The Message
तुममें कुछ लोग तो ऐसे ज़रूर ही रहने चाहिएँ जो नेकी की तरफ़ बुलाएँ भलाई का हुक्म दें और बुराइयों से रोकते रहें।[3:104]
23/06/2026
मतलब: इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने नवासों हज़रत हसन (रज़ि.) और हज़रत हुसैन (रज़ि.) से अपनी गहरी मुहब्बत और मोहब्बत भरे रिश्ते को बयान फ़रमाया है। जिस तरह इंसान ख़ुशबूदार फूलों को अपने दिल के क़रीब रखता है, उसी तरह हसन और हुसैन (रज़ि.) रसूलुल्लाह ﷺ के लिए बेहद अज़ीज़ और प्यारे थे। यह हदीस अहले-बैत से मुहब्बत करने और उनका सम्मान करने की अहमियत भी बताती है।
22/06/2026
और मैंने कहा: अपने रब से माफ़ी मांगो, बेशक वह बहुत ज़्यादा माफ़ करने वाला है। वह तुम पर आसमान से खूब बारिश बरसाएगा, तुम्हें माल और औलाद से नवाज़ेगा, तुम्हारे लिए बाग़ पैदा करेगा और नहरें जारी कर देगा। [📖 सूरह नूह 71:10–12]
आज की दुनिया में लोग सुकून, रिज़्क़ और मुश्किलों के हल के लिए हर तरफ़ भटकते हैं, लेकिन अल्लाह ने हमें एक बहुत बड़ा नुस्ख़ा बता दिया है: इस्तिग़फ़ार (अल्लाह से माफ़ी मांगना)।
इस्तिग़फ़ार सिर्फ़ ज़ुबान से "अस्तग़फ़िरुल्लाह" कह देने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने गुनाहों को मानते हुए अल्लाह की तरफ़ सच्चे दिल से लौटने का नाम है। यह उसकी रहमत की उम्मीद और उसकी माफ़ी की तलब है।
इस्तिग़फ़ार से दिलों को सुकून मिलता है, गुनाह माफ़ होते हैं, मुश्किलें आसान होती हैं और ऐसी बरकतें नाज़िल होती हैं जिनका इंसान अंदाज़ा भी नहीं कर सकता।
जब तुम परेशान हो, तो अस्तग़फ़िरुल्लाह कहो। जब तुम्हें अपने मुस्तक़बिल की फ़िक्र हो, तो अस्तग़फ़िरुल्लाह कहो। जब तुम माफ़ी, रिज़्क़, हिफ़ाज़त या दिल का सुकून चाहते हो, तो अपनी ज़ुबान को अल्लाह के ज़िक्र और इस्तिग़फ़ार से तर रखो।
अल्लाह की रहमत के सामने कोई गुनाह इतना बड़ा नहीं कि माफ़ न हो सके, और उसकी कुदरत के सामने कोई मुश्किल इतनी बड़ी नहीं कि हल न हो सके। तौबा का दरवाज़ा तब तक खुला है जब तक इंसान की सांसें चल रही हैं।
आज दुनिया से हल मांगने से पहले अपने रब से माफ़ी मांगो। जो चीज़ तुम्हें नामुमकिन लगती है, वह उस अल्लाह के लिए बहुत आसान है जो हर चीज़ पर क़ादिर है।
अस्तग़फ़िरुल्लाह वा अतूबु इलैह।
अल्लाह तआला हमें माफ़ फ़रमाए, हमारी तौबा क़ुबूल फ़रमाए और हमारी ज़िंदगी को अपनी रहमतों और बरकतों से भर दे। आमीन।
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22/06/2026
हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने कभी लोगों को अपनी इबादत करने के लिए नहीं बुलाया। उन्होंने हमेशा लोगों को एक अल्लाह की इबादत करने की दावत दी।
इस्लाम में हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के महान पैग़म्बरों में से एक हैं। उनका जन्म हज़रत मरियम (अलैहिस्सलाम) के ज़रिए एक चमत्कार के तौर पर हुआ। उन्होंने अल्लाह के हुक्म से कई मोजिज़े दिखाए, बीमारों को शिफ़ा दी और लोगों को उनके पैदा करने वाले रब की सच्ची इबादत की तरफ़ बुलाया। लेकिन पूरे क़ुरआन में हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह का बंदा और रसूल बताया गया है, न कि ऐसा कोई जिसने अपनी इबादत का हुक्म दिया हो।
अल्लाह फ़रमाता है: “बेशक अल्लाह ही मेरा रब है और तुम्हारा भी रब है, इसलिए उसी की इबादत करो। यही सीधा रास्ता है।” (क़ुरआन 3:51)
हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) का पैग़ाम वही था जो हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा और हज़रत मुहम्मद ﷺ लेकर आए थे: सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ।
इस्लाम सिखाता है कि तमाम पैग़म्बर एक ही मिशन लेकर आए थे लोगों को तौहीद यानी एक अल्लाह की ख़ालिस इबादत की तरफ़ बुलाना।
क़यामत के दिन अल्लाह हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) से पूछेगा कि क्या उन्होंने लोगों से कहा था कि वे उन्हें और उनकी माँ को अल्लाह के सिवा माबूद बना लें? तब हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) अपनी बेगुनाही बयान करेंगे और कहेंगे कि उन्होंने वही बात पहुंचाई जो अल्लाह ने उन्हें हुक्म दी थी: “अल्लाह की इबादत करो, जो मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है।” (क़ुरआन 5:116-117)
हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) से सच्ची मुहब्बत सिर्फ़ उनकी तारीफ़ करने का नाम नहीं है। बल्कि उनकी तालीमात पर चलना, उनकी नुबुव्वत का एहतराम करना और उसी ख़ालिक़ की इबादत करना है जिसकी इबादत वह खुद किया करते थे।
एक अल्लाह। एक पैग़ाम। एक हक़ीक़त।
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22/06/2026
इस हदीस में बच्चों के साथ भी सच्चाई और ईमानदारी बरतने की शिक्षा दी गई है। माता-पिता या बड़े लोग बच्चों से कोई वादा करें, तो उसे पूरा करें। बच्चों को झूठा दिलासा देना या वादा करके उसे पूरा न करना इस्लाम में पसंदीदा नहीं है, क्योंकि इससे बच्चे के दिल में अविश्वास पैदा होता है और उसके चरित्र पर भी असर पड़ता है।
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