Shwet Prem Ras
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10/07/2026
प्रश्न :- आज प्रथम बार शायद बिना सोए 22 मिनट आंखे बंद रूप ध्यान हुआ संसार में भी मन भागा लेकिन तुरंत पता लग गया तो वापिस ले आया ।
मेरा मन असीम चंचल है प्रभु जी मेरे लिए ये उपलब्धि के समान है एक जगह पर इतना बैठना😂😂
आपकी शुक्रिया प्रभु जी👏🏻👏🏻
उत्तर :- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आपका मन असीम चंचल है, यह मन की चंचलता क्यों आती है ??
क्योंकि मन कई कई बातें सोचता है ।
मन यह सब बातें क्यों सोचता है , एक पर क्यों नहीं टिकता है ??
बुद्धि के कारण ।
बुद्धि के तर्क वितर्क के कारण । यह सही है , यह ग़लत है , ऐसा अगर है तो ऐसा होना चाहिए और अगर ऐसा नहीं है तो ऐसा होना चाहिये ।
यह जो मस्तिष्क तर्क वितर्क में फँसा रहता है , एकमात्र यही कारण है मन के चंचल होने का ।
आपकी समस्या क्या है कि आप हद से अधिक सोचते हैं ।
जहाँ नहीं भी सोचना चाहिए , वहाँ भी आप सोचते हैं ।
जहाँ हृदय का काम होता है , उसमें भी आप बुद्धि का प्रयोग करते हैं ।
अब जैसे उसी रात्रि की बात है जब हमारी चर्चा हो रही थी रात्रि में ।
मैं देख रहा था कि आपको हर जगह सिद्धांत लगाना था ।
मेरे हिसाब से यह सिद्धांत के हिसाब से नहीं है ।
सिद्धांत यह कहता है कि ऐसा होना चाहिए और ऐसा नहीं होना चाहिए ।
अरे उस अवस्था में भी आपको सिद्धांत याद आ रहा था ??
जहाँ प्रेम की बात हो रही है , उसे आप सिद्धांत से अवलोकन कर रहे थे ।
हर जगह सिद्धांत नहीं लगाया जाता । भाव और प्रेम में सिद्धांत काम नहीं करता ।
जिस जगह आपको बलिहार जाना चाहिए था और डूब जाना चाहिए था , उसको आप सैद्धांतिक दृष्टि से ग़लत और सही कर रहे थे ।
देखो ! सिद्धांत बना है संसार का तत्त्व जानने के लिए ।
जीव क्या है , ब्रह्म क्या है , माया क्या है ।
संसार का वास्तविक स्वरूप क्या है ।
सिद्धांत बना है संसार की विरक्ति के लिए ।
बुद्धि या सिद्धांत केवल संसार के वास्तविक स्वरूप से परिचय कराने के लिए है न कि भाव में बाधक बनने के लिए ।
बुद्धि या सिद्धांत से संसार समझा और उससे वैराग्य हो गया बस ।
काम समाप्त सिद्धांत का ।
अब जब आप आध्यत्मिक जगत में प्रवेश करते हैं , तब काम है भाव या चित्त का ।
ऐसे समझिये कि Cycle से आप सड़क की दूरी पार कर सकते हैं , लेकिन जब समुद्र आ गया तो वहाँ cycle काम नहीं करेगी । Cycle का काम केवल आपको समुद्र या नदी तक पहुँचाने भर का था ।
अब अगर आप अपनी वही Cycle का प्रयोग नदी और समुद्र में करेंगे तो डूबेंगे ।
जैसे किसी को Cycle नहीं चलानी आती है तो वह दोनों तरफ supporter का प्रयोग करता है , लेकिन जब cycle सीख गया तो supporter या balancer निकाल दे , अब बस वह मनमर्जी चलाये ।
जब आप प्रेम में प्रवेश कर रहे हैं तो वहाँ सिद्धान्त नहीं लगाना आपको अन्यथा प्रेम रस से वंचित हो जायेंगे आप ।
प्रेम रस पीना है तो सिद्धांत को संसार या धर्म तक ही छोड़ कर आईये ।
हर जगह सिद्धांत नहीं घुसाया जाता ।
सिद्धांत आपको प्रेम रस या भक्ति या भगवान को प्राप्त करवाने या उन तक पहुँचाने के लिए दिया गया है न कि उसका प्रयोग भगवान के लिए करने के लिए दिया गया है ।
यह ऐसे है जैसे आपको बंदूक दिया गया शत्रुओं से रक्षा के लिए लेकिन आप उसका प्रयोग अपने ही देश के नागरिकों या घर में भी बच्चों और अपने स्वजन के लिए भी कर रहे हैं ।
अगर आप हर जगह सिद्धांत लगायेंगे तो फिर गए काम से ।
सिद्धांत अगर लगाया जाए या सिद्धान्त के हिसाब से चलें तो इतना समर्थशाली भगवान अपने अनंत ब्रह्मांडों के सबसे छोटे ब्रह्मांड के सबसे छोटे सौरमंडल के सबसे छोटी पृथ्वी के सबसे छोटे प्रान्त के सबसे छोटे जीव की पुकार सुन कर क्यों आएगा ??
वह विभूचित्त और हम अणुचित्त ।
सिद्धांत के अनुसार तो उसका और हमारा कहीं से भी कोई सम्बन्ध नहीं बन सकता ।
वह क्यों कर आएगा अवतार लेकर ??
