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25/08/2024
31/01/2024

#सूजाक
विचारपूर्वक देखा जाय तो रोगमात्र मनुष्य के आहार-आचारादि दोषों से उत्पन्न होते हैं; परन्तु सूजाक और आतशक रोग तो मनुष्य खुद खरीदता है। यदि मनुष्य अपने मन को वश में रख सके तो इन रोगों से होने वाले कष्टों से बच सकता है। सूजाक वाली स्त्री के साथ सम्भोग करने से पुरुष को तथा सूजाक वाले पुरुष के साथ सम्भोग करने से स्त्री को यह रोग उत्पन्न हो जाता है। कड़ी धूप में घूमने या तेल, अचार आदि अत्युष्ण पदार्थ के अधिक खाने से पेशाब में जलन पैदा हो जाती है और सूजाक के लक्षण देखे जाते हैं; परन्तु यह जलन आप-ही-आप शान्त हो जाती है। बहुत-से रोगी इसी तरह के कारण बतलाकर चिकित्सक को भ्रम में डालने की चेष्टा करते है, परन्तु उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि मामूली कारणों से उत्पन्न हुए सूजाक और आतशक बिना दवा के भी अच्छे हो जाते है; किन्तु सूजाक का जहर शरीर में घुसने के २-३ दिन बाद ही रोग के लक्षण प्रकट हो जाते है । प्रारम्भ में मूत्रनली का मुँह सुरसुराता और खुजलाता है। पेशाब लाल और गर्म होता है। पेशाब में थोड़ी जलन और कुछ मवाद भी आने लगती है। इसके बाद सूजाक की असली अवस्था उत्पन्न होती है, और पेशाब करते समय भयानक यन्त्रणा होने लगती है। सफेद, पीला या हरा मवाद भी बहुत आने लगता है। रात को सोते समय जननेन्द्रिय उत्तेजित हो जाती है, जिसके कारण रोगी को अत्यन्त कष्ट होता है। जननेन्द्रिय के मुण्ड में सूजन, अण्ककोषों और बस्ति ग्रन्थि में प्रदाह आरम्भ हो जाता है। ७ से १४ दिन के भीतर रोग के सब लक्षण घटकर सूजाक पुराना आकार धारण कर लेता है। पुराने सूजाक में पेशाब की जलन बहुत कम हो जाती या बिल्कुल नहीं होती है। सिर्फ पीला या सफेद पीप कम तादाद में निकलता रहता है। कभी-कभी मूत्रनली के संकोच के कारण पेशाब पतली धार से या रुक-रुककर होता है। मवाद के कारण मार्ग रुक जाने से बाज समय पेशाब एकदम बन्द हो जाता है ।

मूत्रमार्ग की कफ की पतली झिल्ली में प्रदाह होकर घाव हो जाता है, जिससे मवाद आता रहता है। सूजाक के प्रदाह से बाधी (बद) भी हो जाती है । प्रायः देखा जाता है कि सूजाक या आतशक जब भयानक न होकर मामूली रूप से प्रकट होता है, तब बाघी होती है । रोग का बचा हुआ जहर वात के रूप में प्रकट हो जाता है। सूजाक या आतशक होने के बाद गठिया वात का होना बहुत सम्भव है। लोगों का विचार है कि सूजाक या आतशक में ठण्डी चीजों के व्यवहार से गठिया-वात हो जाती है, परन्तु असल में ऐसी बात नहीं है। गठिया-वात सूजाक या आतशक के जहर से ही उत्पन्न होती है । सूजाक और आतशक भयानक बीमारी है। एक-दो महीने के भीतर इलाज करने से तो यह ठीक हो जाता है; किन्तु ज्यादा पुराना हो जाने पर इसके कीड़े बहुत भीतर जले जाते हैं, तब किसी तरह की चिकित्सा से लाभ नहीं होता । फलस्वरूप रोगी का जीवन नष्ट हो जाता है।

#चिकित्सा- सूजाक के रोगी का मामूली जुलाब देकर पेट साफ कर देना चाहिए। सूजाक की पहली या दूसरी अवस्था में पेशाब का जुलाब देना चाहिए। कच्चे दूध से समभाग जल मिलाकर लस्सी बनाकर भर पेट पीएँ। इससे पेशाब का जुलाब होगा । दही की लस्सी में जवाखार मिलाकर पीने से भी बहुत पेशाब उतरता है । ककड़ी के बीज ३ ग्राम और कलमी शोरा १।। ग्राम फाँक कर ऊपर से लस्सी पीना मूत्ररेचक है। कबाबचीनी का चूर्ण १॥ ग्राम ३-४ बार ताजा जल या लस्सी के साथ पीने से खूब पेशाब उतरता है। मूत्राघात और मूत्रस्तम्भ के नुस्खे भी लाभदायक हैं।

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