Arya Samaj Indore
In Indore, the first Arya Samaj was established in Jan 1888 at 345, MG Road, Malharganj Hence arya Samaj malharganj indore is the first arya Samaj of the town.
☀ आईये वेदों की ओर लौट चलें ☀
🔶 जानिए वेद की आज्ञाओं के उलंघन का कितना भयंकर परिणाम हो सकता है ? भारत की दुर्गति के पीछे वेद की आज्ञाओं का उलंघन ही था ।
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🔶 पहली आज्ञा :
🔸 अक्षैर्मा दिव्य: (ऋ 10/34/13)
🔹 अर्थात् "जुआ मत खेलो ।" इस आज्ञा का उलंघन हुआ । इस आज्ञा का उलंघन धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्टर ने किया ।
🔷 परिणाम : एक स्त्री का भरी सभा में अपमान । महाभारत जैसा भयंकर युद्ध जिसमें लाखों, करोड़ों योद्धा और हज़ारों विद्वान मारे गए । आर्यवर्त पतन की ओर अग्रसर हुआ ।
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🔶 दूसरी आज्ञा :
🔸 मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः (ऋ 8/48/14)
🔹 अर्थात् "आलस्य, प्रमाद और बकवास हम पर शासन न करें ।" लेकिन इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । महाभारत के कुछ समय बाद भारत के राजा आलस्य प्रमाद में डूब गये ।
🔷 परिणाम : विदेशियों के आक्रमण ।
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🔶 तीसरी आज्ञा :
🔸 सं गच्छध्वं सं वद्ध्वम (ऋ 10/191/2)
🔹 अर्थात् "मिलकर चलो और मिलकर बोलो ।" वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । जब विदेशियों के आक्रमण हुए तो देश के राजा मिलकर नहीं चले । बल्कि कुछ ने आक्रमणकारियों का ही सहयोग किया ।
🔷 परिणाम : लाखों लोगों का कत्ल, लाखों स्त्रियों के साथ दुराचार, अपार धन-धान्य की लूटपाट, गुलामी ।
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🔶 चौथी आज्ञा :
🔸 कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहितः (अथर्व 7/50/8)
🔹 अर्थात् "मेरे दाएं हाथ में कर्म है और बाएं हाथ में विजय ।" वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ । लोगों ने कर्म को छोड़कर ग्रहों फलित ज्योतिष आदि पर आश्रय पाया ।
🔷 परिणाम : कर्महीनता, भाग्य के भरोसे रहकर आक्रान्ताओं को मुँहतोड़ जवाब न देना । धन-धान्य का अपव्यय, मनोबल की कमी और मानसिक दरिद्रता ।
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🔶 पाँचवीं आज्ञा :
🔸 उतिष्ठत सं नह्यध्वमुदारा: केतुभिः सह ।
सर्पा इतरजना रक्षांस्य मित्राननु धावत ।।
(अथर्व 11/10/1)
🔹 अर्थात् "हे वीर योद्धाओ ! आप अपने झण्डे को लेकर उठ खड़े हो और कमर कसकर तैयार हो जाओ । हे सर्प के समान क्रुद्ध रक्षाकारी विशिष्ट पुरुषो ! अपने शत्रुओं पर धावा बोल दो ।" वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । जब लोगों के बीच बुद्ध ओर जैन मत के मिथ्या अहिंसावाद का प्रचार हुआ । लोग आक्रमणकारियों को मुँहतोड़ जवाब देने की बजाय मिथ्या अहिंसावाद को मुख्य मानने लगे ।
🔷 परिणाम : अशोक जैसे महान योद्धा का युद्ध न लड़ना । विदेशियों के द्वारा इसका फायदा उठाकर भारत पर आक्रमण ।
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🔶 छठी आज्ञा :
🔸 मिथो विघ्राना उप यन्तु मृत्युम (अथर्व 6/32/3)
🔹 अर्थात् "परस्पर लड़ने वाले मृत्यु का ग्रास बनते हैं और नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं ।" वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ ।
🔷 परिणाम : भारत के योद्धा आपस में ही लड़-लड़कर मर गये और विदेशियों ने इसका फायदा उठाया ।
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🔶 सातवीं आज्ञा :
🔸 न तस्य प्रतिमा अस्ति
🔹 अर्थात् "ईश्वर का कोई प्रतिमान नहीं है ।" लेकिन इस आज्ञा का उलंघन हुआ और परिणाम आपके समक्ष है ।
🔷 परिणाम : ईश्वर के सत्य स्वरुप को छोड़कर भिन्न स्वरुप की उपासना और सत्य धर्म को भूला देना ।
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☀ तो आइये, फिर से वेदों की ओर लौट चलें . . .
