Shwet Prem Ras

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11/05/2026

प्रश्न- भाय कुभाय अनख आलस हूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
इस चौपाई पर विवेचना दे दीजिए🙏

उत्तर ;- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

भक्ति मन को करनी है , शरीर को नहीं। आनंद मन को पाना है , तन को नहीं ।
भगवादप्राप्ति मन को करनी है , शरीर को नहीं ।

इसलिए मन सबसे प्रमुख है । साधना के मार्ग पर बढ़ने से पहले मन को नियम संयम या दृढ़प्रतिज्ञ या एकाग्र करना पड़ेगा ।

यह मन कैसे एकाग्र होगा ?
इसके लिए भगवान शंकर ने भैरवी तंत्र विज्ञान में 108 विधियाँ बताई हैं।
क्योंकि जब तक मन नहीं एकाग्र होगा , हम श्रेय मार्ग पर नहीं चल सकते ।

जैसे योग का आरंभ करने के लिए कुछ criteria हैं , उससे साधन संपन्न होकर आओ तब योग की प्रक्रिया आरंभ होगी जैसे :-

योग करने से पहले यह छ: सिद्धान्त से पूर्ण होना आवश्यक है :

शम- इन्द्रियों और मन का निग्रह।

दम- इन्द्रियों और मन पर नियन्त्रण। निषेधात्मक कार्यों से स्वयं को संयमित करना - जैसे चोरी करने, झूंठ बोलने और निषेधात्मक विचार।

उपरति- वस्तुओं से ऊपर उठना।

तितिक्षा- अटल रहना, अनुशासित होना। सभी कठिनाइयों में धैर्य रखना और उन पर विजय प्राप्त करना।

श्रद्धा- पवित्र ग्रन्थों और गुरू के शब्दों पर विश्वास और भरोसा रखना।

समाधान- निश्चय करना और प्रयोजन रखना। चाहे कुछ भी हो जाये हमारी अपेक्षाएं उसी लक्ष्य की ओर निर्धारित होनी चाहिये। इस लक्ष्य से हमें अलग करने वाला कोई भी नहीं होना चाहिये।

उन्हीं विधियों में से एक विधि और सबसे प्रमुख विधि है यह है कि एकमात्र एक तत्व पर ध्यान देना जैसे भगवान का नाम ।

या किसी का भी नाम "मरा मरा" , कुत्ता कुत्ता , राम राम , ओम इत्यादि कुछ भी।

इसको निरंतर जपते जपते जब नाम में मन केंद्रीकृत होने लगेगा तब स्वयमेव मन एकाग्रता को धारण करना शुरू कर देगा ।
जब मन एकाग्र होगा तब उसी नाम का प्रभाव आपको दिखने लगेगा। फिर गुरु कृपा से पुनः उसी नाम की दिव्यता को अनुभूत करने के लिए उसी नाम के रूपः ध्यान और अर्थों में भावित होकर आप की सुरति लग जायेगी और अंत में उसी से भगवादप्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होगा ।

जब बाल्मीकि जी ने कहा कि मैं मरा मरा ही कह सकता हूँ , तो नारद जी ने कहा कि यही कहो , इसी पर ध्यान केंद्रित करो ।
जब उनका ध्यान केंद्रित हो गया , फिर नारद जी ने उन्हें राम तत्व निर्देशित किया और उसके अनुरूप साधना बताई ।
फिर उसी से उन्हें भगवादप्राप्ति हुई ।

ऐसे ही ध्रुव को बताया कि ओम नमः वासुदेवाय बस जपो । फिर जब उनका ध्यान केंद्रित हुआ , चित्त शुद्धि होने लगी , फिर वह आये और उन्हें वह निधि प्रदान की कि जिससे साधना कर वह भगवादप्राप्ति कर सके ।

लेकिन प्रेम और दृढ़ विश्वास नाम पर आवश्यक है । यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि नाम में नामी बैठा हुआ है।

नाम सप्रेम जपत अनयासा ।
भगत होहिं मुद मंगल बासा ।।

★ और जब जैसे जैसे साधना पुष्ट होती जाती है । गुरु को भौतिक रूप में नहीं आना पड़ता । बल्कि वह अंतःकरण में प्रकट होकर वह ज्ञान और भक्ति समय समय पर प्रदान करते हैं। हृदय में बुद्धि में प्रकट होकर वह संदेह दूर करते हैं।

भले चाहे आप दूसरे ब्रह्मांड में ही क्यों न हों।
क्योंकि गुरु शरीर नहीं , गुरु वह आंतरिक ज्ञान है ।

★★ पुनः प्र०- अर्थात यह है कि नाम महिमा निरंतर जप करते रहे?