सिद्धांत के अनुसार तो वह निस्पृह है । उसे सुख दुःख का आभास ही नहीं हो सकता ।
लेकिन फिर भी वह भक्तों को सुख देने के लिए , उनकी पीड़ा नष्ट करने के लिये एक अदने से पृथ्वी पर आता है ।
सिद्धांत से देखें तो एक ब्रह्म को क्या पड़ी है कि वह कौशल्या की गोद के लिए या यशुदा की गोद के लिए रोएं ।
क्या पड़ी है कि वह कौवे के पीछे रोटी के लिए भागें ।
क्या पड़ी है कि वह मल मूत्र कर उसी में लोट रहे हैं ।
क्या पड़ी है कि वह चंद्रमा खिलौना माँग रहे हैं !
क्या पड़ी है कि वह घर घर दही माखन की चोरी कर रहे हैं ।
क्या पड़ी है कि वह जिस घर में चोरी कर रहे हैं उसके दरवाजे पर मूत्र कर देते थे ।
क्या पड़ी है उन्हें कि इतने बड़े ब्रह्मांड नायक किसी की गाय और पशु चरायें ।
क्या पड़ी है कि मंथरा के कहने पर वह राज्य छोड़कर जाएं ।
क्या पड़ी है कि वह धनुष भंग करें ? वह सीधे जनक को अपना स्वरूप दिखाते और सीता free में लेकर जाते ।
क्या पड़ी है कि वल्कल वस्त्र पहने वह नङ्गे पैरों से 14 वर्ष तक वन वन भटकते रहे ।
क्या पड़ी है कि एक स्त्री को नहीं ढूंढ पा रहे हैं , बंदरों , भीलों की सहायता ले रहे हैं ।
क्या पड़ी है कि एक स्त्री के लिए पागलों की तरह रो रहे हैं ।
क्या पड़ी है कि लक्ष्मण को शक्ति लगने पर पागलों की तरह रो रहे हैं ।
क्या पड़ी है कि नागपाश से बँध कर मरने लगे ।
क्या पड़ी है कि नकली सीता के कटा सिर देखकर आत्महत्या करने के लिए उद्धत हो गए ।
यही सिद्धांत ब्रह्मा ने लगाया यानी इस ब्रह्मांड के सार्वभौमिक मन की सत्ता ने लगाया और पागल हो गया ब्रह्मा ।
यही सिद्धांत इंद्र ने लगाया , मुँह की खाया ।
यही सिद्धांत सती जी ने लगाया और जल कर भस्म होना पड़ा ।
यही सिद्धांत गरुड़ ने लगाया और भ्रष्ट हो गए ।
अगर सिद्धांत के अनुसार ही भगवान हर जगह कार्य करते तो कोई भी लीला नहीं होती ।
कोई कार्य न होता ।
कोई सृष्टि तक नहीं होती क्योंकि वह निस्पृह है , कामना रहित है , उसे किसी से मतलब नहीं ।
यही सिद्धांत अगर वह लगाते तो वृन्दावन और वृन्दावन की लीलायें कभी नहीं होती ।
इसी कारण वहाँ लक्ष्मी , इंद्र , ब्रह्मा किसी का प्रवेश तक क्या , उन लोगों ने देख भी नहीं पाए ।
ब्रज की तो लीला भी देख ली और सिद्धांत भी घुसेड़ दिया लेकिन कभी आपने सुना कि वृन्दावन में किसी ब्रह्मा की बुद्धि लगी ?
क्योंकि वहाँ उनका प्रवेश ही नहीं है ।
वहाँ का क्रियाकलाप देखते तो वह चाकू लेकर दौड़ते सबको मारने के लिए ।
केवल शिवात्म तत्त्व भगवान शंकर ने प्रवेश किया वहाँ ।
उद्धव जी घोर सिद्धांत लेकर आये , गोपियों ने सारा सिद्धांत उनके मुँह में डाल दिया और धूल धूसरित करके भेजा ।
प्रेम के संसार में प्रवेश करते ही सिद्धांत लागू नहीं होते । न यहाँ नियम लागू होते हैं , न मर्यादा न कोई सिद्धांत ।
अगर मैं सिद्धांत लगाने पर आऊँ तो कौन है यहाँ जो मेरे सामने बैठने की या बात करने तक की हिम्मत कर सकता है ?
कौन है यहाँ जो मेरे ज्ञान के आगे टिक सकता है , और यहीं नहीं मैं पूरे पृथ्वी की बात कर रहा हूँ ।
कौन है यहाँ जो मुझे छूने तक की हैसियत रख सकता है ?
अगर मैं सिद्धांत लागू करने पर उतर आऊं तो एक second भी ग्रुप में नहीं रह सकता ।
मैं क्यों किसी से बात करूं ??
सिद्धांत के हिसाब से तो मैं आपको जीवन में कभी मिलना ही नहीं चाहिये ।
मैं क्यों किसी को हँसाने की चेष्टा करूँ या इतना नीचे गिर जाऊँ कि जिसको जब चाहे कुछ भी बोल दे ।
मैं क्यों पूरे दिन ग्रुप में लगा रहूं , मुझे क्या ही फर्क पड़ेगा आप लोगों के दुखों से ?
अगर मैं दुःखों से प्रभावित हो रहा हूँ तो मुझ जैसा अज्ञानी कौन है भला ?
अब जब मैं दुःखों से प्रभावित नहीं हो रहा हूँ तो मुझे क्योंकर आप लोगों का फर्क पड़ेगा ??