09/10/2015
हर्ष का विषय है की, आर्य समाज महर्षि दयानंदगंज, गंजी कंपाउंड, इंदौर में शनिवार, दिनांक १७ अक्टूबर २०१५ को सुश्री प्रियंका आर्य - आर्य कन्या गुरुकुल भुसावर, भरतपुर राजस्थान, का व्याख्यान "वैदिक संस्कृति रक्षा में महिलाओं का योगदान" विषय पर होगा।
अतः आप सभी सपरिवार, ईष्टमित्रों सहित पधारकर सत्संग और व्याख्यान का लाभ लेवें।
समय: सायं ७:०० से सायं ८:३० तक
स्थान: आर्य समाज, महर्षि दयानंदगंज, गंजी कंपाउंड, इंदौर
निवेदक:
श्री दिनेश जी गुप्ता, संयोजक तदर्थ समिति
आर्य समाज मंदिर, महर्षि दयानंदगंज, इंदौर
चलभाष: 99262 03956
04/10/2015
सागरपार भारतीय क्रान्तिगुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा
भारत के स्वाधीनता संग्राम में जिन महापुरुषों ने विदेश में रहकर क्रान्ति की मशाल जलाये रखी, उनमें श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रणी है। चार अक्तूबर, 1857 को कच्छ (गुजरात) के मांडवी नगर में जन्मे श्यामजी पढ़ने में बहुत तेज थे।
इनके पिता श्रीकृष्ण वर्मा की आर्थिक स्थिति अच्छी न थी; पर मुम्बई के सेठ मथुरादास ने इन्हें छात्रवृत्ति देकर विल्सन हाईस्कूल में भर्ती करा दिया। वहाँ वे नियमित अध्ययन के साथ पंडित विश्वनाथ शास्त्री की वेदशाला में संस्कृत का अध्ययन भी करने लगे।
मुम्बई में आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती आये, उनके विचारों से प्रभावित होकर श्यामजी ने संस्कृत भाषा एवं वैदिक विचारों के प्रचार का संकल्प लिया , महर्षि दयानन्द से ही प्रेरणा प्राप्त कर वह इंग्लैण्ड गये एवं वहां पर स्वतन्त्रता संग्राम के पावन यज्ञ को प्रज्वलित किया । वहाँ श्यामजी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत के अध्यापक नियुक्त हुए; पर स्वतन्त्र रूप से उन्होंने वेदों का प्रचार भी जारी रखा।
कुछ समय बाद वे भारत लौट आये। उन्होंने मुम्बई में वकालत की तथा रतलाम, उदयपुर व जूनागढ़ राज्यों में काम किया। पुन: इंग्लैण्ड जाकर उन्होंने भारतीय छात्रों के लिए एक मकान खरीदकर उसका नाम इंडिया हाउस (भारत भवन) रखा। शीघ्र ही यह भवन क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बन गया। उन्होंने राणा प्रताप और शिवाजी के नाम पर छात्रवृत्तियाँ प्रारम्भ कीं।
1857 के स्वातंत्र्य समर का अर्धशताब्दी उत्सव ‘भारत भवन’ में धूमधाम से मनाया गया। उन्होंने ‘इंडियन सोशियोलोजिस्ट’ नामक समाचार पत्र भी निकाला। उसके पहले अंक में उन्होंने लिखा – मनुष्य की स्वतन्त्रता सबसे बड़ी बात है, बाकी सब बाद में। उनके विचारों से प्रभावित होकर वीर सावरकर, सरदार सिंह राणा और मादाम भीकाजी कामा उनके साथ सक्रिय हो गये। लाला लाजपत राय, विपिनचन्द्र पाल आदि भी वहाँ आने लगे।
विजयादशमी पर्व पर ‘भारत भवन’ मंे वीर सावरकर और गांधी जी दोनों ही उपस्थित हुए। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के अपराधी माइकेल ओ डायर का वध करने वाले ऊधमसिंह के प्रेरणास्रोत श्यामजी ही थे। अब वे शासन की निगाहों में आ गये, अतः वे पेरिस चले गये। वहाँ उन्होंने ‘तलवार’ नामक अखबार निकाला तथा छात्रों के लिए ‘धींगरा छात्रवृत्ति’ प्रारम्भ की।
भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए शस्त्रों का प्रबन्ध मुख्यतः वे ही करते थे। भारत में होने वाले बमकांडों के तार उनसे ही जुड़े थे। अतः पेरिस की पुलिस भी उनके पीछे पड़ गयी। उनके अनेक साथी पकड़े गये। उन पर भी ब्रिटेन में राजद्रोह का मुकदमा चलाया जाने लगा। अतः वे जेनेवा चले गये। 30 मार्च, 1930 को श्यामजी ने और 22 अगस्त, 1933 को उनकी धर्मपत्नी भानुमति ने मातृभूमि से बहुत दूर जेनेवा में ही अन्तिम साँस ली।
श्यामजी की इच्छा थी कि स्वतन्त्र होने के बाद ही उनकी अस्थियाँ भारत में लायी जायें। उनकी यह इच्छा 73 वर्ष तक अपूर्ण रही। अगस्त, 2003 में गुजरात के तत्कालीनमुख्यमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी उनके अस्थिकलश लेकर भारत आये थे।
आज श्यामजी कृष्ण वर्मा के जन्म दिन पर उनको शत-शत नमन।
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