Kusumbhatt
उत्तराखंडी लोकगायिका , काव्य और सहित्य लेखन , संगीतकार , Gazal & bhajn singer Also
मेरा गांव और उसमें पानी का धारा.....
बहुत चहल-पहल होती थी यहां पर कभी कुछ लोग कपड़े धो रहे होते थे तो कुछ नहा रहे होते थे और कुछ गप्पे मार रहे होते थे बड़ा सुकून का पल व्यतीत किया है इन धारो में। रुमक होने तक भी आने जाने वालों की चहलकदमी खत्म नहीं होती थी । हंसी और ठहाको की आवाज निरंतर बनी रहती थी आज बहुत सन्नाटा सा पसरा है...........
मां कहती थी कि यह पानी तीमला ( अंजीर) की जड़ से एक प्राकृतिक प्रक्रिया से फिल्टर होकर आता है।हर पेड़ की जड़ों से आने वाले पानी का स्वाद अलग होता है ।
हमारे पहाड़ों में.........
जिसमें बांज की जड़ों से आने वाले पानी का स्वाद व चीड़ की जड़ों से आने वाले पानी का स्वाद कुछ अलग ही होगा। अब नल घर-घर लग गए हैं लेकिन धारे का पानी और उस पानी में जमीन आसमान का अंतर है। व्यक्तिगत रूप से अब महसूस होता है कि इसमें बहुत सारे औषधीय गुण हैं क्योंकिजब भी इस पानी को लगातार सेवन करती हूं तो शरीर में कुछ सकारात्मक बदलाव महसूस होते हैं। ऐसे लगता है कि जैसे कोई जादुई बैध पानी में दवा घोलकर मेरी सारी पीड़ा को हर लेता है। पता नहीं क्या है यहां
आज भी बैठकर बहुत सुकून महसूस होता है।
आंखों के आगे अतीत के चलचित्र नाचने लगते हैं।
05/05/2026
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सोचा खाली समय में कुछ काम किया जाए
सौजन्य से-फिल्म" कंडाली"
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