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11/01/2026
नाना राव पार्क
नाना राव पार्क फूल बाग से पश्चिम में स्थित है। 1857 में इस पार्क में बीबीघर था। आज़ादी के बाद पार्क का नाम बदलकर नाना राव पार्क रख दिया गया।
फोटो गैलरी
11/01/2026
कानपुर मेमोरियल चर्च
कानपुर मेमोरियल चर्च
श्रेणी ऐतिहासिक
कानपुर मेमोरियल चर्च, जिसे लोकप्रिय रूप से ऑल सोल कैथेड्रल के रूप में जाना जाता है, एक प्रभावशाली स्थापत्य कला है, जिसका निर्माण 1875 में उत्तर प्रदेश के कानपुर में 1857 के विद्रोही सिपाही विद्रोह में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले ब्रिटिश सैनिकों के साहस और पराक्रम के लिए किया गया था। वाल्टर ग्रानविले, पूर्व बंगाल रेलवे के पूर्व वास्तुकार, चर्च के उत्तम लोम्बार्डी गोथिक वास्तुकला के लिए जिम्मेदार थे। इमारत बहु-रंग के रंग में सजी जीवंत लाल ईंटों से बनी है। चर्च के आंतरिक भाग में दिल दहलाने वाले स्मारक टेबल, एपिटैफ़ और स्मारक हैं जो उन सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने अपने देश के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। वे उस युवा की टूटी हुई आशाओं और सपनों को भी बयान करते हैं जिनका जीवन ठीक से समाप्त होने से पहले ही समाप्त हो गया था। कानपुर मेमोरियल चर्च कानपुर बैरक के दुर्भाग्यपूर्ण नरसंहार और देशभक्त नाना साहिब के विश्वासघात, “कसाईपोर के कसाई” का नाम देता है। चर्च के पूर्वी छोर में एक अलग बाड़े में मेमोरियल गार्डन है और मुख्य इमारत से अलग दिखने वाले गॉथिक स्क्रीन में नक्काशीदार और हड़ताली हैं। चर्च के केंद्र में एक देवदूत की एक सुंदर मूर्ति है, जिसे प्रख्यात बैरन कार्लो मरोखेती ने डिजाइन किया है। स्वतंत्रता के बाद की प्रतिमा और स्क्रीन को कानपुर के प्रसिद्ध नगर उद्यान से बीबीघर कुएं के पास स्थानांतरित किया गया है। प्राचीन शिलालेखों में से कुछ दिलचस्प शिलालेखों के साथ दिलचस्प हैं। सुंदर कानपुर मेमोरियल चर्च की यात्रा से भारत के संघर्ष की आजादी के रुग्ण सत्य के साथ दर्शकों का आमना-सामना होता है, एक ऐसी लड़ाई जिसके कारण दोनों पक्षों में भारी खून-खराबा हुआ।
11/01/2026
राधा कृष्ण मंदिर - जे. के. मंदिर
यह मंदिर जे. के. मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। बेहद खूबसूरती से बना यह मंदिर जे. के. ट्रस्ट द्वारा बनवाया गया था। प्राचीन और आधुनिक शैली से निर्मित यह मंदिर कानपुर आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहता है। यह मंदिर मूल रूप से श्रीराधाकृष्ण को समर्पित है। इसके अलावा श्री लक्ष्मीनारायण, श्री अर्धनारीश्वर, नर्मदेश्वर और श्री हनुमान को भी यह मंदिर समर्पित है।
10/01/2026
मगहर
श्रेणी ऐतिहासिक, धार्मिक
राष्ट्रीय राजमार्ग पर बस्ती से गोरखपुर के रास्ते में सन्तकबीर नगर में मगहर नगर पंचायत है जहां स्थित है कबीर का निर्वाण स्थल। जनश्रुति है कि मगहर में भीषण अकाल के समय मगहर पहुंच कर उन्होंने एक जगह धूनी रमाई। वहां से चमत्कारी ढंग से एक जलस्रोत निकल आया, जिसने धीरे-धीरे एक तालाब का रूप ले लिया। तालाब से हट कर उन्होंने आश्रम की स्थापना की। यहीं पर जब उन्होंने अपना शरीर छोड़ने का समय निकट आने पर संत कबीर ने अपने शिष्यों को इसकी पूर्वसूचना दी। शिष्यों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। हिन्दू चाहते थे कि कबीर का शव जलाया जाए और मुसलामान उसे दफनाने के लिए कटिबध्द थे। पर सारे विवाद के आश्चर्यजनक समाधान में शव के स्थान पर उन्हें कुछ फूल मिले । आधे फूल बांटकर उस हिस्से से हिन्दुओं ने आधे ज़मीन पर गुरु की समाधि बना दी और मुसलमानों ने अपने हिस्से के बाकी आधे फूलों से मक़बरा तथा आश्रम को समाधि स्थल बना दिया गया।
