National RURAL Livelihoods Mission

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24/05/2023

ये एक सच्ची कहानी है अगर आप एक सच्चे भारतीय हैं तो जवाब जरूर दीजिए 🇮🇳🙏 ........ताइवान में करीब एक वर्ष बिताने पर एक भारतीय महानुभाव की कई लोगों से दोस्ती हो चुकी थी, परंतु फिर भी उन्हें लगा कि वहाँ के लोग उनसे कुछ दूरी बनाकर रखते हैं, वहाँ के किसी दोस्त ने कभी उन्हें अपने घर चाय के लिए तक नहीं बुलाया था
उन्हें यह बात बहुत अखर रही थी अतः आखिरकार उन्होंने एक करीबी दोस्त से पूछ ही लिया...?
थोड़ी टालमटोल करने के बाद उसने जो बताया, उसे सुनकर उस भारतीय महानुभाव के तो होश ही उड़ गए।
ताइवान वाले दोस्त ने पूछा, “200 वर्ष राज करने के लिए कितने ब्रिटिश भारत में रहे...?”
भारतीय महानुभाव ने कहा कि लगभग “10,000 रहे होंगे!”
तो फिर 32 करोड़ लोगों को यातनाएँ किसने दीं? वह आपके अपने ही तो लोग थे न...?
जनरल डायर ने जब "फायर" कहा था... तब 1300 निहत्थे लोगों पर गोलियाँ किसने दागी थीं? उस समय ब्रिटिश सेना तो वहाँ थी ही नहीं!
क्यों एक भी बंदूकधारी (सब के सब भारतीय) पीछे मुड़कर जनरल डायर को नहीं मार पाया...?
फिर उसने उन भारतीय महानुभाव से कहा, आप यह बताओ कि कितने मुगल भारत आए थे? उन्होंने कितने वर्ष तक भारत पर राज किया? और भारत को गुलाम बनाकर रखा! जोकि 'कुछ' पैसे के लालच में, अपनों पर ही अत्याचार करने लगे! अपनों के साथ ही दुराचार करने लगे…!!
तो मित्र, आपके अपने ही लोग, कुछ पैसे के लिए, अपने ही लोगों को सदियों से मार रहे हैं...? आपके इस स्वार्थी धोखेबाज, दगाबाज, मतलबपरस्त, 'दुश्मनों से यारी और अपने भाईयों से गद्दारी'😢
इस प्रकार के व्यवहार एवं इस प्रकार की मानसिकता के लिए, हम भारतीय लोगों से सख्त नफ़रत करते हैं!
इसीलिए हमारी यही कोशिश रहती है कि यथासंभव, हम भारतीयों से सरोकार नहीं रखते...? उसने बताया कि, जब ब्रिटिश हांगकांग में आए तब एक भी व्यक्ति उनकी सेना में भरती नहीं हुआ क्योंकि उन्हें अपने ही लोगों के विरुद्ध लड़ना गवारा नहीं था...?
यह भारतीयों का दोगला चरित्र है, कि अधिकाँश भारतीय हर वक्त, बिना सोचे समझे, पूरी तरह बिकने के लिए तैयार रहते हैं...? और आज भी भारत में यही चल रहा है।
विरोध हो या कोई और मुद्दा, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में और खुद के फायदों वाली गतिविधियों में भारत के लोग आज भी, राष्ट्र हित को हमेशा दोयम स्थान देते हैं, आप लोगों के लिए "मैं और मेरा परिवार" पहले रहता है "समाज और देश" जाए भाड़ में...?