उत्तर - वैसे जपते रहें तो इंद्रियों की चंचलता और मन पर विराम लगेगा कुछ हद तक ।

परंतु नाम के स्वभाव गुण रूप इत्यादि का चिंतन करते हुए और नामी को नाम में बिठाकर करने से नाम का प्रभाव अनंत गुना बढ़ जाएगा ।

इसीलिये ध्रुव को मात्र कुछ ही महीनों में भगवदप्राप्ति हो गयी थी क्योंकि नारद जी ने नाम देते हुए उसके मूल तत्व का बोधन कराया था ।

और कईयों को अनंत जन्म बीत जाते हैं।

बस यह सब विश्वास और नाम में नामी को बिठाने और अनुभव करने पर निर्भर करता है ।

अन्यथा तो अनंत मन्वंतर तक जिह्वा से नाम रटते रहो , कुछ नहीं होगा

★★ पुनः प्रश्न- भक्त ध्रुव की बात करें तो ये मानो की उनकी तपस्या शेष मात्र उतने समय की रह गई थी इसलिए तपस्या जैसे ही पूर्ण हुई उनको भगवत प्राप्ति हो गई
क्या यह जो मैने कहा वह कथन सत्य है क्या ?

उत्तर:- भगवदप्राप्ति तो एक second में भी हो सकती है। बस शरणागति और मन बुद्धि कितने प्रतिशत भगवान में समर्पित है यह उसी पर निर्भर करता है।

अजामिल था , जितेंद्रिय , वेद पाठी , बहुत बड़ा साधक , लेकिन कुछ समय के लिए किसी पुरुष के साथ वेश्यावृत्ति करते हुए उसने देख लिया , बस वहीं से उसका पतन शुरू हो गया । आंखों से मन मे प्रवेश किया और अंत में इतना बड़ा पापी हो गया कि उसकी मिसाल दी जाने लगी। जब वह गाफिल हुआ तो उसने अपने पुत्र को पुकारा लेकिन आये यमदूत और भगवान के पार्षद ।

यमदूत क्यों आये , उसके पाप कर्मों के कारण , पार्षद आये उसके पुण्य कर्मों के कारण ।

चूंकि भगवान अपने भक्तों का कभी पतन नहीं होने देते , इसलिए उन्होंने यह सब रचा जिसमें पार्षद और यम दूतों में शास्त्रार्थ चला ।

जब यह सब सुनकर अजामिल की आँखे खुली कि मेरी पूर्व साधना के कारण भगवान के पार्षदों ने मुझे नरक की यातनाओं से छुड़वा लिया ।

तब वह पुनः सब कुछ त्याग कर , बेटा स्त्री , धन समृद्धि त्याग कर तीर्थ स्थान चला गया और पुनः भक्ति की और दम लगाकर भक्ति की और मात्र एक वर्ष के अंदर उसने मन बुद्धि को निग्रह कर भगवादप्राप्ति कर ली ।

तो यह सब feelings पर निर्भर करता है कि कितने प्रतिशत आपके मन बुद्धि का समर्पण भगवान के प्रति हुआ है।

Prem Rasik Sh. Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
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NOTE:-

✨यदि आप अपने शहर , नगर , ग्राम आदि में भी समागम करवाना हो तो वह सम्पर्क कर सकते हैं । college , Institutions , Management संस्थान , सरकारी संस्थान , company आदि में Motivational सत्र या व्याख्यान के लिए भी आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।

✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

✨जून के साधना समागम 7 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

8950072203, 9305529349

#कर्म #मन #शिव #वेद #प्रयागराज #संगम #सोमवार

11/05/2026

प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज के श्रीमुख से निकले ये अमृतमय वचन आत्मा को प्रभु प्रेम की ओर ले जाते हैं। 🙏❤️

राधे राधे ✨

Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak

#कृष्ण #मन #भगवान #राधा

11/05/2026

प्रश्न: *योगः कर्मसु कौशलं* प्रभु जी इसकी व्याख्या समझा दीजिये।

उत्तर: *प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज* ---

योगः कर्मसु कौशलं ।

सबसे पहले समझिये कि योग क्या है ??