कबीर की मजार और समाधि मात्र सौ फिट की दूरी पर अगल-बगल में स्थित हैं। समाधि के भवन की दीवारों पर कबीर के पद उकेरे गए हैं। इस समाधि के पास एक मंदिर भी है जिसे कबीर के हिन्दू शिष्यों ने सन् 1520 ईस्वी में बनवाया था। मजार का निर्माण समय सन् 1518 ईस्वी का बताया जाता है। मगहर में हर साल तीन बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जिनमें 12-16 जनवरी तक मगहर महोत्सव और कबीर मेला, माघ शुक्ल एकादशी को तीन दिवसीय कबीर निर्वाण दिवस समारोह और कबीर जयंती समारोह के अंतर्गत चलाए जाने वाले अनेक कार्यक्रम शामिल हैं। मगहर महोत्सव और कबीर मेला में संगोष्ठी, परिचर्चाएं तथा चित्र एवं पुस्तक प्रदर्शनी के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं । कबीर जयंती समारोह में अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से संत कबीर के संदेशों का प्रचार-प्रसार किया जाता है।
10/01/2026
शहीद स्मारक-चौरीचौरा
श्रेणी ऐतिहासिक
चौरी-चौरा का शहीद स्मारक
चौरी चौरा, उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के पास का एक कस्बा था (वर्तमान में तहसील है) जहाँ 4 फ़रवरी 1922 को भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार की एक पुलिस चौकी को आग लगा दी थी जिससे उसमें छुपे हुए 22 पुलिस कर्मचारी जिन्दा जल के मर गए थे। इस घटना को चौरीचौरा काण्ड के नाम से जाना जाता है। इसके परिणामस्वरूप गांधीजी ने कहा था कि हिंसा होने के कारण असहयोग आन्दोलन उपयुक्त नहीं रह गया है और उसे वापस ले लिया था। चौरी-चौरा कांड के अभियुक्तों का मुक़दमा पंडित मदन मोहन मालवीय ने लड़ा और उन्हें बचा ले जाना उनकी एक बड़ी सफलता थी।
10/01/2026
तरकुलहा देवी मंदिर
श्रेणी ऐतिहासिक, धार्मिक
यह मंदिर अपनी दो विशेषताओ के कारण काफी प्रसिद्ध हैं।
इस इलाके में जंगल हुआ करता था जहां जंगल में डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह रहा करते थे। नदी के तट पर तरकुल (ताड़) के पेड़ के नीचे पिंडियां स्थापित कर वह देवी की उपासना किया करते थे। तरकुलहा देवी बाबू बंधू सिंह कि इष्ट देवी थी। बंधू सिंह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, इसलिए जब भी कोई अंग्रेज उस जंगल से गुजरता, बंधू सिंह उसको मार कर उसका सर काटकर देवी मां के चरणों में समर्पित कर देते ।
अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जहां उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी, 12 अगस्त 1857 को गोरखपुर में अली नगर चौराहा पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने उन्हें 7 बार फांसी पर चढ़ाने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हुए। इसके बाद बंधू सिंह ने स्वयं देवी माँ का ध्यान करते हुए मन्नत मांगी कि माँ उन्हें जाने दें। कहते हैं कि बंधू सींह की प्रार्थना देवी ने सुन ली और सातवीं बार में अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने में सफल हो गए। अमर शहीद बंधू सिंह को सम्मानित करने के लिए यहाँ एक स्मारक भी बना हैं।
यह देश का इकलौता मंदिर है जहाँ प्रसाद के रूप में मटन दिया जाता हैं। बंधू सिंह ने अंग्रेजो के सिर चढ़ा के जो बली कि परम्परा शुरू करी थी वो आज भी यहाँ चालु हैं। अब यहाँ पर बकरे कि बलि चढ़ाई जाती है उसके बाद बकरे के मांस को मिट्टी के बरतनों में पका कर प्रसाद के रूप में बाटा जाता हैं साथ में बाटी भी दी जाती हैं।
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