अगर नहीं पड़ेगा तो मैं क्यों आऊँगा या सबके पीछे पडूँगा मैं कि भजन कर लो , फिर आप लोग भी न होते यहाँ ।
मैं क्यों किसी के घर जाऊँ मुफ्त में ?
मैं क्यों कहीं lecture दूँ क्योंकि मैं तो कामना विहीन हो चुका हूं ।
मुझे हर जगह भगवान नज़र आ रहे हैं तो मैं lecture भगवान को सुनाने के लिए क्यों आऊं ?
मैं क्यों किसी से बात तक करूँ ?
तो सिद्धांत अगर हम हर जगह लगायेंगे तो पत्थर हो जायेंगे ।
भावविहीन रहेंगे सदा सर्वदा ।
कोई वैज्ञानिक अगर रसगुल्ला खाते हुए भी सिद्धांत लगाएगा कि इसमें ये पड़ा है और इसका chemical composition यह है , अब यह जब जीभ से लगता है तो इसके molecules जीभ के papillae पर लगते हैं तो taste buds sugar के जीभ के आगे की ओर होते हैं तो मुझे जीभ के अंदर नहीं रखना है और इस chemical composition में sugar का जो formula है C12 H22 O11 होता है और यह molecule saliva के द्वारा break होता है तो ये carbon hydrogen और Oxygen कैसे sweetness evolve करते हैं और कैसे लगेगा ।
तो आप समझ सकते हैं कि वह क्या कभी रसगुल्ले का आनंद ले पायेगा ?
अरे भाई । कोई भी वैज्ञानिक भोजन के समय अपनी वैज्ञानिकता नहीं डालता उसमें अन्यथा तो वह नीरस हो जाएगा और मर जायेगा ।
जहाँ प्रेम या भाव में प्रवेश चाहिए बुद्धि को बाहर छोड़ना पड़ेगा ।
अन्यथा जब कोई पुरुष एक स्त्री के साथ रमण करता है अगर वह अपना पद , अपना शरीर ले आया तो उसे स्त्री से घृणा हो जाएगी , वह उसे छू तक नहीं सकता ।
इसलिए हे सिद्धांत वादी पुरुष , सिद्धांतों का प्रयोग केवल संसार से विरक्ति के लिए समझें , जब भाव में प्रवेश करें तो सिद्धांत विहीन या सिद्धान्त नग्न होकर प्रवेश करें ।
हर जगह सिद्धांत लगायेंगे तो नीरस , कोरे कोरे और रसहीन , भावहीन ही रह जायेंगे ।
इसलिए प्रेम सम्बन्धी जब बात करें तो उसमें डूब जायें न कि सिद्धांत से उसे नापने चलें ।
सिद्धांत से नापने चलेंगे तो भ्रष्ट होकर निकलेंगे क्योंकि वहाँ बुद्धि ले जाना dangerous है ।
श्री महाराज जी ने भी प्रेम रस सिद्धांत बनाया है तो वह प्रेम रस को प्राप्त करने हेतु जो principles है उनको बताया है ।
जब प्रेम रस तक पहुँचाकर सिद्धांत समाप्त हो जाता है ।
तब प्रेम रस मदिरा शुरू होती है ।
जहाँ गीता का सिद्धांत समाप्त होता है , वहाँ से भागवत की philosophy शुरू होती है और भागवत के रस का अवगाहन कौन कर सकता है ??
भागवत कहती है 1.1.3 में -
पिबत भागवतं रसमालयं, मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ।।
जो भाव से युक्त हो , रसिक हो , भावुकता से पूर्ण हो , हर जगह सिद्धांत घुसेड़ने वाला और बुद्धि से चलने वाला न हो , वही इस भगवदीय रस का पान कर सकता है ।
क्योंकि गीता तक बुद्धि का काम है और जब आप भागवत में प्रवेश करें तो केवल चित्त का काम है ।
अन्यथा परीक्षित की तरह बुद्धि लगाते रहेंगे और परीक्षित को डाँटना पड़ेगा और अंत में महारास का प्रकरण बंद कर देना पड़ेगा ।
इसलिए इस क्षेत्र में बिल्कुल बुद्धि को बाहर रख कर चलें और डूब जायें प्रेम और भाव में तब रस मिलेगा , तब हृदय द्रवित होगा , तब आँखों से प्रेमाश्रु निकलेंगे ।
जहाँ ज्ञान है , वहाँ प्रेम ना ।
जहाँ प्रेम वहाँ ज्ञान कभी ना ।।
Prem Rasik Sri Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
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Note
✨यदि आप अपने शहर , नगर , ग्राम आदि में भी समागम करवाना हो तो वह सम्पर्क कर सकते हैं । college , Institutions , Management संस्थान , सरकारी संस्थान , company आदि में Motivational सत्र या व्याख्यान के लिए भी आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।
✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।
✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।
8950072203, 9305529349
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**क्या भगवत् प्राप्त महापुरुषों के पास सचमुच दिव्य शक्तियाँ होती हैं?** ✨
इस Reel में जानिए महापुरुषों की दिव्य शक्तियों का वास्तविक रहस्य और शास्त्रों की दृष्टि से उनका महत्व।
🙏 पूरा देखें, अपनी राय कमेंट करें और इस ज्ञान को आगे साझा करें।
**राधे राधे!** ❤️
10/07/2026
प्रश्न:- प्रभु जी, कृपा और दया में क्या अंतर है? कृपया मार्गदर्शन कर दीजिए।
उत्तर:- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
कृपा का सबसे पहले हमें अर्थ समझना होगा ।
कृपा किसे कहते हैं ?