योग का अर्थ है -

संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्म परमात्मनो: !

जीवात्मा का परमात्मा से संयोग या युक्त हो जाना या जुड़ जाना ही योग है ।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ।

चित्त की वृत्तियों का संसार से निरोध होकर परमात्मा में युज्य हो जाना ही योग है ।

योग मतलब है जुड़ना ।

अब आते हैं कर्म पर ।

कर्म किसे कहते हैं ??

तत्कर्म हरितोषं यत् ।

जो भगवान के निमित्त हो और उनकी प्रसन्नता का कारण बने , वही कर्म है ।

देखिये ये मनुष्य जन्म का उद्देश्य क्या है ??

क्यों मिला है ??

ताकि हम ज्ञान प्राप्त कर अपना कल्याण कर सकें या भगवदप्राप्ति कर सकें ।

सो सब करम धरम जरि जाऊ ।

जो न राम पद पंकज भाऊ ।।

जिससे भगवान की प्राप्ति हो केवल वही कर्म है ।

बाकी सब विकर्म है ।

और आजकल मनुष्यों ने कलियुग के प्रभाव के कारण अज्ञानता

भगवान उद्धव से कहते हैं कि -

किं विद्धते किं आचष्टे किं अनुद्य विकल्पयेत ।

इति अस्या: हृदयं लोके नान्यो मद वेद कश्चन ।।

समस्त संसार में मेरे सिवा कोई भी नहीं जानता कि कर्म क्या है , कोई भी वैदिक ज्ञान के गुप्त उद्देश्य को नहीं जानता ।

इसलिए नहीं जानते कि वेद कर्मकांड के अनुष्ठान निर्देशों में वास्तव में क्या निर्देश दे रहे हैं ।

वह नहीं जानते कि वेदों में किस बात का वर्णन किया गया है ।

तो ????

तो यह कि -

मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम् ।

एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम् ।

मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति ॥

जो मेरे निमित्त हो वही ज्ञान , जो मेरे निमित्त हो वही कर्म , जो मेरे निमित्त हो वही योगब, वही धर्म , वही जप , वही तप , वही ज्ञान , वही भक्ति ।

सब कुछ मुझे ही इंगित करते हैं ।

लेकिन मूढ़मतियों ने पाशविक कर्म को , जैसे कमाना , खाना , बच्चा पैदा करना और नाती पोतो में मर जाने को कर्म कहने लगे ।

वह सब अत्यंत मूढ़ हैं , वह नहीं जानते कि वह कितने अज्ञानी और पशु हैं ।

गीता में यह जो श्लोक है - कर्मसु कौशलं वाला वह यह लिखा है -

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृत दुष्कृते ।

तस्माद योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलं ।।

इसका भी अर्थ लोग उल्टा पुल्टा अपने हिसाब से लगाते हैं ।

अपने मन मुताबिक ।

फिर गुरु और भगवान पर दोष देते हैं कि गुरु जी आपने ही तो यह सिद्धांत बताया था, उसे अपनी बुद्धि से अपने लाभ के अनुसार प्रयोग करेंगे और दोष देंगे कि आपके ही सिद्धांत गड़बड़ हैं ।

यह हाल है इस मनुष्य का ।

तो इसका अर्थ है कि -

हे मनुष्य या है अर्जुन अपनी बुद्धि जो विवेक से युक्त हो , उसके आधार पर युक्ति पूर्वक पुण्य और पाप से ऊपर उठ जाओ ।

और अपनी बुद्धि को मेरे में लगाते हुए सभी कर्म करो , तभी तुम्हारी कुशलता मानी जायेगी ।