24/05/2023

क्या भाव दिया माई बजार....
बाबू बीस रुपीया पाव...
बहुत ज्यादा दाम हुवा...
क्या करे बाबू....
जंगलमेसे लंबी राहपर...
सुबह जाके तोडकर...
लाना पडे है....
चलते चलते ही सब...
ताकद खत्म हो जाती है...
माई कुछ तो कम करो....
बाबू तु कितना देगा...
माई पगार हुवा नही अभि...
मंथ एंड है...
आप ही बोलो...
बाबू दे तुझे जो देना है वह....
माई 10 रुपए दुंगा...
मगर मुझे आधा किलो देना....
बच्चे मजेसे खायेंगे...
बाबू 10 रुपयेमे मै क्या करूंगी...
तेल है डेढ़ सौ रुपया लिटर...
गेहू है 30 रुपीया किलो....
तूवर दाल दो सौ...
तो चावल 60 रुपीया...
10 रुपिये मे वो बेपारी...
मुझे क्या क्या सामान देगा....
ऐसा कर मुझे कुछ न दे...
मेरे तरफसे तेरे बच्चोंको..
वैसेही ले जा भेट करके...
माई मुझे माफ कर...
मुझसे बडी गलती हुयी...
मेरा तो गुजारा हो जाएगा पगार से....
मगर तेरा गुजारा....
जब तु बजार बेचेगी...
बजार बेचकर पैसे कमायेगी...
तब बनिया तुझे सामान देगा...
वह सामान जब घर लायेगी...
तब तेरी बच्ची तेरी बहू खाना पकायेगी...
तब तेरे बच्चे पोते खाना खायेंगे...
तब तुझे रोटी दाल चावल मिलेगा....
तब तो तुझे सुकून कि नींद आयेगी....
माई तु बडी ग्रेट है...
आज तुने मुझे सिखाया कि...
जिंदगी मे व्यवहार कैसे करना...
किसके साथ कैसा बर्ताव करना...
आज से किसी भी माई के साथ ....
मै बजार भाव नाही करुंगा...
उससे कम से कम एक चीज...
जरूर खरिदुंगा.....
और मुझे जो किमत अच्छी लगे....
वो मै ऊस माई को दे दुंगा....
माई ये ले 40 रुपये.....
तेरेही भावसे....
और ऊपरके 60 रुपये...
रख लेना...
वापस मत देना...
तेरे पोते पोतीको ....
कुछ मीठा ले जाना....
बोलना तुम्हारे चाचू ने दिया है...
मेरा दुसरा लडका....
जो शहर मे रहता है....
माई....
तुझे मेरा ....
प्यारभरा नमन....
प्रणाम...माई....

आनंद दिवाकर चक्रनारायण
दि 19 मे 2021 04:45 pm

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Anand Diwakar Chakranarayan

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23/05/2023

जिस व्यक्ति ने अपनी आयु के 20 वे वर्ष में पेशवाई के सूत्र संभाले हों,||
40 वर्ष तक के कार्यकाल में 42 युद्ध लड़े हों और सभी जीते हों यानि जो सदा "अपराजेय" रहा हो,||
जिसके एक युद्ध को अमेरिका जैसा राष्ट्र अपने सैनिकों को पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ा रहा हो ..ऐसे 'परमवीर' को आप क्या कहेंगे ...?
आप उसे नाम नहीं दे पाएंगे ..क्योंकि आपका उससे परिचय ही नहीं,||
सन 18 अगस्त सन् 1700 में जन्मे उस महान पराक्रमी पेशवा का नाम है -
" बाजीराव पेशवा "||

"अगर मुझे पहुँचने में देर हो गई तो इतिहास लिखेगा कि एक राजपूत ने मदद मांगी और ब्राह्मण भोजन करता
रहा||"
ऐसा कहते हुए भोजन की थाली छोड़कर बाजीराव अपनी सेना के साथ राजा छत्रसाल की मदद को बिजली की गति से दौड़ पड़े,||

धरती के महानतम योद्धाओं में से एक , अद्वितीय , अपराजेय और अनुपम योद्धा थे बाजीराव बल्लाल,||

छत्रपति शिवाजी महाराज का हिन्दवी स्वराज का सपना जिसे पूरा कर दिखाया तो सिर्फ - बाजीराव बल्लाल भट्ट जी ने,||

अटक से कटक तक , कन्याकुमारी से सागरमाथा तक केसरिया लहराने का और हिंदू स्वराज लाने के सपने को पूरा किया पेशवा 'बाजीराव प्रथम' ने,||

इतिहास में शुमार अहम घटनाओं में एक यह भी है कि दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल पांच सौ घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके,||

देश के इतिहास में ये अब तक दो आक्रमण ही सबसे तेज माने गए हैं,||
एक अकबर का फतेहपुर से गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए नौ दिन के अंदर वापस गुजरात जाकर हमला करना और दूसरा बाजीराव का दिल्ली पर हमला,||

बाजीराव दिल्ली तक चढ़ आए थे,||
आज जहां तालकटोरा स्टेडियम है, वहां बाजीराव ने डेरा डाल दिया,||
उन्नीस-बीस साल के उस युवा ने मुगल ताकत को दिल्ली और उसके आसपास तक समेट दिया था,||

तीन दिन तक दिल्ली को बंधक बनाकर रखा,||
मुगल बादशाह की लाल किले से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं हुई,||
यहां तक कि 12वां मुगल बादशाह और औरंगजेब का नाती दिल्ली से बाहर भागने ही वाला था कि उसके लोगों ने बताया कि जान से मार दिए गए तो सल्तनत खत्म हो जाएगी,||
वह लाल किले के अंदर ही किसी अति गुप्त तहखाने में छिप गया,||
बाजीराव मुगलों को अपनी ताकत दिखाकर वापस लौट गए,||

हिंदुस्तान के इतिहास के बाजीराव बल्लाल अकेले ऐसे योद्धा थे जिन्होंने अपनी मात्र 40 वर्ष की आयु में 42 बड़े युद्ध लड़े और एक भी नहीं हारे,||
अपराजेय , अद्वितीय,||