कृपा कहते हैं जिस तत्व के विषय में आपको जानकारी नहीं है , तब भी वह तत्व आपको बिना माँगे दिया जाय तो उसे कृपा कहते हैं ।
दया किसे कहते हैं ??
जिस भी तत्व का आपके पास अभाव हो और आपको पता है की यह तत्व हमें चाहिए और आप उसके लिए निवेदन करते हैं ,तो वह आपको दे दिया जाय तो उसे दया कहते हैं ।
बहुत भारी अंतर है दोनों में ।
दया में आपको पता होता है कि आपको किसका अभाव है और आप उसके लिए याचना करते हैं ।
तब किसी ने दया करके आपको वह वस्तु दे दी ।
लेकिन कृपा में आपको कुछ नहीं पता कि आपको क्या चाहिए ।
वह सन्त महापुरुष या भगवान को ही पता होता है कि आपको क्या चाहिए और वह बिना माँगे जो देते हैं वह कृपा है ।
जैसे हमें नहीं पता कि हमें क्या ज्ञान चाहिए , ज्ञान चाहिए भी या नहीं चाहिए , कितना चाहिए ,कैसे चाहिए , कब चाहिए । तो सन्त महापुरुष तब कृपा करते हैं ।
कृपा भगवदीय तत्व है ,इसको केवल सन्त महापुरुष गुरु और भगवान ही कर सकते हैं , अन्य कोई सांसारिक जीव नहीं ।
*जैसे मनुष्य देह प्रदान करना यह कृपा है ।*
*क्योंकि विभिन्न योनियों में अनंत पीड़ायें भोग रहा जीव यह नहीं जानता कि उसकी पीड़ाओं का अंत कैसे होगा । तो भगवान ही यह कृपा करते हैं और उसे मनुष्य देह बुद्धि प्रधान देह देते हैं जिसमें वह ज्ञान प्राप्त कर अपना कल्याण कर सकता है ।*
*दया सांसारिक जीव भी कर सकते हैं और संत महापुरुष भी करते हैं ।*
मुख्यतः कृपा चार प्रकार की होती है-
भगवान की कृपा
शास्त्र की कृपा
गुरु की कृपा
आत्म कृपा यानि स्वयं की कृपा ।
पहली कृपा भगवान की है , जब
कबहुँक करि करुणा नर देही ।
देत ईश बिनु परम सनेही ।।
मनुष्य देह प्राप्त करना पहली भगवद कृपा है ।
मनुष्य देह के अलावा ठीक ठीक बुद्धि चल रही हो ,पागल न हो व्यक्ति ।
साथ ही साथ ऐसे घर कुल में जन्म जहाँ आपको सहज रूप से शास्त्र अध्ययन , भगवदनुरागी माता पिता , शास्त्रों में रुचि इत्यादि प्राप्त हो ।
तो यह है भगवान की कृपा ।
दूसरा है शास्त्र कृपा ।
शास्त्रों द्वारा ज्ञान प्राप्त कर यह जान लेना कि हमें क्या करना है और इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए या शास्त्रों के गूढ़ अर्थों को समझने कर लिए , साधना करने के लिए हमें गुरु की आवश्यकता होगी ।
बहुत से लोग शास्त्र अध्ययन करते ही रहः जाते हैं और शास्त्र उन पर इतनी कृपा नहीं कर पाते कि वह उनके गूढ़ कथानक , कथाओं का मर्म समझ सकें या यही समझ सकें कि उनको समझने के लिए किसी गुरु की आवश्यकता है ।
तीसरा है गुरु कृपा ।
यह सबसे महत्वपूर्ण कृपा है । यह नहीं तो सभी कृपायें होने के बाद भी कुछ प्राप्त नहीं होगा ।
पहले तो कोई सही सही गुरु मिल जाये ।
इसके बाद उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो जाये ।
इसके बाद उसके वचनों पर पूर्ण विश्वास हो जाये ।
यह सब आवश्यक है ।
गुरु मिल जाना कृपा है ,गुरु द्वारा सही सही ज्ञान मन बुद्धि में प्रतिष्ठित कर देना यह गुरु कृपा है । सभी रहस्यों को सही सही शिष्य को समझा कर उसे साधना मार्ग पर प्रविष्ट करवाना यह गुरु कृपा है ।
लेकिन एक और कृपा होती है ,आत्म कृपा ।
स्वयं पर कृपा करना ।
वह क्या है ??
शास्त्र की बात मान लेना ।
किसी सन्त महापुरुष की वाणी पर दृढ़ विश्वास हो जाना ।
अपने गुरु पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास ।
और फिर गुरु द्वारा बताई गयी साधना को करना ।
यह सब आत्म कृपा है ।
जब यह सब होने लगेगा तब आएगा अलग स्तर ।
तब सहज कृपा भी होगी ।
अकारण कृपा भी होगी ।
अहैतुकी कृपा भी होगी ।
नित्य कृपा भी होगी ।
केवल कृपा भी होगी ।
Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak
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Note
✨यदि आप अपने शहर , नगर , ग्राम आदि में भी समागम करवाना हो तो वह सम्पर्क कर सकते हैं । college , Institutions , Management संस्थान , सरकारी संस्थान , company आदि में Motivational सत्र या व्याख्यान के लिए भी आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।
✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।
✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।
8950072203, 9305529349
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What Makes a True Devotee? | भगवान किन भक्तों से सबसे अधिक प्रेम करते हैं? ✨
09/07/2026
हर दिन पुनरावृत्ति (Revision) करने योग्य प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज का लेख ।
#आध्यात्मिक_मार्गदर्शन
✨भगवान कहते हैं भागवत में कि मेरी सबसे बड़ी कृपा जानते हो क्या है ??
