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एक सुर

07/07/2025

उल्लिकल, कन्नूर के दिल से निकली एक करुणा भरी कहानी ने साबित कर दिया कि जब एकजुटता हो, तो एक छोटा सा गांव भी बड़ा फर्क ला सकता है।

एक छोटे से घर गौरैया की जान बचाने के लिए गांववालों ने जो किया, वो किसी मिसाल से कम नहीं था। तीन दिनों तक एक गौरैया एक बंद टेक्सटाइल दुकान की शीशे की दीवारों के पीछे फंसी रही, बाहर निकलने का रास्ता ढूंढते-ढूंढते थक गई। उसकी नन्ही पंखों की फड़फड़ाहट ने गांव की खामोशी को तोड़ा और लोगों के दिलों को छू लिया।
8 अप्रैल को मिस्त्री मनोज कुमार ने सबसे पहले गौरैया को देखा। वह पाइप के एक छोटे से छेद से दुकान में घुस गई थी, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल पाया।

स्थानीय लोग, फायर ब्रिगेड, गांव अधिकारी और यहां तक कि ज़िलाधिकारी ने भी कोशिश की, लेकिन दुकान एक संपत्ति विवाद के चलते कोर्ट के आदेश से सील थी, इसलिए कोई अंदर नहीं जा सका।
लेकिन गांववाले कहां हार मानने वाले थे। ऑटो चालकों से लेकर दुकानदारों तक, सभी ने मिलकर गौरैया को ज़िंदा रखने के लिए छोटे से छेद से उसे दाना-पानी पहुंचाया।

जैसे-जैसे समय बीत रहा था, गौरैया की हालत बिगड़ती जा रही थी। तब गांववालों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। और फिर हुआ कुछ अभूतपूर्व — प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज के.टी. निसार अहमद खुद वहां पहुंचे और दुकान खोलने की अनुमति दी।

आख़िरकार, 10 अप्रैल को, तीन दिन की अथक कोशिशों के बाद, गौरैया को आज़ादी मिली और वो खुले आसमान में पंख फैलाकर उड़ गई।

19/04/2025

हौसले की कहानी – करौली की कविता

राजस्थान के करौली जिले की शांत, दोपहर भरी एक नदी। धूप की किरणें जल पर झिलमिला रही थीं, और दूर-दूर तक बस एक सुकून-सा पसरा था।

नदी किनारे कविता कपड़े धो रही थी। सिंदूर से सजा माथा, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, चेहरे पर थकावट नहीं—बस दिनचर्या की एक लय। वहीं उसका पति, मदन, नदी में नहा रहा था। सब कुछ सामान्य था… पर अगले पल ने सब कुछ बदल दिया।

एक तेज़ चीख ने कविता के हाथों से कपड़ा गिरा दिया। मदन नदी में छटपटा रहा था—उसे एक मगरमच्छ ने दबोच लिया था। पानी लाल हो गया, और किनारे खड़े लोग भयभीत। कुछ कदम पीछे हटे, कुछ चुपचाप देखने लगे।

मगर कविता… वह रुकी नहीं।

उसने एक पल भी नहीं गंवाया। बिना सोचे नदी में कूद पड़ी। यह कोई नायिका नहीं थी किसी फिल्म की—यह थी करौली की एक आम, लेकिन असाधारण हिम्मत वाली महिला।

उसने पास पड़ा बाँस उठाया और मगरमच्छ पर वार करने लगी। उसका हर वार एक चीख थी—“मदन को छोड़ दे!” उसकी आँखों में आँसू नहीं, आग थी। शरीर थक रहा था, मगर हौसला अडिग था।

आखिरकार, मगरमच्छ ने हार मान ली। उसने मदन को छोड़ दिया और पानी में गायब हो गया।

कविता ने मदन को खींचते हुए किनारे तक पहुँचाया। लोग अब नज़रों में प्रशंसा और हैरानी लिए उनकी ओर भागे। मदन घायल था, लेकिन ज़िंदा था।

उस दिन, करौली ने देखा कि सिंदूर सिर्फ श्रृंगार नहीं, शक्ति का प्रतीक भी होता है। और कविता बन गई—हौसले की मिसाल।

ये कहानी सत्य घटना पर आधारित है जो वास्तव में करौली राजस्थान में घटित हुई थी और एक बहादुर सती सावित्री ने अपनी जान पर खेलकर अपने पति की जान बचाई थी
मैं दिल से सेल्यूट करता हूं उस बहन को जिसने इस कलयुगी जमाने में भी अपने धर्म फर्ज को ना भूलकर मां दूर्गा के रूप में एक मगरमच्छ से भिड़ गई 👏 👏

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