Apbhrams Sahitya Academy
abhee mai kuch samay ke liye vyast hoon. after two months activity continew start rahegee
नमस्कार ! जय जिनेन्द्र !
भारतीय भाषाओं में यदि हम अपभ्रंश भाषा की चर्चा करें तो सबसे पहले हम कहेंगे कि यह प्राचीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अपभ्रंश के माध्यम से ही संस्कृत, प्राकृत आदि प्राचीन भाषाओं की भाषागत एवं साहित्यिक विशेषताएँ हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती ,मराठी, ब्रज, अवधी, सिंधी आदि आधुनिक भाषाओं को विरासत में मिली है। भारतीय भाषाओं के एतिहासिक विकास को क्रमशः देखें तो हमको सबसे पहले यह समझना होगा कि प्रत्येक युग में साहित्यिक भाषा के समानान्तर कोई न कोई लोकभाषा अवश्य रही है और यह लोक भाषा ही साहित्यिक भाषा की एक तरह से जन्मदाता रही है। प्राचीनतम छान्दस अर्थात् वेद की भाषा से पूर्व लोकभाषा के रूप में प्राकृत प्रचलित थी जो स्वभाविक रूप से बोलचाल की भाषा थी। इसी लोकभाषा से वैदिक साहित्य की रचना हुई और इसकी भाषा को ही छान्दस भाषा कहा गया। इस छान्दस ने एक तरफ संस्कृत का रूप ग्रहण किया तो दूसरी ओर प्राकृत के रूप में ढली। प्राकृत भी लोकभाषा की सहायता से आगे बढ़ी जिससे अपभ्रंश भाषा उत्पन्न हुई। अपभ्रंश से हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती ,मराठी, ब्रज, अवधी, सिंधी आदि आधुनिक भाषाओं का विकास हुआ।
आपको यह जानकर हर्ष होगा कि 1993 से इस अपभ्रंश भाषा का अध्यापन पत्राचार के माध्यम से अपभ्रंश साहित्य अकादमी के द्वारा किया जा रहा है। यह पाठ्यक्रम 1 जनवरी से प्रारंभ होता है और दिसम्बर माह में परीक्षा के बाद उत्तीर्ण अध्ययनार्थियों को सर्टिफिकेट दिया जाता है। अपभ्रंश साहित्य की महत्ता को देखते हुए मैनें अपभ्रंश पाठ्यक्रम को बहुत सरल एवं क्रमबद्ध रूप से पढाने का विचार बनाया है। सदि आप लोग उत्सुक हो तो हम यहाँ अध्ययन कर अपभ्रंश साहित्य अकादमी से परीक्षा देकर सर्टिफिकेट प्राप्त कर सकते हैं। प्रवेश आवेदन पत्र, परीक्षा आवेदनपत्र एवं माँडलपेपर आप ंचंण्रंपदंचंण्वतह वेबसाइट से निकाल लें।
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