हम संसारी लोग आश्चर्य से भर जायेंगे !
वह कहते हैं कि -
मम ऐश्वर्यं मदान्धो दंडपाणि न पश्यति ।
तं भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य च इच्छामि अनुग्रहं ।।
जब मुझे लगता है कि मेरा ऐश्वर्य पाकर मेरा भक्त अंधा न हो जाये या वह मुझसे विमुख न हो जाये , क्योंकि मेरे दिया हुआ *ऐश्वर्य दण्ड के समान है*, वह इस गधे को दिखता नहीं और उसे वह मेरी कृपा मानता है ( इस पर आज चिंतन और चर्चा करेंगे ) , तो मैं एक काम करता हूँ कि उसको सही मार्ग पर लाने के लिए , उसका लाभ करने के लिए मैं उस पर कृपा करता हूँ और उसका धन आदि सब छीन लेता हूँ ।
जैसे बच्चे को पढ़ाने के लिए कि वह top करे , माता पिता उसके खिलौने को छीन लेते हैं , TV बन्द कर देते हैं , मोबाइल गेम छीन लेते हैं , वैसे ही मैं करता हूँ ।
फिर भगवान ने दुबारा कहा -
यस्याहंमनुगृह्नामि हृष्ये तद्धनं शनै:।
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दु:खदु:खितम् ॥
मैं जिस पर विशेष कृपा करता हूँ , उसका धन धीरे धीरे छीन लेता हूँ ताकि उसके दुःख की समाप्ति हो जाये ।
Anil कपूर और माधुरी दीक्षित की बेटा movie देखी है ??
उसमें उसकी माँ Aruna ईरानी कैसे अनिल कपूर को सुख वैभव , पढ़ाई लिखाई छुड़वाकर अनपढ़ बना देती है और अपने पुत्र को जबरदस्ती कठिन परिश्रम करवाकर पढ़ा लिखाकर बाहर भेज देती है ।
ये माया ऐसे ही अरुणा ईरानी की तरह काम करती है ।
लेकिन एक दूसरी माया भी होती है माधुरी दीक्षित की तरह जो उसे बार बार आग़ाह करती है और उसका भ्रम तोड़ती है ।
बस इसी तरह हम लोग हैं ।
धन , वैभव , संपदा आदि को हम समझते हैं कि बहुत बड़ी कृपा है ।
अज्ञानी हैं हम लोग ।
अज्ञानता की uniiversity ने top करते हैं हम लोग ।
आज पूरा विश्व इसी कारण अज्ञानता के कारण ही भक्ति कर रहा है जिसके कारण अंत में नास्तिक बनता है ।
उसे नहीं पता कि जो भोग सामग्री तुम्हें मिल रही है , वह दो प्रकार से नष्ट कर रही है ।
1. तुम्हारे पूर्वजन्म के सभी पुण्य का फल देकर तुम्हें दरिद्र बना रही है । आज जितने करोड़पति अरबपति हैं , सबके पुण्य नष्ट हो रहे हैं उन्हें भोग देकर और फिर मरने के बाद अनंतकाल तक पीड़ादायक योनियों में भ्रमण ।
तावत् स मोदते स्वर्गे यावत् पुण्यं समाप्यते।
क्षीण-पुण्य: पतत्यर्वाग् अनिच्चन काल-चलित: ॥
फिर कभी किसी मनुष्य जन्म का कोई संस्कार जिसमें उसने कोई पुण्य किया है , वह आएगा revolve करते करते, जिसे हम बोलते हैं कि भगवान की कृपा , तो उसे मनुष्य जन्म मिलेगा ।
2. दूसरी हानि यह है कि उसके पुण्य कर्मों द्वारा जो नश्वर भोग मिला है उसे भोगने के लिए , उससे वह भोगों में ही फँसा रहता है और इधर एक जगह पुण्य समाप्त हो रहे हैं तो दूसरी जगह उन भोगों से नए पाप भी उत्पन्न हो रहे हैं ।
मतलब दोनों जगह से गए ।
इधर कुवाँ और उधर खाई ।
एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा ।
सिर मुड़ाते ही ओले पड़े ।
न ख़ुदा मिला न बिसाले सनम ।
लेकिन अगर यह बात मूढ़ मनुष्यों को बता दिया जाय तो वह भगवान को गाली देंगे ।
आज मन्दिर मस्जिद , केदारनाथ , बद्रीनाथ , महाकालेश्वर , बाँके बिहारी , वैष्णो देवी , ज्वाला देवी , खाटू श्याम , जौहरपीर बाबा , तेजा बाबा, जगन्नाथ , ये मनोकामना मन्दिर , वो मनोकामना मन्दिर आदि में इसीलिए इतनी बेतहाशा भीड़ है कि भगवान हमारे पुण्यों का जल्दी क्षरण करो ।
हम खत्म करना चाहते हैं सभी पुण्य , ताकि हम तुम्हारे पास न आ पाए ।
इसी कारण श्रीमहाराज जी कहते हैं कि भगवान से कभी कुछ मत माँगना ।
वह कुछ नहीं दे सकते । अगर कभी अपने विधान के against काम भी किया तो वह केवल तुम्हारे ही पुण्यों को भोग में या तुम्हारी मनोकामना में convert करके देंगे । तुम्हारे ही संचित कर्मों को विष्ठा में convert कर के देंगे । तुम्हें लगेगा कि wowwww ! भगवान ने कृपा की और हमारी सुन ली ।
उनके जैसा fraud कोई नहीं होगा । वह तुम्हे बिना बताए तुम्हारा ही पैसा निकालकर तुम्हें दे देंगे ।