मुझसे योग करके कर्म करो , इसे ही कुशलता कहते हैं ।

कुशल का अर्थ पहले भी मैंने बताया है कि आत्मकल्याण ।

अब इसी के ऊपर का श्लोक देखिये ।

लोग पढ़ते ही नहीं है और अपनी क्षुद्र बुद्धि से उसका दुरुपयोग करते हैं भगवान और सन्तों की वाणी का ।

यह श्लोक है -

योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्तवा धनंजय ।

सिध्यसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।।

सबसे उच्च योग वही है जब तुम सभी कर्म करते हुए मुझ में मन लगाते हुए कर्म करो बिना किसी आसक्ति के , अर्थात समान भाव से उसमें रहो । न उसके फल या कर्मों से राग हो न ही द्वेष हो ।

समान भाव रखो लेकिन मन मुझमें ।

तो यही है योगः कर्मसु कौशलं ।

मुझमें मन का योग करते हुए कर्म करो तभी कर्म की कुशलता कहलाएगी अन्यथा वह सभी कर्म अनर्थ है और वह पाप का ही कारण बनाएगी अर्थात वह सब कर्म पाप की श्रेणी में ही आयेंगे ।

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak



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Note

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10/05/2026

❤️ माँ केवल जन्म देने वाली नहीं, जीवन का सही मार्ग दिखाने वाली पहली गुरु होती हैं।🙏
इस Mother’s Day पर सभी माताओं को कोटि-कोटि प्रणाम। ❤️✨

Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak

10/05/2026

प्रश्न :- भक्ति और मुक्ति का आपस में क्या सम्बंध है?
पाप और पुण्य चालू हो सकता है क्या इस स्थिति में ?

उत्तर :- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज -

दोनों विपरीतार्थक हैं । दोनों में घोर शत्रुता है ।
ऐसा इसलिए क्योंकि मुक्ति का अर्थ होता है स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीर का नष्ट हो जाना और आत्मा का परमात्मा से मिल जाना ।
जैसे समुद्र में बूंद समा जाती है। अपना अस्तित्व खो देती है ।

लेकिन भक्ति में कारण शरीर दिव्य बन जाता है । वह जब चाहे अवतार लेकर आ सकता है । वह निरंतर भगवान के धामों का रस ,लीला का रस ले सकता है ।
वह सब कर सकता है ।

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★ प्रश्न - फिर पाप और पुण्य का भोग चालू हो सकता है क्या इस स्थिति में ?

उत्तर :-
एक बार जिसको भगवदप्राप्ति हो गयी ,उसको फिर कोई पाप पुण्य नहीं छू सकता । वह इन सबसे परे हो गया ।
एक बार दूध मक्खन बन गया , फिर उसका पुनः दूध में बदलना असम्भव है।
एक बार लोहा पारस से छूकर सोना बन गया ,फिर उसे जंग लगने का कोई डर नहीं।

एक बार कोई व्यक्ति पढ़कर आईएएस अधिकारी बन गया तो उसे दुबारा स्कूल जाने की आवश्यकता नहीं।
जो वह पाप या पुण्य करते दिखते हैं , वह मात्र लीला विलास है ।
नाटक करते हैं सब। लोक व्यवहार के लिए ।

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प्रश्न - क्या केवल भक्ति मार्ग से भगवद प्राप्ति संभव है।

उत्तर :-
केवल और केवल । अन्य कोई मार्ग नहीं ।
अन्य जितने भी मार्ग हैं तंत्र , कर्मकांड , पूजा व्रत उपवास यम नियम आसन प्राणायाम सब एक जगह जाकर रुक जाते हैं ,आगे उनकी कोई गति नहीं ।
बल्कि पतन हो जाता है ।

व्रत , उपवास, दान , गौ सेवा , गरीब की सेवा , इत्यादि सभी कर्म एकमात्र स्वर्ग तक ले जाकर छोड़ देंगे लेकिन फिर पुनः पुण्य का stock खत्म होते ही , फिर से वहीं पटक दिए जाते हैं ।
यह मात्र साधन है धर्म को ज्ञात करने के लिए ।
अध्यात्म नहीं है ।

अतः केवल और केवल भक्ति से ही काम बनेगा ।

भक्तिरेवम गरीयसी ।

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
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