Advocate Narendra Singh Rathore

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04/11/2017

भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री की पूर्व भारतीय प्रधानमंत्रीगण से तुलना

क्या ये तुलना वाक़ई वास्तविकता है ?

Photos 22/12/2016

अंग्रेजों ने सभी हुनरमंद जातियों को नियम बनाकर समाप्त करना शुरू किया | बंगाल में कई कालीन बनाने वाले तथा बुनकरों के हाथ कटवा दिए तथा इसी तरह कही बच्चो पर शोषण के नाम पर तो कही महिलाओं पर शोषण के नाम पर कई सारी जातियों के पुश्तैनी काम को बंद करवा दिया | गुरुकुल जिनमे इन सबकी शिक्षा दी जाती थी उन्हें मेकाले ने बंद करवा दिया तथा अमान्य घोषित कर दिया और बोल दिया जो इनमे पढेंगे उनकी डिग्री मान्य नहीं होगी और उन्हें कोई नौकरी नहीं मिलेगी | अब चूँकि व्यापार अंग्रेजो ने छीन लिया था तो नौकरी ही एकमात्र साधन थी | वह भी गुरुकुल शिक्षा से मिलनी बंद हो गयी तो लोगों ने गुरुकुल में पढना छोड़ दिया इससे भारत का असली इतिहास , कला तथा संस्कृति एवं संस्कार इन सभी चीजों से बच्चो का नाता टूटता चला गया और उन्हें मजबूरन अंग्रेजी कान्वेंट स्कुल को अपनाना पड़ा जिसका पूरा पाठ्यक्रम अंग्रेजों ने भारत विरोधी बनाया था | इन स्कुलो में अंग्रेजों को आर्य द्रविड़ थ्योरी , महिलाओं पर अत्याचार, हिन्दू मुसलमान , जातियों पर अत्याचार यह सब बाते बच्चो के मन में बैठाने का माध्यम मिल गया तथा बचपन से जो पढाया गया उसके बाद बच्चा जिंदगी भर उसी को सच मानने लगा तथा एक ऐसी पीड़ी तैयार हो गयी जो उनकी पढाई बातो को सच मानती थी और बूढ़े लोगों या संतो या उनके माँ बाप को मुर्ख समझती थी क्योंकि वो अंग्रेजी शिक्षा में नहीं पढ़े लिखे थे | इसी कारण भारत के लोग स्वयं के ऊपर गर्व करना , अभिमान करना भूलते चले गए एवं अंग्रेजों के प्रति हीन भावना से ग्रसित हो गए | उन्हें विदेश से आई हार बात तथा वस्तु सही लगने लगी एवं देश की चीजे पिछड़ी तथा असभ्य और अंग्रेजों का मकसद पूरा हो गया , जो की मानसिक रूप से गुलाम काले अंग्रेजों की इस पीड़ी ने आज़ादी के बाद तक जारी रखा |