तो हम जो भगवान से मांगते हैं तो केवल यही आशय होता है कि जो बचा खुचा है , वह सब विष्ठा में convert कर दो और उसको भोग कर हमें और पाप कर्म में प्रवृत्त कर दो , भोगों को देकर ताकि तुम्हारे पास आने के , परमानंद प्राप्त करने के सभी द्वार बंद हो जायें ।
यह ऐसे ही है जैसे कोई गहरे कूवें में गिरा हो , उसको निकालने के लिए उसे लकड़ी की लंबी सीढ़ी दी गयी तो उसने एक एक कर उस सीढ़ी के पाये तोड़कर जलाकर आग ताप लिया और चिल्ला रहा है कि मुझे इस कूएँ से निकालो ।
यही हमारा हाल है ।
हम इतने अज्ञानी हैं कि इस सिद्धांत या इस विज्ञान को समझ नहीं पाते कि माँगने में किसका loss है ।
इसीलिए कुंती ने वर माँगा था कि -
विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥
हे केशव ! मुझे दुःख ही दुःख दो ताकि इस दुःख से मुझे तुम्हारा स्मरण बना रहे और तुम ही मुझे प्राप्त हो ।
अब इसका विज्ञान समझ लीजिए कि विदुषी कुंती ने ऐसा क्यों कहा ?
दुःख भोगने से हमारे पाप कर्म नष्ट होते हैं ।
जैसे सुख भोगने से पुण्य कर्म नष्ट होते हैं , वैसे ही अपने पाप भोगने से हमारे संचित पाप नष्ट होते हैं ।
यह भगवान की कृपा होती है कि वह हमारे पाप कर्म को नष्ट करवा रहे हैं ।
और भगवान हमसे नाराज़ है कि हमें पुण्य कर्म भोगवा कर नष्ट कर रहे हैं ।
तो इसीलिए कुंती ने कहा कि सब दुःख ही दुःख देकर सब मेरे संचित पाप नष्ट करवा दो ताकि जब यह नष्ट हो जायें और महान पुण्य का पहाड़ बच जाए तो मुझे तुम्हारा दर्शन अर्थात तुम मिल जाओगे , परमानंद मिल जाएगा ।
जब नृसिंह भगवान ने प्रह्लाद से बार बार वर माँगने को कहा तो प्रह्लाद जी ने कहा -
यदि दास्यसि मे कामान्वरान्स्त्वं वर्दर्शभ।
कामानां हृदयसंरोहं भवस्तु वृद्धे वरम् ॥
अगर हे भगवान आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो यह वर दीजिये कि मैं आपसे कभी कुछ न माँगूँ । मेरे हृदय से आपसे माँगने की कामना समाप्त हो जाये ।
क्योंकि ये जितने भोग हैं यह मन इन्द्रिय और प्राण को नष्ट करके पापमय बनाते हैं ।
बस एक वर दीजिये कि मुझे आपकी अनपायनी भक्ति प्राप्त हो , निश्चल निष्काम भक्ति प्राप्त हो ।
क्योंकि सुख जीव को भोगों में उलझा देता है ।
तो बुद्धिंमान पुरुष वह होता है जो ऐश्वर्य मिलने पर भोगों की ओर नष्ट न कर इसे भगवद्मार्ग में लगा दे ।
उसका दोनों प्रकार से लाभ हो जाता है ।
जैसे किसी ने एक लाख रुपये दिया ।
एक ने उससे वेश्याएं भोगी , दारू आदि में लगा दिया और कंगाल हो गया ।
दूसरे व्यक्ति ने व्यापार में लगा दिया और उस एक लाख को करोड़ों में परिवर्तित कर दिया ।
बस यही हम लोगो को करना है ।
जितनी सुविधा मिल रही हैं , जितना ऐश्वर्य मिल रहा है उसको अपनी साधना बढाने में लगा दो, अन्य मूर्खों की तरह काम नहीं करना है ।
अन्यथा महती विनष्टि ।
बस इसी कारण आप लोगों को मैं कभी भगवान से कुछ माँगने को नहीं कहता ।
श्रीमहाराज जी का एक atomic वाक्य है कि *कृपालु की एक बात याद रखना भगवदप्राप्ति तक कि प्राण भी जा रहे हों तब भी तुम्हें भगवान से कुछ नहीं माँगना।*
क्योंकि पहली बात वह अपने विधान के खिलाफ नहीं जाएंगे । तो वह कभी कुछ देगे नहीं ।
दूसरी बात अगर दे भी दिया तो तुम्हारे ही पुण्य कर्मों को लेकर देंगे ।
तीसरी बात अगर तुम्हें मिल गया तो तुम भोगों में ही फँसे रहोगे और नए नए पाप बनाओगे ।
चौथी बात भोगों को भोगकर संतुष्टि नहीं मिलेगी बल्कि तृष्णा बढ़ती ही जाएगी । जो तुम्हें घोर दुःख देगी और नष्ट कर देगी ।
पांचवी बात कि चूँकि भगवान बिना प्रारब्ध के देंगे नहीं तो तुम नास्तिक बन जाओगे और भगवान से विश्वास उठा दोगे और रहा सहा अपने कल्याण के सारे मार्ग अपने ही हाथों से बन्द कर दोगे ।
तो इसी कारण हमें उनकी कृपा का realisation हानि लाभ सबमें करना है बल्कि हानि में अधिक करना है ।
अब मुझे बताईये पूरी पृथ्वी पर कितने मनुष्य होंगे जो इस सिद्धांत को accept करेंगे ₹??
