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27/01/2026
पैरामाउंट अकादमी हायर सेकेंडरी स्कूल में विदाई समारोह का आयोजन
पैरामाउंट अकादमी हायर सेकेंडरी स्कूल में हाल ही में कक्षा 12वीं के विद्यार्थियों के लिए एक भव्य विदाई समारोह का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम हर्षोल्लास, भावनाओं और यादगार पलों से भरपूर रहा।
विद्यालय परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। समारोह की शुरुआत जूनियर विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत स्वागत नृत्य से हुई, जिसने सभी का मन मोह लिया। इसके पश्चात विद्यार्थियों ने गीत, नाटक, कविता पाठ और नृत्य जैसी मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं, जिनमें स्कूल जीवन की यादें झलकती रहीं।
विद्यालय के प्राचार्य श्रीमान दिनेश कुमार सोलंकी ने अपने संबोधन में विद्यार्थियों को उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने कहा कि “अनुशासन, मेहनत और ईमानदारी ही सफलता की कुंजी है।” शिक्षकों ने भी विद्यार्थियों के साथ अपने अनुभव साझा किए और उन्हें जीवन में आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित किया।
वरिष्ठ विद्यार्थियों की ओर से दिए गए भाषण ने सभी को भावुक कर दिया। उन्होंने अपने स्कूल जीवन की यादों, शिक्षकों के मार्गदर्शन और मित्रता के महत्व को याद करते हुए विद्यालय के प्रति आभार व्यक्त किया।
समारोह के दौरान मेधावी विद्यार्थियों को शैक्षणिक, खेलकूद एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए पुरस्कार भी प्रदान किए गए। जूनियर छात्रों द्वारा प्रस्तुत वीडियो प्रस्तुति ने सभी को भावुक कर दिया।
कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन और राष्ट्रगान के साथ हुआ। यह विदाई समारोह विद्यार्थियों के लिए एक यादगार पल बन गया, जो उनके जीवन में हमेशा विशेष स्थान रखेगा।
"HAPPY CHILDREN'S DAY"
सुक़रात जब बच्चा था, तो रोज़ाना एक रास्ते पर टहलने के लिए जाया करता था।
उस रास्ते में एक कुम्हार का घर था, जो मिट्टी के बर्तन बनाया करता था। वह कुम्हार के पास जा कर बैठ जाता और उसे ध्यान से देखता रहता। उसे बर्तन बनने की प्रक्रिया देखना बहुत अच्छा लगता था।
एक दिन कुम्हार ने उसकी तल्लीनता देख कर अपने पास बुलाया और पूछा।
"बेटा! तुम यहाँ से रोज़ गुज़रते हो और मेरे पास बैठ कर देखते रहते हो... तुम क्या देखते हो?"
"मैं आपको बर्तन बनाते देखता हूँ और यह प्रक्रिया देखना मुझे बहुत अच्छी लगती है ... मगर इससे मेरे मन में कुछ सवाल पैदा हुए हैं... जो मैं आपसे पूछना चाहता हूँ।"
सुक़रात की बात सुन कर कुम्हार बोला।
"यह तो बहुत अच्छी बात है... पूछो, जो पूछना चाहते हो?"
"आप जो बर्तन बनाते हैं... उसका नक्शा कहाँ बनता है?"
"उसका नक्शा सबसे पहले मेरे मन में बनता है..."
यह सुन कर सुक़रात उत्साह से बोला।
"मैं समझ गया..."
कुम्हार ने हैरत से पूछा।
"क्या समझे?"
"यही कि हर चीज़ सृजन से पहले विचार में बनती है। इसका मतलब यह है कि (खालिक़) सृजनकर्ता के विचार में हम पहले बन चुके थे, सृजन बाद में हुआ... अब मेरा अगला सवाल यह है कि जब आप बर्तन बना रहे हैं, तो ऐसा क्या करते हैं कि यह इतना सुंदर बनता है?"
"मैं इसे मोहब्बत से बनाता हूँ। मैं जो भी चीज़ बनाता हूँ, उसे खालिस दिल से बनाता हूँ और इसे बनाते हुए अपनी क्षमताओं का भरपूर इस्तेमाल करता हूँ ताकि कोई कमी-कमज़ोरी न रह जाए।"
सुकरात ने सिर हिलाते हुए कहा।
"इसकी भी समझ आ गई, क्योंकि बनाने वाला हमसे बहुत मोहब्बत करता है, इसलिए ही उसने हमें बनाया है ...
अगला सवाल यह है कि आप इतने अरसे से बर्तन बना रहे हैं, कोई ऐसी ख्वाहिश है, जो आप चाहते हैं कि पूरी हो।"
"हाँ! है... मैं चाहता हूँ कि ऐसा बर्तन बनाऊँ कि दुनिया वाह-वाह कर उठे और यह बर्तन पिछले बर्तनों से कुछ न कुछ अलग और खास भी हो ..." कुम्हार ने हसरत से कहा।
यह सुनते ही सुक़रात उछल पड़ा।
"वाह! खालिक हर बार ऐसी सृजन करने की कोशिश करता है कि दुनिया बे-इख्तियार वाह-वाह कर उठे, क्योंकि खालिक को पता है कि मैं जो यह इंसान इस दुनिया में भेज रहा हूँ, उस जैसा कोई और दोबारा नहीं आएगा।
1. गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिलै न मोक्ष।
गुरु बिन लहरे सुमति ना, गुरु बिन मिटे न दोष।।
पढ़ाते हो निस्वार्थ भाव से, देते सदा प्रेरणा।
हे गुरुवर तुम्हें वंदन, शत-शत हो वंदना।।
शिक्षक दिवस की ढेरों बधाई एवं शुभकामनाएं।
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