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अब आते हैं जातिवाद की बात पर तो जैसा की हम ऊपर जान चुके हैं के जाति और वर्ण क्या थे तो अब अंग्रेजों ने किस तरह लोगों को जातियों में तोडा यह समझते हैं | अंग्रेजों ने सबसे पहले तो जातियों के व्यापार को नष्ट किया जैसा की ऊपर वर्णित है | उसके बाद कई जातियां भुखमरी की हालत में आ गयी | इसका एक कारण अंग्रेजों का अनाज और किसानो पर अतिरिक्त कर लगा देना भी था, जिसे वसूलने भी किसी भारतीय को रखा जाता था जिन्हें जमीदार कहते थे ताकि भारतीय गरीब इनसे नफरत करने लगें जबकि सारा धन जाता अंग्रेजों पर था | कई बार अंग्रेजों ने अनाज को छुपाकर मानव निर्मित अकाल भी भारत में फैलाये जिससे करोडो लोगों की जान गयी तथा द्वितीय एवं प्रथम विश्व युद्ध में भारत का सारा अनाज इन्होने अपनी सेना को खाने तथा अंग्रेजों के खाने के लिए भेज दिया जिससे भारत में अकाल से करोडो लोगों की मृत्यु हो गयी |[iii] इस अकाल में मरे हुए लोगों की संख्या हिटलर के द्वारा मारे गए यहूदियों से भी ज्यादा थी पर इसका जिक्र इतिहास में कम ही होता है | कारण वही अंग्रेजो के प्रति इतिहासकारों की स्वामिभक्ति | इन कारणों से फैली गरीबी में कई जातियां बहुत गरीब हो गयी तथा कुछ तब भी अपनी मेहनत या अंग्रेजों की अनदेखी के कारण बचे रह गए | अब इन सभी ने मिलकर अंग्रेजों के प्रति विरोध शुरू कर दिया एवं आज़ादी की लड़ाई छेड़ दी | इससे डरकर अंग्रेजों ने इन्हें बांटने के लिए फूट डालो नीति का सहारा लेते हुए यह प्रचारित करना शुरू किया के जो जातियां अमीर हैं वो ऊँची जाती के लोग हैं तथा जो गरीब हैं वो नीची जाती के लोग हैं | इसके बाद अंग्रेजों ने लोगों को बताया के जो ऊँची जाती के लोग हैं इन्होने नीची जाती के लोगों को दबाया तथा इनका शोषण किया जिसके कारण यह गरीब हैं | उसी वक़्त अंग्रेजों ने जनगणना करवाकर गरीबों को एस.सी., एस.टी. एवं अमीर जातियों को जनरल केटेगरी का बना दिया और तब से इन दोनों तबको में जो आग लगी है वो आज तक नहीं बुझ पायी | ब्राह्मणों की किताबों जैसे मनुस्मृति आदि में मैक्स मुलर से बदलाव करवाकर शूद्रों के प्रति नफरत भर दी जिसकी तयारी पहले से ही कर ली गयी थी | इसी तरह शुद्रों के कई नेता ब्रिटेन और अमरीका में पढ़ाकर तैयार कर दिए गए जिनके मन में जमीदारों और ब्राह्मणों के प्रति नफरत भर दी गयी | इसके बाद हर जाती में चार वर्ण होने की जगह जातियां ही चार मानी जाने लगी तथा वर्ण पैदा होने के हिसाब से तय होने लगा | भारतियों ने भी अंग्रेजी स्कुल में जो पढाया उसी को सच मान कर कभी असलियत जानने का प्रयास नहीं किया जिन्होंने किया उनकी बाते मानी नहीं गयी और इस तरह अंग्रेजों ने शुद्र जाती बनाकर पैदा होते से ही किसी को अशुद्ध घोषित कर दिया , तो किसी को पैदा होते से ही ब्रह्म ज्ञानी | जबकि पहले वाल्मीकि, कबीर , चन्द्रगुप्त मौर्या, गौतम बुद्ध आदि कई ऐसे लोग थे जिन्होंने जन्म किसी और रूप में लिया बाद में कर्म से कुछ और बन गए थे | पर लोगों ने इसका अध्ययन करने की जगह अंग्रेजों के झूठ को ही सच मान लिया तथा ब्राह्मण श्रेष्ठ और शुद्र नीचे माने जाने लगे | बाद में महात्मा गाँधी ने जो की इस सत्य को समझ चुके थे के अंग्रेज क्या कर रहे हैं शुद्रों के नेता को एवं ऊँची जाती के हिन्दुओं को समझाने का प्रयास किया मगर किसी ने उनकी बात नहीं मानी, उन्होंने शूद्रों को नया नाम हरिजन भी दिया पर उसका कोई फायदा नहीं हुआ बाद में वही शुद्र , हरिजन हुए फिर दलित और आज भी भारत में ऊँची और नीची जाती का संघर्ष जारी है | जबकि सभी अपने पुराने हुनर को भूलते जा रहे हैं और अंग्रेजी शिक्षा को श्रेष्ठ मान कर अपने ही धर्म को गालियाँ दे रहे हैं जिसके विषय में वो कुछ भी नहीं जानते | असल में धर्म और कुछ नहीं उस स्थान पर रहने वालों के रहने का तरीका होता है जिसे उस स्थान के लोगों ने सदियों में विकसित किया होता है | पर लोग उसे जातिप्रथा आदि से जोड़कर छोड़ रहे हैं | तथा आज मेरे जैसे कुछ लोग जाती प्रथा का समर्थन करदें तो तलवारें खिच जाती हैं एवं सभी बुद्धिजीवी इसका एकसुर में विरोध करने लगते हैं तथा जाती प्रथा को नष्ट करने की बात होने लगती है |