तो ये जो भीड़ आप लोगों को भक्ति के नाम पर दिखती है न केवल अपने पुण्यों को क्षय करने वाली है ।
इन्हें भगवान , आनंद और भक्ति से कोई भी मतलब नहीं ।
कोई भी मतलब 0.0000001% भी नहीं है ।
तो इसलिए हम लोगों को विज्ञान समझकर चलना होगा ।
उसके पीछे की science समझकर चलना होगा , इसे ही तत्त्वज्ञान बोलते हैं ।
जब आप इसे समझ जायेंगे तब आप लोगों को समझ आयेगा कि america के , दुबई के और अन्य देशों के लोग किसी लक्ष्मी कुबेर विष्णु को नहीं पूजते , फिर भी इतने सुख सम्पन्न क्यों और भारत में प्रत्येक के घर लक्ष्मी जी बैठ कर हाथ से सोने के सिक्के निकालते हुए की फ़ोटो की पूजा करने से भी लोग झोपड़पट्टी में ही क्यों रहते हैं ।
Prem Rasik Sri Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
#आध्यात्मिक_दिग्दर्शक
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Note
✨यदि आप अपने शहर , नगर , ग्राम आदि में भी समागम करवाना हो तो वह सम्पर्क कर सकते हैं । college , Institutions , Management संस्थान , सरकारी संस्थान , company आदि में Motivational सत्र या व्याख्यान के लिए भी आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।
✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।
✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।
8950072203, 9305529349
#आध्यात्मिक_मार्गदर्शन #आध्यात्मिक_दिग्दर्शक #निष्काम_भक्ति #भगवान_की_कृपा #तत्त्वज्ञान #सनातन_धर्म #गुरुवार
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09/07/2026
09/07/2026
प्रश्न:- प्रभु जी, भगवदप्राप्ति क्या होती है ??
उत्तर : प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
1. भगवदप्राप्ति का अर्थ होता है स्वयं का ज्ञान होकर हम जिस अंश के हैं उसके सभी शक्तियों को प्राप्त कर लेना ।
जैसे भगवान के 6 भग होते हैं न ।
अनंत ज्ञान
अनंत वैराग्य
अनंत धर्म
अनंत यश
अनंत ऐश्वर्य
अनंत श्री ।
तो यह सभी मिल जाते हैं भगवदप्राप्ति के पश्चात ।
लेकिन इनसे भी ऊपर जो मिलता है वह है सत चित्त आनंद में से आनंद ।
इस आनंद प्राप्ति के पश्चात उपरोक्त भग की आवश्यकता ही नहीं होती ।
वह इनका उपयोग ही नहीं करता । हालांकि होती सब है ।
मोक्ष में आत्मा का परमात्मा में मिल जाना होता है , वह अपनी सत्ता समाप्त कर लेता है ।
लेकिन भगवदप्राप्ति में जीव अर्थात आत्मा को यह सभी भगवान के समस्त गुण प्राप्त हो जाते हैं ।
जिन्हें भगवद प्राप्ति कहते हैं ।
तो आत्मा जो भगवान का अंश है उसे ही सब मिलता है ।
जैसे किसी पिता ने अपने प्रिय पुत्र को अपनी समस्त property को दे दिया और वह उसका उपयोग कर सकता है ।
तो जीव को भगवदप्राप्ति होती है ।
भक्तों के भगवदप्राप्ति के पश्चात मन इन्द्रिय बुद्धि चित्त सब दिव्य हो जाते हैं ।
जिससे वह भगवान के अनंत लीलाओं और रस का नित्य निरन्तर पान करता रहता है ।
2. मृत्यु के बाद धाम जीवात्मा जाती है जिसके साथ कारण शरीर , मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार , पाँचों इन्द्रिय और उनके तन्मात्रा रहते हैं ।
लेकिन तब यह प्राकृत न होकर दिव्य अर्थात अलौकिक बनकर जाते हैं जिससे वह अलौकिक तत्वों और रसों का पान या ग्रहण कर सके ।
3. आत्मा और मन अलग होते हैं परमहँसीय अवस्था में और समाप्त होते हैं मोक्ष प्राप्ति के पश्चात ।
अन्यथा यह सदा सर्वदा साथ ही रहेंगे ।
जब किसी को मोक्ष मिलता है तो ज्ञानी या योगी सबसे सभी स्थूल आवरणों को एक एक करके समाप्त करतर हुए जाता है ।।
सबसे पहले सुषुम्ना से जिसे हम ज्योतिर्मय मार्ग कहते हैं , वह अग्निलोक पहुँचता है जिससे उसके सारे मल और संस्कार जल जाते हैं ।
फिर वह शिशुमार चक्र तक पहुँचता है और सूक्ष्म निर्मल शरीर से महर्लोक पहुंचता है ।
महर्लोक से ब्रह्मलोक या जिसे सत्य लोक कहते हैं ।
