Azhar Sabri
Educating minds by profession, but my heart lives between the lines. Proud author of 3 books. Living life one chapter at a time.
अश्क पीता हूँ मगर हँस के मिला करता हूँ।
मैं चराग़ों की तरह शब में जला करता हूँ।
ख़ाक में मिल के भी ख़शबू नहीं खोई मैंने,
मैं वो पत्ता हूँ जो शाख़ों को हरा करता हूँ।
तुम जो आते हो तो आ जाती है साँसे वापस,
वरना मैं यूँ तो हर इक रोज़ मरा करता हूँ।
लोग सच बोलने से डरते हैं जिस बस्ती में,
मैं वहाँ सच का सदा पहरा दिया करता हूँ।
तीर जितने भी चलाए हैं ज़माने ने यहाँ,
मैं तो हर ज़ख़्म पे इक फूल बना करता हूँ।
लोग महफ़िल में चमकते हैं जो जुगनू कि तरह,
मैं अंधेरों की हिफ़ाज़त में जला करता हूँ।
वो समझते हैं कि मैं टूट के बिखरूँगा कभी,
उनकी आँखों में मैं तिनके सा रहा करता हूँ।
टूट जाता हूँ मगर हार नहीं मानता मैं,
अपनी ज़िद पर मैं हवाओं से लड़ा करता हूँ।
~ Azhar Sabri ~
झुकना न सीखिए कभी दरबार देखकर।
क़द अपना नापिए ज़रा दीवार देखकर।
महँगे लिबास देखकर इज़्ज़त न नापिए,
इंसां की क़द्र कीजिए अफ़कार देखकर।
आँखों में झाँकिए कि वहाँ सच दिखाई दे,
धोखा न खाइए कभी गुफ़्तार देखकर।
ज़ाहिर की इस चमक पे भरोसा न कीजिए,
ख़ालिस है कौन, जानिए अंगार देखकर।
हर शख़्स एक जैसा नज़र आएगा तुम्हें,
पहचान कीजिए उसे किरदार देखकर।
हर मोड़ पर मिलेगा तुम्हें आईनों का शोर,
खुद को भी देखना कभी संसार देखकर।
काँटों के डर से छोड़ न देना सफ़र कभी,
गुलशन की चाह रखिए भी गुलज़ार देखकर।
मंज़िल क़रीब आए तो हिम्मत न हारिए,
रस्ता बदल न दीजिए दुश्वार देखकर।
तूफ़ान आ भी जाए तो कश्ती न छोड़िए,
साहिल की ख़ैर माँगिए पतवार देखकर।
दो दिन की ये बहार है ढल जाएगी 'अज़हर',
सौदा न कीजिए कभी रुख़सार देखकर।
~ Azhar Sabri ~
वो परिंदा है जो साए में ठहर जाएगा।
तू अगर हाथ बढ़ाएगा तो डर जाएगा।
राह में ख़ुद को बदलने का हुनर रख ऐ दोस्त,
एक ही रंग रहा तो तू बिखर जाएगा।
बंद दरवाज़ों में रस्ता भी निकल आएगा,
तू अगर अपनी हदों से भी गुज़र जाएगा।
अपनी तहरीर को ख़ुद रंग दिया कर पहले,
फिर तिरे लफ़्ज़ का अंदाज़ निखर जाएगा।
कोई मौसम सदा दुनिया में रहा है कब तक,
रात के साथ ही हर दर्द उतर जाएगा।
अपने कल की कोई तस्वीर बचा रख दिल में,
वक़्त बदलेगा तो हर ख़्वाब सँवर जाएगा।
ख़ुद को मंज़िल की तमन्ना में जलाए रख तू,
ये दिया वक़्त की आँधी से उभर जाएगा।
जिस को सीने में दुआ की तरह रक्खा मैंने,
दिल से निकलेगा तो फिर और किधर जाएगा।
~ Azhar Sabri ~
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