बाजीराव बिजली की गति से तेज आक्रमण शैली की कला में निपुण थे जिसे देखकर दुश्मनों के हौसले पस्त हो जाते थे,||

बाजीराव हर हिंदू राजा के लिए आधी रात मदद करने को भी सदैव तैयार रहते थे,||
पूरे देश का बादशाह एक हिंदू हो, ये उनके जीवन का लक्ष्य था,||
आप लोग कभी वाराणसी जाएंगे तो उनके नाम का एक घाट पाएंगे, जो खुद बाजीराव ने सन 1735 में बनवाया था,||
दिल्ली के बिरला मंदिर में जाएंगे तो उनकी एक मूर्ति पाएंगे,||
कच्छ में जाएंगे तो उनका बनाया 'आइना महल' पाएंगे", पूना में 'मस्तानी महल' और 'शनिवार बाड़ा' पाएंगे,||

अगर बाजीराव बल्लाल , लू लगने के कारण कम उम्र में ना चल बसते , तो , ना तो अहमद शाह अब्दाली या नादिर शाह हावी हो पाते और ना ही अंग्रेज और पुर्तगालियों जैसी पश्चिमी ताकतें भारत पर राज कर पातीं,||

28अप्रैल सन् 1740 को उस पराक्रमी "अपराजेय" योद्धा ने मध्यप्रदेश में सनावद के पास रावेरखेड़ी में प्राणोत्सर्ग किया,||.. उन्हें शत शत नमन,||🙏

23/05/2023

11 सितम्बर 1857 का दिन था जब #बिठूर में एक पेड़ से बंधी तेरह वर्ष की लड़की को ब्रिटिश सेना ने जिंदा ही आग के हवाले किया, धूँ धूँ कर जलती वो लड़की उफ़ तक न बोली और जिंदा लाश की तरह जलती हुई राख में तब्दील हो गई|

ये लड़की थी #नाना_साहब_पेशवा की दत्तक पुत्री जिसका नाम था #मैना_कुमारी जिसे 160 वर्ष पूर्व आउटरम नामक ब्रिटिश अधिकारी ने जिंदा जला दिया था|

जिसने 1857 क्रांति के दौरान अपने पिता के साथ जाने से इसलिए मना कर दिया की कही उसकी सुरक्षा के चलते उसके पिता को देश सेवा में कोई समस्या न आये और बिठूर के महल में रहना उचित समझा|

#नाना_साहब पर ब्रिटिश सरकार इनाम घोषित कर चुकी थी और जैसे ही उन्हें पता चला #नाना_साहब महल से बाहर है ब्रिटिश सरकार ने महल घेर लिया, जहाँ उन्हें कुछ सैनिको के साथ बस #मैना_कुमारी ही मिली|

#मैना_कुमारी ब्रटिश सैनिको को देख कर महल के गुप्त स्थानों में जा छुपी, ये देख ब्रिटिश अफसर आउटरम ने महल को तोप से उड़ने का आदेश दिया और ऐसा कर वो वहां से चला गया पर अपने कुछ सिपाहियों को वही छोड़ गया|

रात को #मैना को जब लगा की सब लोग जा चुके है और वो बहार निकली तो दो सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और फिर आउटरम के सामने पेश किया आउटरम ने पहले #मैना को एक पेड़ से बंधा फिर #मैना से #नाना_साहब के बारे में और #क्रांति की गुप्त जानकारी जाननी चाही पर उस से मुँह नही खोला|

यहाँ तक की आउटरम ने #मैना_कुमारी को जिंदा जलाने की धमकी भी दी, पर उसने कहा की "वो एक क्रांतिकारी की बेटी है मृत्यु से नही डरती" ये देख आउटरम तिलमिला गया और उसने #मैना_कुमारी को जिंदा जलाने का आदेश दे दिया, इस पर भी #मैना_कुमारी बिना प्रतिरोध के आग में जल गई ताकि क्रांति की मशाल कभी न बुझे|

"बिना खड्ग बिना ढाल" वाली गैंग या धूर्त वामपंथी लेखक चाहे जो लिखें, पर हमारी स्वतंत्रता इन जैसे असँख्य #क्रांतिवीर और #वीरांगनाओं के बलिदानों का ही प्रतिफल है और इनकी गाथाएँ आगे की पीढ़ी तक पहुँचनी चाहिए|

इन्हें हर कृतज्ञ भारतीय का नमन पहुँचना चाहिये|
आज उसी वीरांगना के नाम पर *कानपुर नगर* से , पेशवाओं की नगरी *बिठूर* तक जाने वाले मार्ग को "मैनावती मार्ग" कहते हैं।

शत शत नमन है इस महान बाल वीरांगना को ।| 🙏🙏

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