यहाँ तक माया जा सकती है और यहाँ तक पहुँचने पर योगी या ज्ञानी का पतन हो सकता है ।
फिर सत्यलोक में पहुँचने पर सूक्ष्म शरीर को पृथ्वी से मिला देता है ।
फिर 7 आवरणों का भेदन करता है ।
फिर पृथ्वी को जल में
जल रूप को अग्नि में
अग्निरूप को वायुरूप में
वायुरूप में आकाश रूप में मिला देता है जिसे ब्रह्म की अनंतता कहते हैं ।
इस प्रकार स्थूल आवरणों को पार करते समय उसकी इन्द्रियाँ भी अपने सूक्ष्म अधिष्ठान में लीन होती जाती हैं ।
जैसे
घ्राणेन्द्रिय गन्धतन्मात्रा में ।
रसना रसतन्मात्रा में ।
नेत्र रूप तन्मात्रा में ।
त्वचा स्पर्षतन्मात्रा में ।
श्रोत शब्दतन्मात्रा में ।
कर्मेन्द्रियाँ अपनी क्रियाशक्ति में ।
यहाँ से सूक्ष्म आवरणों को पार कर अहंकार में प्रवेश करता है ।।
फिर सूक्ष्म भूतों को तामस अहंकार में ।
इन्द्रियों को राजस अहंकार में ।
मन और इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवताओं को सात्विक अहंकार में ।
फिर अहंकार को महतत्त्व में ।
महतत्त्व को प्रकृति में
और प्रकृति को परमात्मा में ।
इसके बीच भी बहुत सी अवस्थाएं होती हैं लेकिन अभी आप लोग समझ नहीं पायेंगे ।
अभी इतना ही पचाईये । वैसे ज्यादा बता दिया ।
लेकिन इन सबके चक्कर में मत पड़िये ।
4. प्रत्येक जीव बिना मनस तत्त्व के हो ही नहीं सकता । उसकी सत्ता नहीं होगी ।
5. नहीं , बुद्धि और ज्ञान प्रधान जिसमें भी प्रज्ञा प्रधान योनि एकमात्र मनुष्य योनि ही है ।
हाँ जिनकी साधना ऊँची है और वह किसी कारण वश अन्य योनियों में पड़ गए हैं तो उनको भगवान या उनकी साधना के बल से यह पूर्व जन्म की स्मृति होती है कि किस कारण उन्हें यह देह मिला ।।
जैसे जड़ भरत।
इसी कारण आप लोगों ने कई बार सुना होगा कि कोई कोई पशु अपने शरीर का स्वयं त्याग करते हैं ।
और वह तभी त्याग करते हैं जब उन्हें लगता है कि अब यह शरीर नष्ट हो जाएगा या इसका प्रारब्ध हमने भोग लिया है ।
Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्श
Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak
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🎭 संसार में रहना है, तो Acting सीखनी पड़ेगी!
08/07/2026
प्रश्न :- राधे राधे प्रभु जी
प्रभु जी प्रेम में जो विरह होता है उसमें सभी संतों को आनंद आता है या कुछ को ?
मतलब ये सार्वभौमिक सत्य है या फिर जिन लोगों को दुखी रहने की आदत हो जाती है वो इसे आनंद का नाम देने लगते है
क्यों कि अलग होने में तकलीफ यदि हद से ज्यादा बढ़ जाए तो ही आदतन वो आनंद में बदल सकती है.....
उत्तर :- पहली बात यह अपने दिमाग़ में रख लीजिए कि भगवान के क्षेत्र में आनंद के अलावा कुछ भी नहीं है ।
उनका नाम ही है सत चित आनंद ।
और ये जो सत और चित है न ये आनंद के विशेषता है गुण है ।
मतलब भगवान आनंद ही है ।
वहाँ आनंद के अलावा कुछ भी नहीं है ।
आनंद एवधस्ताद एवाधस्तात्स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदं सर्वमित्यथ. ।
आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात ।
रसो वै सः ।
यो वै भूमा तत्सुखं ।
मतलब वहाँ आनंद के अलावा कुछ भी नहीं है ।
जैसे अमृत को कोई रोकर पिये या हँसकर पिये उसे अमर होना ही है ।
ठीक इसी तरह भगवान का क्षेत्र है जहाँ मिलन और विरह दोनों आनंद ही देंगे और चाहकर भी कुछ नहीं दे सकते ।
कंस , रावण , शिशुपाल , पूतना सबको भगवद्धाम मिला ।
तो इसलिये भगवान के क्षेत्र में दुःख का रंचमात्र भी नहीं है ।
और संसार में सुख में भी घोर दुःख छिपा है और दुःख तो दुःख है ही ।
यहाँ दुःख के अलावा कुछ भी नहीं है
जो आपको आज सुख दे रहा है , वह घोर दुःख लेकर आने वाला है , उसके लिए तैयार रहिये ।
बस यही अंतर है भगवदक्षेत्र और संसार में ।
दोनों में कोई comparision नहीं हो सकता ।
Prem Rasik Sri Shwetabh Ji Maharaj
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