम किसी की बुराई कर रहे है या बुरा सोच रहे है तो हम अपने आस पास Negativity का Aura (प्रभामंडल) तैयार कर रहे हैं और अगर हम किसी के बारे में अच्छा सोच रहे है या किसी के लिए अच्छा कर रहे हैं तो हम अपने आसपास Positivity का Aura (प्रभामंडल) तैयार कर रहे है."हम तारीफ करने की आदत डालें" और "तारीफ करें हर उस व्यक्ति की" जो हमारे आस पास कुछ भी अच्छा काम (चाहे कितना ही छोटा क्योँ न हो) कर रहे हैं, अगर हम उस व्यक्ति का साथ नहीं दे सकते तो कम से कम उनके अच्छे काम के लिए तारीफ कर के उसको प्रोत्साहित तो कर ही सकते हैं और "टोकिए हर उस व्यक्ति को" जो हमारे आसपास कुछ गलत कर रहा है, हमारे चुप रहने से उसको शह मिलती है और हम अपना ही नुकसान कर रहे होते हैं.मित्रों हम इसलिए पीछे नहीं कि हमारा देश Knowledge,Talent से भरपूर नहीं है. हम पीछे हैं " सही/अच्छे व्यक्तियों के गलत चीजों पर न बोलने की वजह से."मित्रों ध्यान रहे हमारे समाज में गलत लोग सिर्फ और सिर्फ पूरी जनसँख्या के 1% भी नहीं हैं.मित्रों क्या हम फिर से इन 1% लोगों के गुलाम बनने की तैयारी में तो नहीं हैं ???इसलिए मित्रों अब सिर्फ चुप रहने का समय नहीं है. अब समय आ गया है की "भारत का युवा उठे" और भारत को बुलंदियों तक पहुंचाने में अपना अपना योगदान दे चाहे वो योगदान कितना ही छोटा क्योँ न हो.सोच है हमारी आखिर "भारत के निर्माणकर्ता" हैं हम.जय हिन्द
जय भारत
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