जबकि है इसका बिलकुल विपरीत , पूरा भारत जातियों पर टिका है | आज भी कई जातियां ही हैं जो भारत का व्यापार संभाल रही हैं तथा इन्ही जातियों से परिवार भी जुड़े हुए हैं और परिवार से समाज तथा समाज से धर्म एवं राष्ट्र | यदि जातियां नष्ट होंगी तो भारत की एकता नष्ट हो जायेगी तथा समस्त व्यापार का ढांचा चरमरा जायेगा | अतः जरुरत जातिप्रथा को नष्ट करने की नहीं है बल्कि इसे इसके असली स्वरुप में लाने की है |

आज भारत की हालत वैसी ही है जैसी की रामायण में हनुमान जी की श्राप मिलने के बाद हो गयी थी | सूरज निगलने वाले हनुमान जी को श्राप मिला था के वो अपनी सारी शक्तियों को भूल जायेंगे तथा उन्हें पता ही नहीं रहेगा वो क्या हैं | इसके बाद हनुमान जी शक्तिहीन होकर कई साल वनों में भटकते रहे | जब श्री राम ने आकर उन्हें पुनः शक्तियों का आभास करवाया तब उसी हनुमान ने समुद्र लाँघ कर सोने की लंका जला दी थी | भारत को भी आज ऐसे ही अपने खोये हुए आत्मविश्वास को जगाने की आवश्यकता है |

यदि भारत यह कर सका तो हम विश्व गुरु का सपना जरुर साकार कर लेंगे अन्यथा दलित ब्राह्मण की लड़ाई अनंतकाल तक चलेगी | फैसला भारत को करना है आपको करना है |

Photos 21/12/2016

आपने फिल्मों में देखा होगा, कभी अदालत में किसी ऐसे केस में गए होंगे जहां मौत की सजा सुनाई जा रही हो, वहां भी देखा होगा, आपने देखा होगा कि किसी अपराधी को फांसी की सजा सुनाने के बाद जज साहब अपनी कलम तोड़ देते हैं।
भारत में अंग्रेजों के आगमन के साथ ही फांसी की सजा देना भी शुरू हुआ। पुराने जमाने में परम्परा कलम तोड़ने की थी, क्योंकि तब इंक पेन मौजूद नहीं थे और कलम को स्याही में डुबाकर मौत के फरमान पर दस्तख़त किए जाते थे। वक्त बदलने के साथ लकड़ी की कलम की जगह इंक पेन ने ले ली, पर फांसी की सजा सुनाने के बाद कलम तोड़ना अब भी जारी है।
क्या आप जानते हैं कि मौत के फरमान पर हस्ताक्षर करने के बाद जज कलम क्यों तोड़ देते हैं? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। ऐसा कोई कानून नहीं है कि आपको सजा सुनाने के बाद कलम तोड़नी ही है, न ही ऐसा किसी रूल बुक में लिखा हुआ है। दरअस्ल इसके पीछे कुछ खास वजह हैं।
1. सबसे बड़ा कारण तो ये है कि ये परम्परा सैकड़ों सालों से चली आ रही है। अंग्रेजी काल में किसी जज ने फांसी की सजा मुकर्रर करने के बाद कलम तोड़ी थी और उसके बाद कलम तोड़ने की इस परम्परा को सब निभा रहे हैं ।
2. कलम तोड़ना एक सिम्बाॅलिक काम भी है। कलम तोड़ने के पीछे वजह हो सकती है कि जिस कलम ने किसी शख्स से जीने का हक ही छीन लिया हो, उस कलम को दोबारा कभी यूज़ न किया जाए।
3. फांसी की सजा के कागज पर हस्ताक्षर करने के बाद जज खुद को किसी की जिन्दगी छीन लेने के अपराध से मुक्त करना चाहते हैं। इसलिए भी कलम तोड़ने की परम्परा चली आ रही है।broken pen
4. कलम तोड़ने से व्यक्ति को दी गई मौत की सजा पर दुख भी प्रकट किया जाता है। कोई भी जज मौत की सजा तब ही देता है जब शख्स के अपराध के लिए कोई दूसरी सजा कम लग रही हो, लेकिन किसी का जीवन छीन लेने की आत्मग्लानि से बचने के लिए जज कलम तोड़ते हैं।
5. फांसी के फरमान पर साइन करने के बाद कलम इसलिए भी तोड़ दी जाती है कि जज को अपने फैसले पर दोबारा विचार न करना पड़े। किसी भी सजा पर दोबारा विचार के लिए उसी जज की अदालत में अपील नहीं की जाती, यदि की भी जाती है तो फिर मामला बड़ी बेन्च को सौंपा जाता है, जिसमें दो या दो से ज्यादा जज शामिल होते हैं।

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